आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः १५२
यद्येवं, निमित्तान्तरमनपेक्ष्यैकव्यवहारोऽत्यन्तभिन्नैः, एवं
भिन्नव्यवहार एवाभिन्नेनैकेन केनचित् किं न साध्यते ? शक्ति-
स्वभावावलम्बनस्योभयत्रापि तुल्यत्वात् ।
अथैवं सत्येकव्यवहारः क्वचिदपि न स्यात् निर्निमित्तो वा
भवेत् , उभयमप्यनिष्टम् । तदेतत्तुल्यम् । अनेकव्यवहारोऽप्येवं
सति न स्यात् निर्निमित्तो वा भवेत्, उभयमप्यनिष्टम् ।
तस्मादेकनैकव्यवहारवदनेकेनाप्यनेकव्यवहार एवेति सामर्थ्य-
नियमः ।
का गतिस्तर्हि सामान्येष्वनेकेष्वेकव्यवहारस्य ? या चन्द्र-
मस्येकस्मिन्ननेकव्यवहारस्य । भ्रान्तोऽसाविति चेत्, अयमपि
(समाधान) उक्त प्रतिपादन ठीक नहीं है । क्योंकि इस प्रकार जाति-
को स्वीकृत किये बिना ही यदि अत्यन्त भिन्न स्वलक्षणोंद्वारा एक अनुगत
विकल्पजनन का व्यवहार होना माना जाय तो ऐसे ही अभिन्न किसी एक
वस्तु ( जाति ) को मानते हुए उसीसे सभी भिन्न भिन्न व्यवहार होते हैं,
ऐसा क्यों न माना जाय ? क्योंकि स्वाभाविक सामर्थ्यका अवलम्बन
दोनों पक्षोंमें समानरूपसे किया जा सकता है ।
यदि कहो कि- ऐसा होनेपर एक व्यवहार कहीं न हो सकेगा, या
बिना किसी निमित्तके ही होगा, यह दोनों ही ठीक नहीं है-तो यह दोष
आपके भी पक्षमें समान है । क्योंकि आपके कथनानुसार अनेकव्यव-
हार भी कहीं न हो सकेगा, या बिना किसी निमित्तके होगा, जो दोनों
ही अनिष्ट हैं । इसलिये एकसे जैसे एक ही व्यवहार होता है, वैसे
अनेकसे भी अनेक ही व्यवहार हो सकता है, यही वस्तुगत सामर्थ्यका
नियम है ।
यदि एकसे ही एकव्यवहार होता है तो गोत्व, अश्वत्व, महिषत्व
आदि अनेक सामान्योंमें होने वाले सामान्यत्वरूप एकव्यवहारकी क्या
गति होगी ! तो मैं कहूँगा, जो गति एक चन्द्रमामें अनेकत्वव्यवहारकी
होती है, वही होगी ! यदि कहो कि- चन्द्रमामें अनेकत्वव्यवहार