औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवचनानौचित्यमुदाहर्तुमाह--न तु यथा मातृगुप्तस्येति । नायमिति ।
नाथ ! हे राजन् ! अय प्रत्यक्षो निशाया रात्रेर्मुखमारम्भः प्रदोषकाल
इति यावत्, अथवा निशानायिकाया मुखमाननं तदेव सरोरुहं कमलं
तत्र राजहंसो मरालस्वरूपः, कीर्याः शुक्त्याः कपोलतलवद् गण्डस्थल-
वत्कान्ता रमणीया तनुः शरीरं स्वरूपमिति यावत्, यस्यैवंभूतः शशाङ्क-
श्चन्द्रा न, वर्तत इति शेषः, ( अपितु ) इदमेतद्दृश्यमानमण्डलं, दुग्ध-
सिन्धोर्दुग्धाब्धेर्डिण्डोरस्य फेनस्य, पिण्डवद् गोलकमिव, परिपाण्डु धवल-
वर्णं, त्वदीयं भवदीयं, तत्प्रसिद्धं, यशः कीर्तिर्दिव्याकाश आभाति
प्रकाशते ।
वचनगत अनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया है—'न तु
यथेति । नायमिति—हे राजन् ! निशानयिका के मुखरूप सरोज पर रहने वाला
राजहंसस्वरूप, शुकी के गंडस्थल के समान पाण्डुर, यह चन्द्र नहीं है। यह तो
क्षीर-समुद्र के फेनपिंड के समान धवल तुम्हारा लोकोत्तर यश ही आकाश में
चमक रहा है।
अत्र नायं शशी त्वदीयं दुग्धाब्धिफेनपिण्डपाण्डुरं यश इति यदभिहितं
तदविच्छिन्नप्रसराणां यशसां बहुवचनेन वर्णनायां समुचितायामेकवचनौ-
पन्यासश्चन्द्रबिम्बाकारेण पिण्डमात्रपरिच्छिन्नतया सङ्कोचरूपमनौचित्य-
मुद्भावयति ।
अत्र पद्ये 'अयं दिवि भासमानश्चन्द्रो नास्ति (अपि तु) क्षीरसागर-
फेनगोलकवद् धवलं त्वदीयं यश' इति यत्प्रतिपादितं, तदविच्छिन्न-
प्रसराणामनवरुद्धप्रसराणां यशसां, बहुवचनेन बहुवचनान्तप्रयोगेण वर्ण-
नायां समुचितायां सत्यामेकवचनोपन्यासो यश इत्येकवचनान्तत्वेन
प्रयोगश्चन्द्रबिम्बाकारेणेन्दुमण्डलस्वरूपेण, पिण्डमात्रपरिच्छिन्नतया पिण्ड-
प्रमाणमात्रेण परिमिततया, सङ्कोचरूपं यशःसङ्कोचस्वरूपमनौचित्यमुद्भा-
वयत्युत्पादयति ॥ २२ ॥
इस पद्य में "यह चन्द्र नहीं है अपितु इन्दुमण्डल के रूप में क्षीरसागर के
फेन के समान धवल तुम्हारा यश है" ऐसा जो कहा गया है वह अत्यन्त अनुचित
है, क्योंकि चारों ओर फैले हुए यशों के लिये ‘"यशांसि" ऐसा बहुवचनान्त का
प्रयोग होना चाहिये था, परन्तु यहाँ तो "यशो" इस रूप से एकवचनान्त का
ही प्रयोग किया गया है जिससे वह यश पिण्डमात्र प्रमाण वाले चन्द्र के बिम्ब