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आत्मबोध व तत्त्वबोध (आदि शङ्कराचार्य - हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmabodha & Tattvabodha with Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: कैलाश आश्रम ऋषिकेश · कैलाश आश्रम ऋषिकेश (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished51 पृष्ठ

सभी (उत्तम, मध्यम, व अधम) साधकों के लिये अनेक प्रकरण

२
स्पष्टीकरण के लिये प्रस्थानत्रयी (श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद्
और ब्रह्मसूत्र) के भाष्य की रचना की। गम्भीर भाष्यार्थ का सम्यग्
बोध तथा वेदान्त राजमार्ग पर निःसंदिग्ध अग्रसर होने के लिये
सभी (उत्तम, मध्यम, व अधम) साधकों के लिये अनेक प्रकरण
ग्रन्थों का उपदेश किया। यह प्रस्तुत तत्त्वबोध नामक प्रकरण ग्रन्थ
अतिसंक्षिप्त है। किन्तु यह सारे प्रकरण ग्रन्थों का सारगर्भ होने से
मुमुक्षुओ का अत्यन्त उपकारक है। जिज्ञासु साधक इस ग्रन्थ को
कण्ठस्थ कर अर्थ के साथ हमेशा हृदय में धारण करें।
ग्रन्थ के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण, स्मृति शिष्टाचार प्रमाणसिद्ध
है। इसका पालन करते हुए तथा शिष्यों को शिक्षा प्रदान करने के
लिये और ग्रन्थ श्रवण करने वालों को निर्विघ्न बोध उत्पादन के
लिये आचार्य पाद ने प्रारम्भ में मङ्गलाचरण किया। इसके द्वारा
ईश्वर और गुरुदेव की कृपा से ज्ञान-प्राप्ति होती है, यह अर्थ से
सूचित किया। 'वासुदेवेन्द्र' पद से ईश्वर और गुरु का अभेद भी
बताया। मुमुक्षुओं का हितकर मोक्षसाधन ज्ञान ही है। इससे ग्रन्थ
का प्रयोजन, तत्त्वबोध के द्वारा मोक्ष-प्राप्ति यह भी सूचित हुआ
और ग्रन्थ का अधिकारी मुमुक्षु है, यह भी कथन हुआ। ग्रन्थ का
प्रतिपाद्य विषय जीव-ब्रह्म की एकता, जिसका ज्ञान मोक्षसाधन है
यह भी सूचित हुआ।
आचार्यपाद के गुरुजी थे गोविन्दयोगीन्द्रपाद। उनका
पर्यायवाची 'वासुदेवेन्द्र' नाम लेकर ईश्वर और गुरुदेव का अभेद
परामर्श करके प्रणाम किया।
जो सर्वत्र रहते हैं और सबका अधिष्ठान हो, वह
परमात्मा ही वासुदेव है। विष्णुपुराण में कहा गया है:-

३
"सर्वत्रासौ समस्तं च वसत्यत्रेति वै यतः।
ततोऽसौ वासुदेवेति विद्वद्भिः परिगीयते॥"
'वस निवासे' धातु से बाहुलकाद् उण् प्रत्यय करने से वासु
शब्द निष्पन्न होता है। वसति, वासयति सर्वमिति वासुः। वासु ही
देव परमात्मा ॥१॥
अब मङ्गलाचरण से सूचित अनुबन्धों का कथन
करते हैं-
साधनचतुष्टयसम्पन्नाधिकारिणां मोक्षसाधनाङ्गभूतं तत्त्ववि-
वेकप्रकारं वक्ष्यामः॥२॥
साधनचतुष्टयसम्पन्न अधिकारियों के लिए मोक्ष के साध-
ान ज्ञान के अङ्गस्वरूप तत्त्वविवेक प्रकार को हम कहेगें ॥२॥
साधनचतुष्टयं किम्? नित्यानित्यवस्तुविवेकः, इहामुत्रा-
र्थफलभोगविरागः, शमादिषट्कसम्पत्तिः, मुमुक्षुत्वं चेति॥३॥
साधनचतुष्टय क्या है? नित्यानित्यवस्तुविवेक, इस लोक
और परलोक के समस्त भोग्य पदार्थ तथा सुखभोग के प्रति
वैराग्य, शमदमादि षट्सम्पत्ति तथा मुमुक्षुता, यही चार साधन हैं
जिनसे साधक वेदान्त-श्रवण का अधिकारी होता है ॥३॥
नित्यानित्यवस्तुविवेकः कः? नित्यं वस्त्वेकं ब्रह्म, तद्व्य-
तिरिक्तं सर्वमनित्यमयमेव नित्यानित्यवस्तुविवेकः।
नित्यानित्यवस्तुतविवेक क्या है? एक ब्रह्म नित्य वस्तु है, उससे
भिन्न सम्पूर्ण विश्व अनित्य है, यही नित्यानित्यवस्तुविवेक है ॥४॥
इहामुत्रार्थफलभोगविरागः कः? इह स्रक्चन्दन वनितादिषु
अमुत्र स्वर्गभोगेष्विच्छाराहित्यमेव।
इहामुत्रार्थफलभोगविराग क्या है? इस लोग में माला,

४
चन्दन, वनिता आदि समस्त भोग्य पदार्थों में तथा पारलौकिक
स्वर्गभोग में इच्छाराहित्य ही वैराग्य है ॥५॥
शमादिषट्कसम्पत्तिः का?
शमो दम उपरतिस्तितिक्षा श्रद्धा समाधानं चेति।
शमादिषट्कसम्पत्ति क्या है ? शम, दम, उपरति, तितिक्षा,
श्रद्धा और समाधान ॥६॥
शमः कः? अन्तरिन्द्रियनिग्रहः।
दमः कः? बाह्येन्द्रियनिग्रहः।
उपरतिः का? प्रपञ्चेभ्य उपरमणम्।
तितिक्षा का? शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुत्वम्।
श्रद्धा का? गुरुवेदान्तवाक्येषु विश्वासः।
समाधानं किम्? चित्तैकाग्रता।।७।।
शम क्या है ? अन्तरिन्द्रिय (मन) का निग्रह शम कहा
जाता है। दम क्या है? चक्षुरादि बाह्य इन्द्रियों का निग्रह। उपरति
क्या है ? प्रपञ्चों से उपराम होना। कुछ विद्वानों का मत है कि
अपने आश्रम धर्मों का अनुष्ठान ही उपरति है। तितिक्षा क्या है?
शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों की सहनशीलता। श्रद्धा क्या
है? गुरु तथा वेदान्त-वाक्यों में दृढ़ विश्वास श्रद्धा है। समाधान
क्या है ? चित्त की एकाग्रता को समाधान कहते हैं ।।७।।
मुमुक्षुत्वं किम्? मोक्षो मे भूयादिति दृढेच्छा।।८।।
मुमुक्षा (मुमुक्षुत्व) क्या है ? मुझे मोक्ष प्राप्त हो, ऐसी दृढ़
इच्छा को मुमुक्षा कहते हैं। इच्छा में दृढ़ता का अर्थ है अन्य
इच्छाओं का अभाव ।।८।।