औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ११७
साश्चर्यैर्बलिबन्धनैश्च बहुभिर्नित्यं हसत्युत्थितः
पौलस्त्यः सकृदुद्यमश्रमवशाद्व्यासक्तनिद्रं हरिम् ॥
वचनौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा मम नोतोति । त्रैलोक्येति । शुकसारणौ
रघुपतेरग्रे रावणोत्कर्षं प्रकटयतः । त्रैलोक्याक्रमणैरसकृल्लोकत्रयाभिभवैः,
बहुवचनबलादसकृदित्यस्य सर्वत्र सम्बन्धो बोध्यः, वराहविजयैर्वराहवि-
जयकारिणां कियतां सुभटानां विजयैर्निःसंख्यरत्नाप्तिभिर्गणनातीतरत्नो-
पलब्धिभिर्युद्धानि संग्रामा एवाब्वयः समुद्रास्तेषां मध्ये श्रियो विजय-
लक्ष्म्थाः, स्वरसस्य स्वाभिनिविष्टस्य, स्वयंवरस्य शतैर्बलिनां वरुणादिलो-
कपालानां, बन्धनैः स्वायत्तीकरणैरेवंविधैर्बहुभिरसंख्यैः साश्चर्यैराश्चर्योद्भा-
वकैः कृत्यैरिति भावः, प्रख्यातः प्रसिद्धस्तथा नित्यं सदोत्थितः समृद्धो-
त्साहः पौलस्त्यो रावणः, सकृदुद्यमश्रमवशाद् व्यासक्तनिद्रं, त्रैलोक्या-
क्रमणकौस्तुभावाप्तिलक्ष्मीस्वयंवरणादिकर्मणि वारमेकमेवोद्यमे प्राप्त्युद्योगे
यः श्रमस्तद्वशाद् गाढनिद्रासक्तं, हरिं विष्णुं, हसति स्वापेक्षया तुच्छं
मत्वोपहसतीत्यर्थः । अयं भावो भगवान्विष्णुर्वारमेकमेव वामनरूपेण त्रैलो-
क्याक्रमणं, वराहरूपेणासुरनिपातनमेकमात्रकौस्तुभोपलब्धिमेकवारमात्रं
समुद्रमध्ये लक्ष्म्याः स्वयंवरणं, बलिबन्धनञ्च कृतवान्थापि तज्जन्यश्रमेण
विशिथिलसर्वाङ्गो गाढनिद्रामवाप्य शेषे शेतेऽहं तु कतिधा तदाचरणैरपि
वर्द्धितोत्साह एवेति मत्समक्षे हास्यास्पदोऽसौ हरिरिति भावः ।
वचनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा ममेति ।
त्रैलोक्यमिति-शुकसारणों के द्वारा रामचन्द्र के आगे रावण की महिमा गायो
जा रही है । अनेकों बार तीनों लोकों के आक्रमणों से, वराह विजय करने वाले
अगणित वीरों को परास्त कर देने से, असंख्य रत्नों की प्राप्ति कर लेने से, युद्ध-
रूप सागर के बीच सैकड़ों बार विजयलक्ष्मी के स्वयंवरणों से, वरुणादि लोक-
पालों की विजय से तथा इसी तरह के अनेकों आश्चर्यजनक कार्यों के करने से,
प्रसिद्ध तथा सोत्साह रहने वाला रावण भगवान् विष्णु का उपहास कर रहा है,
क्योंकि उन्होंने वामनरूप से एक बार ही त्रैलोक्य का आक्रमण किया था, वराह-
रूप से एक बार ही असुर का संहार किया, उन्हें एकमात्र कौस्तुभमणि की प्राप्ति
हुयी थी, एक ही बार लक्ष्मी ने उनका स्वयंवरण किया था, एक बार ही उन्हें
बलि को बाँधने का कष्ट उठाना पड़ा था, फिर भी वे इसके श्रम से इतने श्रान्त
हुए कि गाढ़ी निद्रा में आजतक शेषनाग पर शयन कर रहे हैं ।