औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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फण एव स्तम्भस्तस्य प्राग्भारेण बलेन निष्कम्पे, धरासने वसुधातलात्म-
कासने, स्थानमुपवेशनं युक्तमुचितं, यत इहैव वसुधातले पर्वताधिपति-
र्मेरुः समुपविष्टः, सप्तमहासमुद्रा अपि, उपविष्टा इति भावः- तत्तुल्य-
तैव तत्समानगरिष्ठतैवास्माकमित्यौचित्यमधिकरणकारकबोधकपदप्रयो-
ज्यमेवेति ।
इस पद्य में महाराज कुन्तेश्वर का दूत सामन्त की सभा में अपने राजा की
प्रतिष्ठा के अनुरूप आदरपूर्ण आसन नहीं पाकर अपने कार्यवश भूमि पर ही बैठ
गया और अपनी गम्भीर प्रौढ़ता से बोल रहा है--हमारे जैसे गरिमा
शालियों के लिए शेषनाग के सबल फणस्तम्भ पर स्थिर होने से निष्कम्पमय रह
सकनेवाली इस भूमि पर ही बैठना उचित है, क्योंकि इसी पृथ्वी पर पर्वतों के
राजा मेरु और सातों महासागर टिके हुए हैं, इससे व्यक्त होता है कि मेरी भी
महत्ता इन्हीं मेरु और महासागरों की जैसी लोकोत्तर है जिसे भूमि छोड़कर और
कोई वहन नहीं कर सकता, क्योंकि यह सर्वसहा है । इससे एक अपूर्व औचित्य
का आभास मिलता है, और यह औचित्य "इहैव" इस अधिकरण पद से सम्बद्ध
है । इसलिए अधिकरणौचित्य का यह एक अच्छा उदाहरण सिद्ध होता है ।
न तु यथा परिमलस्य—
तत्र स्थितं स्थितिमतां वर देव ! दैवाद्
भृत्येन ते चकितचित्तमियन्त्यहानि ।
उत्कम्पिनि स्तनतटे हरिणेक्षणानां
हारान्प्रवर्तयति यत्र भवत्प्रतापः ॥
अधिकरणानौचित्यं प्रदर्शयति—न तु यथेत्यादिना । तत्र स्थितमिति ।
हे स्थितिमतां वर मर्यादाशालिनां श्रेष्ठ ! देव राजन् ते तव, भृत्येन
दासेन मयेति भावः, चकितचित्तं विस्मितहृदयं यथा स्यात्तथा, दैवात्सं-
योगात्तत्र तस्मिन्देशे, इयन्त्येतावन्त्यहानि दिनानि, यावदिति भावः, स्थितं
वासः कृतो, यत्र यस्मिन्प्रदेशे, भवत्प्रतापः श्रीमत्प्रभावः, हरिणेक्षणानां
मृगलोचनानां कामिनीनामिति भावः, उत्कम्पिनि भयवशात्कम्पनशीले
स्तनतटे कुचस्थाने, हारान्मौक्तिकानि माल्यानि, प्रवर्तयति तरलीकरोति ।
अधिकरण कारण के अनौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिए कहा गया
है—न तु यथेति । तत्रस्थितमिति — हे मर्यादाशालियों में सर्वश्रेष्ठ ! ( राजन् ! )
आपका किंकर मैं संयोग से इतने दिनों तक आश्चर्य से चकित होकर उस प्रदेश