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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

११६ औचित्यविचारचर्चा
निर्देश किया गया है वह अत्यन्त अनुचित है, क्योंकि त्रैलोक्य-विजय-रूप साह-
सिक कार्यकारिता किसी पुरुष में ही सम्भव है स्त्री में नहीं, क्योंकि स्त्रियाँ
स्वभावतः कोमल हुआ करती हैं । फिर इसका विचार न करके स्त्रीलिंग का
निर्देश करना लिंगगत अनौचित्य को ही व्यक्त करता है ॥ २१ ॥
वचनौचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितैरेव वचनैः काव्यमायाति चारुताम् ।
अदैन्यधन्यमनसां वदनं विदुषामिव ॥ २२ ॥
लिङ्गौचित्यदर्शनात्परमवसरप्राप्तं दशमं वचनौचित्यं विवेचयितु-
माह—उचितैरेवेति । उचितैरभिधेयार्थानुरूपैरेव, वचनैरेकवचनद्विवचन-
बहुवचनरूपैः, काव्यं कविकृतिरदैन्येन धन्यानि कृतकृत्यानि मनांसि येषां
तेषामयाञ्चारुचिरचेतसामिति भावः, विदुषां सुधियां वदनमाननमिव,
चारुतां रुचिरतामायाति प्राप्नोति ।
लिङ्गौचित्य के प्रदर्शन के बाद अवसर प्राप्त होने पर दशम वचनौचित्य
की विवेचना करने के लिये कहा गया है—उचितैरेवेति । अभिधेयार्थ के अनुरूप
एकवचन द्विवचनादि के प्रयोग से काव्य उसी तरह सौन्दर्य को प्राप्त करता है
जिस तरह दैन्यरहित अत एव धन्यमन वाले विद्वानों का मुख चारुता को प्राप्त
करता है ।
उचितैरेकवचनद्विवचनबहुवचनैः काव्यं चारुतामायाति अदैन्योदार-
चेतसां विदुषामिव वदनमयाञ्चाचारुचिरौचित्यचारुभिर्वचोभिः ।
उक्तकारिकार्थमेव विशदयति-उचितैरिति । उचितैः समनुरूपैरेक-
वचनाद्ववचनबहुवचनैः काव्यं चारुतां सौन्दर्यमायाति समासादयति ।
अदैन्योदारचेतसां दीनतारहितोदात्तचित्तानां विदुषां, वदनं यथाऽयाञ्चया
यच्चारु रमणीयं, चिरौचित्यं चिरकालिकौचित्यं, तेन चारुभिः सुन्दरैर्व-
चोभिर्वचनैः, सौन्दर्यमासादयतीति भावः ।
पूर्वोक्त कारिका की ही व्याख्या की जा रही है--उचितैरिति । एक वचन,
द्विवचन आदि के समुचित विन्यास से काव्य स्पृहणीयता को प्राप्त कर जाता है,
जैसे विद्वानों का मुख याचनारहित उदार वाणी से (स्पृहणीयता को प्राप्त करता है) ।
यथा मम नीतिलतायाम्—
त्रैलोक्याक्रमणैर्वरैराहवजयैर्नैःसंख्यैरत्नाप्तिभिः,
प्रख्यातः स्वरसस्वयंवरशतैर्युद्धाब्धिमध्ये श्रियः ।