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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 256 में से

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पृष्ठ 186

१२६ औचित्यविचारचर्चा
हो जाने पर, सदाचार का आचरण, मद का त्याग और वैराग्य का आश्रयण
करता हुआ विषय संपर्क के छूट जाने से विगलितोत्तङ्गाभिमान ( गलितगर्व )
होकर तप करने की इच्छा करता है । ठीक है प्रायः अधिकतर लोक ताप से
गले हुए लोहपिंड के समान कार्यक्षमता को प्राप्त कर जाता है" ऐसा जो कहा
गया है उसमें उत् रूप उपसर्ग से युक्त होने के कारण तुङ्गशब्द का उन्नतिरूप
वाच्य अर्थ द्विगुणित हो जाता है जिससे मदमत्तजनगत अभिमानरूप अर्थ का
औचित्य अत्यन्त उच्छ्रित हो जाता है ।
न तु यथा कुमारदासस्य—
अयि विजहीहि दृढोपगूहनं त्यज नवसङ्गमभीरु ! वल्लभम् ।
अरुणकरोद्गम एष वर्तते वरतनु ! सम्प्रवदन्ति कुक्कुटाः ॥
उपसर्गतानौचित्यं प्रदर्शयितुमाह--न तु यथेति । नव-संगम-
संलग्नतया विस्मृतगमनां कामिनीं प्रातः सखी जागरयति--अयीति । अयि
सखि ! दृढोपगूहनं गाढालिङ्गनं, विजहीहि त्यज, अयि नवसङ्गमभीरु !
नूतनप्रियसहवासकातरे ! वल्लभं कान्तं, त्यज, अयि वरतनु ! कोम-
लाङ्गि ! एष प्रत्यक्षदृश्योऽरुणकरोद्गमः सूर्यकिरणोदयो वर्तते, प्रभात-
कालोऽयमायात इति भावः, कुक्कुटास्ताम्रचूडाः, सम्प्रवदन्ति स्वा-
व्यक्तनादं प्रातःकालबोधकमिति भावः, कुर्वन्ति ।
'उपसर्गगत अनौचित्य' का प्रदर्शन किया जा रहा है—न तु यथेति । नव-
संगमकालीन प्रमोदों में लीन होनेके कारण समयज्ञानशून्य नवयौवना को सखी
प्रातःकालकी सूचना दे रही है—अयि विजहीहीति । अयि सखि ! अब गाढ़ा-
लिंगन का त्याग करो, प्रियतम के संपर्क से निकल आओ । देखो न, सूर्य की
सुनहरी किरणें झांक रही हैं, मुर्गे बाँग दे रहे हैं, क्या अब भी केलि-मन्दिर में
ही बनी रहना चाहती हो ?
अत्राभिनवानङ्गसङ्गमगाढालिङ्गननिश्चलाङ्गच्छन्नाङ्गनाप्रबोधने
सख्या यदुक्तं मुञ्च वल्लभं प्रभातसंध्यायामरुणकिरणोद्गमो वर्तते, कुक्कु-
टाश्च सम्प्रवदन्तीति, तच्च सम्प्रोपसर्गशून्यशब्दापूरणमात्रेण निरर्थ-
कत्वादनुचितमेव ॥ २४ ॥
अत्र पद्ये, अभिनवे नूतनेऽङ्गसङ्गमे कामसम्पर्के, यद् गाढं दृढतर-
मालिङ्गनं तेन निश्चलान्यलसानि यान्यङ्गान्यवयवास्तैश्छन्नाया युक्तायां
अङ्गनायाः कामिन्याः प्रबोधने उद्बोधने सख्या वयस्यया, "वल्लभं मुञ्च,