आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुपलब्धवादः ३५९
त्वान्निमित्ततायाः। अन्यथा निमित्ततामात्रमुपगम्य एकस्य निवृत्तौ
सर्वसन्तानोच्छेदः, अविशेषात्। ओमिति ब्रुवतश्चरमक्षणानाम-
किञ्चित्करणे शक्तिविहतेरसत्त्वप्रसङ्गः। तथा च पूर्वक्षणानाम-
पीत्यनेन पर्यायेणाकिञ्चित्करं जगदापद्येत इति साधु कार्यकारण-
भावः प्रतिसन्धाननिबन्धनं समर्थितः स्यात्। तस्मादन्यदेव
निमित्तं किञ्चिदुपाददीत, तथा च न प्रतिसन्धानमपूर्वानन्तसन्तान-
विज्ञान-सन्तानोंका उच्छेद हो जायगा। क्योंकि कोई नियामक नहीं है।
एवं, इसका भी कोई नियामक नहीं है कि केवल प्रवृत्तिविज्ञान ही
निमित्तमात्र बनकर रह जायगा अन्य उपादानजातीय नहीं। अर्थात्
नियामक नहीं होनेसे सभी उपादानजातीय कपालादि वस्तु बिना कुछ
पैदा किये ही केवल निमित्ततामात्रका अनुभव करके नष्ट हो जायेंगे,
जैसे कि आपका प्रवृत्तिविज्ञान बिना कुछ पैदा किये ही केवल निमित्त
बनकर ही नष्ट हो जाता है। इसप्रकार विज्ञान ही नहीं, सभी
कार्यसन्तानोंका उच्छेद हो जायगा। क्योंकि निरुपादानक कार्योत्पाद
असम्भव है।
इसे यदि 'ओम्' कहते हुए स्वीकार करो तो अन्तिम क्षण कुछ पैदा
नहीं करनेके कारण अर्थक्रियाशक्तिसे रहित होकर असत् हो जायगा।
अर्थात् अन्तिम क्षण उपादान तो नहीं ही हुआ, निमित्त भी नहीं हो
सकेगा। क्योंकि उपादानसे उत्पन्न होनेवाले कार्यमें ही निमित्तकी
अपेक्षा होती है। इसलिये अन्तिम-क्षण उपादानत्व निमित्तत्व उभय-
विहीन होनेसे सर्वथा अर्थक्रियाशक्तिरहित होकर असत् हो गया। और
उसी दृष्टान्तसे उसके पूर्व-पूर्व क्षण भी अर्थक्रियाशक्तिसे रहित होकर
असत् हो जायेंगे। इस प्रकार एक-एक कर सम्पूर्ण जगत् अकिञ्चित्कर
(कुछ न करनेवाला) बन जायगा। अर्थात् संसारसे कार्यकारणभाव
ही उठ जायगा। इसप्रकार आपने कार्यकारणभावको प्रतिसन्धानके
प्रति अच्छा नियामक सिद्ध किया।
इसलिये निमित्तताके अनुरोधसे प्रवृत्तिविज्ञानसे अतिरिक्त किसी
दूसरे ही ज्ञानको आलयविज्ञान अपना उपादेय बनायेगा। इस तरह
पुनः प्रतिसन्धान नहीं बन सकेगा। अर्थात् प्रवृत्तिविज्ञानके साथ