औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १२५
दृशो जनस्तापविलीनलोहसदृशोमुष्णताद्रवीकृतलोहतुल्यां, कर्मण्यतां
कार्यक्षमतामायाति प्राप्नोति ।
उपसर्गगत औचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा ममेति ।
आचारमिति—गन्धर्वों के द्वारा पराजित दुर्योधन की तपःप्रवृत्ति को लक्ष्य करके
कहा जा रहा है कि विधिविडम्बनावश सुख के शिखर से गिरी हुई सभी
संपत्ति नष्ट हो जाने पर सदाचार का पालन, अभिमान का त्याग, वैराग्य का
अवलम्बन और विषयसंपर्क का अवसर नष्ट हो जाने से अत्युत्कट अभिमान से
मुक्त होकर तपस्या करने की इच्छा करता है । उचित ही है, क्योंकि वैसा व्यक्ति
प्रायः तापविगलितलोहपिण्ड के समान कार्यक्षमता को भी प्राप्त कर जाता है ।
अत्र दुर्योधनस्य घोषयात्रायां गन्धर्वबन्धपराभवभग्नाभिमानस्य
प्राज्यसाम्राज्यमुत्सृज्य तपःप्रयत्नाभिनिविष्टस्य दुर्ग्रहे वर्ण्यमाने यदुक्तं—
सर्वो जनः सुखभ्रष्टः प्रणष्टविभवः सदाचारं भजते, मदं त्यजति, वैराग्य-
माश्रयति, सङ्गभङ्गेन विगलितोतुङ्गाभिमानं तपः कर्तुं वाञ्छति, प्रायो
बाहुल्येन तापविगलितलोहपिण्डसदृशों कर्मण्यतामायातीति, तत्रोत्पूर्वतया
सोपसर्गस्य तुङ्गशब्दस्य स्वभावोन्नतिर्द्विगुणतामुपयाता दुर्मदाभिमाना-
र्थौचित्यमुच्चैः करोति ।
अत्र पूर्वोक्तपद्ये, घोषयात्रायां घोषगमनप्रसङ्गे गन्धर्वबन्धपराभव-
भग्नाभिमानस्य गन्धर्वकृतबन्धजन्यपराभवेन नष्टगर्वस्य, प्राज्यं प्रचुरं
विस्तृतमिति यावत्, साम्राज्यमुत्सृज्य परित्यज्य, प्रयत्नाभिनिविष्टस्य
तपोविषयकयत्नाग्रहशीलस्य, दुर्योधनस्य, दुर्ग्रहे दुराग्रहे, वर्ण्यमाने प्रति-
पाद्यमाने—"सर्वोजनः सुखशिखरच्युतो विनष्टैश्वर्यः सदाचारं श्रयति,
अभिमानं जहाति, वैराग्यमाश्रयति, विषयसंसर्गप्रणाशेन विगलितोत्तुङ्गा-
भिमानं यथा स्यात्तथा तपः कर्तुमिच्छति, प्रायो बाहुल्येनोष्णतागलित-
लोहगोलकतुल्यां कार्यक्षमतामायातीति यदुक्तं, तत्र तत्कथने, उत्पूर्वत-
योदित्यस्य प्राक्स्थित्या, सोपसर्गस्य तुङ्गशब्दस्य, स्वभावोन्नतिरुन्नतिरू-
पस्वाभाविकोऽर्थो द्विगुणतां द्वैगुण्यमुपयाता प्राप्ता सती, दुर्मदाभिमानार्थौ-
चित्यं मदमत्तजनगर्वरूपार्थस्यानुकूलतामुच्चैः करोति वर्धयति ।
इस पद्य में घोषयात्रा के प्रसंग में गन्धर्वों के द्वारा बँध जाने के कारण गर्व
चूर्ण हो जाने पर विस्तृत साम्राज्य को छोड़कर तपस्या करने के प्रयत्न में लगे
हुए दुर्योधन के दुराग्रह का वर्णन करते समय "सभी जन सुखसंपत्ति से हीन