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सर्वकोश
अश्ववैद्यकम् (जयदत्त सूरि - विस्तृत अश्व-रोग निदान एवं शल्य-चिकित्सा महाग्रन्थ)

अश्ववैद्यकम् (जयदत्त सूरि - विस्तृत अश्व-रोग निदान एवं शल्य-चिकित्सा महाग्रन्थ)

Ashvavaidyaka of Jayadatta Suri with Commentary

जयदत्त सूरि (सम्पादक: उमेशचन्द्र गुप्त कविरत्न) द्वारा

DevanagariHindipublished522 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 522 में से

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पृष्ठ 388

कृत-"
Wait, "कृत-" at end of line 20, then "मिति"!
कृतम् + इति = कृतमिति!

Let's check :
"मिति चिरबाधितोऽस्मीत्यलम् ।"
Yes!

Let's check footnote (1):
(१) शतेषु षट्सु सार्धेषु त्र्यधिकेषु च भूतले ।
कलेर्गतेषु वर्षाणामभवन् कुरुपाण्डवाः ॥
इति राजतरङ्गिणी ।
Wait, is there an indent or right alignment? We just do plain lines.
Note: "इति राजतरङ्गिणी ।"

Footnote (2):
(२) गोवर्द्धनश्च शरणो जयदेव उमापतिः ।
Wait, look at 'शरणो':
Is it "शरणो" or "शरण्यो"?
In : 'श', 'र', 'णो'. Let's write शरणो (or शरण्यो? Wait, look at 'ण': it has a dot? No, it's just 'णो'. Wait, in many editions of Saduktikarnamrita / Subhashitaratnakosha, it's quoted as "गोवर्धनश्च शरणो जयदेव उमापतिः" or "गोवर्धनश्च शरण्यो जयदेव उमापतिः". But in verse