आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)
Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary
आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा
८ आर्य्यभटीयम्-
श्रीकृष्णलीला·की आधिदैविक व्याख्या की अवतरणिका ॥
चन्द्रमा पौराणिक देवता हैं। ३३ नक्षत्र पुराणों में चन्द्रमा की ३३ स्त्री अ-
श्विनी, भरणी, प्रभृति, (नक्षत्र) चन्द्रमा का घर या गृहिणी हैं। इस स्थल में रूपक
अति जाज्वल्यमान है किसी को समझने में कष्ट नही होता किन्तु पुराणों में
ऐसे अनेक (हमारे शास्त्रों में प्रायः तीन प्रकार के वर्णन हैं एक आध्यात्मिक दू-
सरा आधिदैविक और तीसरा आधिभौतिक) रूपक हैं, जिनका रूपकत्व भाव
सहसा उपलव्धि नहीं किया जाता। श्रीकृष्ण नामक कोई व्यक्ति थे नहीं ऐसा
कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है, प्रत्युत ऐसे प्रमाण तो भले ही पाये जाते
हैं कि श्रीकृष्ण नामक एक अच्छे आदर्श पुरुष या पुरुषोत्तम सच्चरित्र व्यक्ति
हुए हैं जिनका इतिहास महाभारत में है। एवं श्रीकृष्ण सम्बन्धी इस इतिहास
के अतिरिक्त भागवत आदि पुराणोक्त ऐसे निन्दनीय उपाख्यान हैं जिन को
लेकर विधर्मी लोग हमारे वेदोक्त स०आ० धर्म तथा हमारे महात्माओं पर
कलङ्क दिखलाते हैं जिनका यथोचित समाधान हमारे भाई लोग न जानने
के कारण नहीं कर सकते । वेद तथा वेदाङ्ग आदि वैदिक ग्रन्थों के देखने
से पुराणोक्त उपाख्यानों का तात्पर्य समझ में आता है । जैसा कि पाठकों
को वक्ष्यमाण उपाख्यान से ज्ञात होगाः-वैदिक काल से सूर्य, उपास्य देव
होते आये हैं, आब्राह्मण चाण्डाल पर्यन्त सब ही आर्य्य इस समय भी शय्या
से गात्रोत्थान कर, पूर्व मुंह हो सूर्यदेव को प्रणाम किया करते हैं; सूर्यदेव
ही गायत्री के उपास्य देवता हैं। शालग्राम शिला आदि उपलक्ष्य कर जिस
प्रकार ईश्वर की उपासना की व्यवस्था मानी जाती है, उसी प्रकार सूर्य को
भी उपलक्ष्य कर ईश्वरोपासना की व्यवस्था की गई है। श्रीकृष्ण और अन्यान्य
१० अवतार, सब ही विष्णु के अवतार कहे जाते हैं। श्रीकृष्ण नाम से कोई व्यक्ति
अवतीर्ण हुए, जब यह स्वीकार कर लिया गया, और वे अवतार कहकर माने
भी गये तब उन के जीवन के साथ विष्णु या सूर्य (कारण वेद में विष्णु और
सूर्य एक) की लीला मिश्रित कर देना असम्भव नहीं है। श्रीकृष्ण की बाल्य-
लीला के साथ जो सूर्य की लीला मिश्रित हुई है। इस के बहुत प्रमाण पाये
जाते हैं । बाल्य-लीला यदि इस प्रकार रूपक के ऊपर न्यस्त न किया
जाता, तो परम पवित्र गीता शास्त्र के प्रवर्त्तक के चरित्र में “परदाराभिम-
र्शन” दोष अवश्य ही लगता । परीक्षित राजा ने श्रीकृष्ण जी की बाल्य-
लीला सुनकर शुकदेव जी से इस प्रकार प्रश्न किया था किः-
भूमिका ९
"संस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्यंच ।
अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदीश्वरः ॥
सं कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्त्ताभिरक्षिता ।
प्रतीपमाचरद् ब्रह्मन् परदाराभिमर्शनम् ॥
आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वैजुगुप्सितम् ।
किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत ! ॥”
जिस संशय ने राजा परीक्षित के मन को डवाडोल वा सन्दिग्ध
कर दिया था वही संशय आज अनेक लोगों के मन में उठता है। स्वतः ही
लोगों के मन में यह प्रश्न होता है कि धर्मसंस्थापनार्थ और अधर्म के नाश
के लिये जिन का जन्म हुआ है वे परस्त्रीगमन रूप अकार्य वा कुत्सित कर्म में
क्यों कर प्रवृत्त होंगे ? । या तो यह कोई आध्यात्मिक व्यापार है या कि-
सी ज्योतिष शास्त्रोक्त विषय का रूपक है। राधा को ह्लादिनी शक्ति (अ-
ध्यात्म) मानना पड़ेगा या राधा को “राधा” नक्षत्र मानना पड़ेगा । नहीं तो
अवतार की मर्यादा की रक्षा नहीं होती । शुकदेव जी के मुख से जो राजा
परीक्षित के प्रश्न का उत्तर दिया गया है उसे कोई भी सन्तोष-जनक (उत्तर)
नहीं मान सकता ।
“ईश्वराणां वचः सत्यं तथैवाचरितं क्वचित् ।
तेषां यत् स्ववचो युक्तं बुद्धिमांस्तत् समाचरेत्” ॥
यह बात सुनने से किसी के मन की शङ्का नहीं जाती तो परीक्षित का
भी सन्देह दूर हुआ हो या नहीं इस में सन्देह ही है । “मैं हजारों दुष्कर्म करूं-
गा, उस पर कोई ख्याल न करना मैं जो कहूंगा वही करना,, । ऐसी बात
किसी धर्म प्रवर्त्तक व्यक्ति के में शोभा नहीं देती। अवतार का प्रयोजन क्या ?
