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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 256 में से

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पृष्ठ 175

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता ११५
यद्रणं युद्धं तत्र समर्था कुशला, स्वर्गभङ्गैस्त्रिदशालयविनाशैः, कृतार्था कृत-
कृत्या, यमस्यान्तकस्य, नियमने बन्धने समर्था, मारुतस्य वायोरुन्माथे
विलोडने, सक्ता लीना, धनदस्य कुबेरस्य, निधने मृत्यौ, सज्जा तत्परा,
दहनस्याग्नेर्दलने पराभवे, चण्डा भयङ्करी, मद्भूजानां मद्बाहूनां, रावणस्य
विशतिबाहुमत्त्वेन प्रसिद्धतया बहुवचनस्यौचित्यमिति भावः मण्डली
समूहः, मर्त्ययुद्धे मानवीयसंग्रामे, लज्जते त्रपामनुभवति ।
लिंगगत अनौचित्य को दिखाने के लिए कहा गया है--न तु यथा ममेति ।
वरुणेति--मनुष्यों के साथ युद्ध करने में अपनी हेठी समझता हुआ रावण अपना
उत्कर्ष प्रगट कर रहा है। मेरी ये बीसों भुजायें-जो कि वरुण के साथ युद्ध
करने में समर्थ हैं, स्वर्ग को नष्ट-भ्रष्ट करके कृत-कृत्य हो चुकी हैं, प्रचंड वेग-
वाली वायु को भी तबाह कर चुकी हैं, सर्वदा कुबेर की मृत्यु की ताक में लगी
रहती हैं तथा अग्नि को भी विनष्ट करने के लिए पूरा उत्साह दिखा रही हैं-
मनुष्य के साथ युद्ध करने में लज्जा का अनुभव कर रही हैं।
अत्र रावणः कपिनिकरामर्षविषमविकाराविष्कारोचितं ब्रूते-वरुणा-
दिलोकपालविशालबलावलेपविप्लवकारिणी मर्त्यमात्रयुद्धे लज्जते प्रचण्डा
मद्भुजमण्डलीति स्त्रीलिङ्गेन निर्देशस्त्रैलोक्यविजयोचितस्य प्रतापस्य
कठोरतामपहरन्ननौचित्यं सूचयति ॥ २१ ॥
अत्र पद्ये, रावणः, कपिनिकरेषु वानरसमूहेषु, योऽमर्षः क्रोधस्तस्य
यो विषमो विचित्रो विकारस्तस्य य आविष्कारः प्रकटनं तदुचितं ब्रूते
कथयति-‘वरुणादीनां लोकगलानां, विशालानां महतां, बलावलेपानां
बलगर्वाणां, विप्लवकारिणी विनाशकारिणी, प्रचण्डा घोरा, मद्भुजमण्डली
मर्त्यमात्रयुद्धे तुच्छमानवमात्रसंग्रामे लज्जते” इत्यत्र स्त्रीलिङ्गनिर्देशो
मद्भुजमण्डलीतिस्त्रीलिङ्गोक्तिस्त्रैलोक्यविजयोचितस्य त्रैलोक्यविजयानुरू-
पस्य, प्रतापस्य, कठोरतां प्रचण्डतामपहरन्नौचित्यं सूचयति। जगत्त्रय-
विजये या कठोरताऽपेक्ष्यते तस्याः सद्भावः पुंस्येव संभवोऽस्ति, स्त्रियस्तु
स्वभावकोमलतया न तदाधारभूमिरित्यनौचित्यबीजं बोध्यम् ॥ २१ ॥
उक्त पद्य में रावण वानरों के ऊपर क्रोध प्रगट करता हुआ क्रोधमिश्रित
वाणी में कह रहा है कि--वरुणादि दिक्पालों के बलदर्प को विनष्ट करने वाली,
यह मेरी भयानक बाहुमण्डली मनुष्यमात्र के साथ युद्ध करने में लजाती है, इस
तरह बाहुसमूह कहने के अभिप्राय से बाहुमण्डली कह कर जो स्त्रीलिंग का