औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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उसको क्षार(नमकीन) बनाकर अपेय किया। उसके बाद (कुछ नीचे जाने पर)
बड़वाग्नि की ज्वाला में उसे जलाया और अन्त में पाताल में ले जाकर रख
छोड़ा यही तो। तात्पर्य यह है कि अन्यायोपार्जित वित्त का भी यदि सदुपयोग
किया जाय तो एक बात भी है पर यदि उसका सर्वथा दुरुपयोग ही किया जाय
तब तो यह अत्यन्त ही अनुचित है।
अत्र महार्णवव्यपदेशेनान्यायोपार्जितद्रविणदुर्व्ययकारिणः सत्संविभाग
विमुखस्य कस्यचिदुच्यते। सरितां मुखेभ्यः समन्तात्तोयमादायापात्रेभ्यः
प्रतिपादितं दूषितम्। यत्त्वत्र सरिद्भ्यः समादायेति वक्तव्ये सरिन्मुखेभ्य
इत्युक्तं तेन मुखशब्दस्य नैरर्थक्यादत्रानौचित्यमेव पर्यवस्यति।
अत्र पद्ये, समुद्रच्छलेनान्यायपूर्वकोपार्जितधनापव्ययकारिणः सत्का-
र्यविनियोगपराङ्मुखस्य कस्यचिज्जनस्य कृते उच्यते। नदीनामाननेभ्यः
समन्ताज्जल रूपाहारमपहृत्यायोग्येभ्यो वितरितमति निरतिशयनिन्दा-
योग्यम्। अत्र सरिद्भ्य इत्येतावन्मात्रं प्रतिपादयितव्ये छन्दःपूर्त्यर्थं
सरिन्मुखेभ्य इति यदुक्तं तेनात्रानौचित्यमेव पर्यवस्यति-यतो हि मुख-
शब्दोपादानं निरर्थकमेव। अतोऽपादानानौचित्यमिति बोध्यम्। वस्तुतस्तु
मुखशब्दोपादानेन जलस्याहाररूपताप्रतीत्या प्रस्तुतपक्षे दीनजनग्रासहरण-
प्रतीतिश्चमत्कारिणी संपद्यत इति नानौचित्यलेश इति मे प्रतिभाति।
इस पद्य में समुद्रान्योक्ति के द्वारा अन्यायोपार्जित धन का अपव्यय करने
वाले समुचितव्ययविमुख किसी व्यक्तिविशेष के प्रति कहा जा रहा है—नदियों
के मुख से (आहारस्वरूप) जल छीन कर अपात्र (बड़वाग्नि और पातालकुहर)
को समर्पित करना निन्दित है। यहाँ "सरिताओं से जल लेकर" ऐसा कहने के
स्थान में "सरिताओं के मुख से" ऐसा जो कहा गया है उसमें मुख पद की
उक्ति सर्वथा निरर्थक है। इस तरह अपादानकारकबोधक पद की निरर्थकता से
तद्गत (अपादानगत) अनौचित्य स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। परन्तु मुझे तो
ऐसा लगता है कि यहाँ मुखपद निरर्थक नहीं है, क्योंकि उससे प्रस्तुत पक्ष में
दीन जनों के मुखों से ग्रास का छीनना अवगत होता है, जो कि पूर्ण चमत्कारी
है। इसलिये यहाँ अनौचित्य नहीं कहा जा सकता है।
अधिकरणौचित्यं यथा कुन्तेश्वरदौत्ये कालिदासस्य—
इह निवसति मेरुः शेखरः क्ष्माधराणा-
मिह विनिहितभाराः सागराः सप्त चान्ये।