औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता ८५
मुखापेक्षी भृत्य के समान औचित्य का परम पोषण कर रहे हैं। तात्पर्य यह है कि
यहाँ शान्त, शृंगार, करुण और बीभत्स-रस का संकर सर्वथा समुचित है।
रससङ्करस्यानौचित्यमुद्भावयितुमाह। शृङ्गारशान्तयोर्यथा-
ऽमरुकस्य---
गन्तव्यं यदि नाम निश्चितमहो गन्तासि केयं त्वरा,
द्वित्राण्येव पदानि तिष्ठतु भवान्पश्यामि यावन्मुखम्।
संसारे घटिकाप्रणालविगलद्धारा समे जीविते,
को जानाति पुनस्त्वया सह मम स्याद्वा न वा सङ्गमः॥
शृङ्गारशान्तयोः संकरस्यानौचित्यमुदाहर्तुमाह-रससङ्करेति। गन्तव्य-
मिति। यदि, गन्तव्यं प्रवासगमनं, निश्चितमप्रतिरोध्यं, नामेति सम्भा-
वनायाम्, अहो खेदेन, गन्तासि गमिष्यसि, इयमेषा, त्वरा शीघ्रता का?
व्यर्थैवेति भावः भवान् द्वित्राणि द्वे वा त्रीणि वेति द्वित्रिसंख्याकानी-
त्यर्थः, एव, पदानि चरणानि, पलानीति यावत्, तिष्ठतु, यावत्पर्यन्तमहं
भवतो मुखं पश्यामि। (यतो हि) संसारे विश्वस्मिन्, घटिकाः क्षणा-
न्येव, प्रणालानि प्रणाल्यस्तद्वारा, विगलता प्रवहता, धारा, जलेन,
समे तुल्ये, जीविते जीवने, अर्थादेतावत्क्षणभङ्गुर मानवजीवने, त्वया सह,
मम सङ्गमः साक्षात्कारः, पुनर्भूयः स्याद्भवेन्न वेति को जानाति ? न
कोऽपि जानातीति भावः।
रससंकर के अनौचित्य को प्रदर्शित करने के लिए शृंगार और शान्त के
संकर का अनौचित्य दिखाया जा रहा है-यथाऽमरुकस्येति। गन्तव्यमिति।
हे नाथ ! यदि तुम्हारा जाना निश्चित ही है तो चले जाना, ऐसी जल्दबाजी
क्या है ? दो-तीन क्षण ठहरो न ? तब तक मैं अच्छी तरह तुम्हारा मुख देख
लूँ, क्योंकि इस क्षणभंगुर संसार में जीवन क्या है ? वह नाली के बहते हुए जल
के समान है जो पल-पल करके बीता चला जा रहा है, कौन जानता है कि फिर
मेरा तुम्हारा मिलन होगा या नहीं।
अत्र प्रकरणवर्तिनः शृङ्गाररसस्य पश्यामि यावन्मुखमित्यकुण्ठो-
त्कण्ठासमुज्जृम्भमाणस्य स्वभावविरोधिनि शान्तेऽङ्गभावमुपनीते
विस्तीर्णतरानित्यतावर्णनया वैराग्येण रतेर्न्यग्भावमापादयन्त्या प्रधान-
रससम्बन्धेनाधिकमनौचित्यमुत्साहितम्। निःसारसंसाराचारताश्रवणेन