इस पर अवतारवादी लोग कहते हैं कि मनुष्यों को शिक्षा मिलना ही अव-
तार का प्रयोजन है। जिस कार्य्य से मनुष्यों को सुशिक्षा न हो कर कुशिक्षा
होती ऐसे कार्य्यों को अवतार में आरोपण करना नितान्त असङ्गत है । चाहे
जिस भाव से ही देखा जावे श्रीकृष्ण जी की बाल्यलीला को ऐतिहासिक
घटना कह कर मानना बहुत कठिन है। बाल्य लीला में नानाप्रकार का आ-
ध्यात्मिक वर्णन भी है। हम ने जो वेदाङ्ग—ज्योतिष के अनुसार रूपकवर्णन
२
१० आर्य्यभटीयस्य-
किया है। इसमे हमारा प्रयोजन यह है कि मनुष्य को सब विषयो में सत्य का
अनुसन्धान करना चाहिये। यदि हमारे इस रूपक वर्णन में कोई भ्रान्ति सिद्ध हो
तो उसे हम सादर स्वीकार करेंगे। श्रीकृष्ण वा श्रीरामचन्द्र आदि महापुरुषों के
किसौ २ चरित में कोई २ अंश रूपकालङ्कार से वर्णन किये गये हैं ऐसा कहने
से उन महात्माओं की सत्ता नष्ट नहीं होती अर्थात् ऐसा कोई न समझे कि
इन महात्माओं ने जन्म ही नहीं ग्रहण किया केवल रूपक मात्र है। और
उस में उन २ अवतारों के उपासकों के क्षोभ का कोई कारण नहीं। सर्वजन
आराध्य आदिक के चरित में जो कई एक अर्थविहीन उपन्यास या कलङ्क
आरोप किया जाया करता, वह निर्दोष, सार्थक, रूपक मात्र, और उस में
अवतार आदि के चरित्र में कलङ्क स्पर्श न हो यही हमारे इस रूपकवर्णन
का उद्देश्य है। अब हम आगे श्रीकृष्णलीला-का वर्णन करेंगे।
श्रीकृष्ण-लीला।
श्रीकृष्ण जी महाराज श्रीविष्णु भगवान् के अवतार कहे जाते हैं।
वसुदेव और देवकी श्रीकृष्ण जी के पिता, माता, श्रीराधिका श्रीकृष्ण जी की
प्रधाना भक्ति,-वृन्दावन, मथुरा, द्वारका और कुरुक्षेत्र, श्रीकृष्ण के लीलास्थल
कहे जाते हैं असुरविनाश के लिये श्रीकृष्णजी का पृथिवी पर अवतार का
उद्देश्य माना जाता है। श्री मद्भागवतपु० विष्णु पु० और ब्रह्म वैवर्त्त पुराणों
में श्रीकृष्ण लीला वर्णित है।
वैदिक आर्य्यों का परमदेव (१) सूर्य्य देव और वेदोक्त प्रमाण से सूर्य का
दूसरा नाम विष्णु (२) है और विष्णु सूर्य्य का अधिष्ठात्री देवता (३) है। प्राचीन
आर्य्यलोग प्रकृत वेदोक्त देव भिन्नअन्य देवी-उपासक थे ऐसा कदापि सम्भव नहीं।
गोलकस्थ राशिचक्र में सूर्य्य देव का एक वर्ष परिभ्रमण, व्यापार
उपलक्ष करके आर्य्य जाति के मनोरञ्जन के लिये पूर्व समय में श्रीकृष्ण लीला
का अङ्कुर आरोपित हुआ किन्तु क्रमशः पुराणों में इस लीला रूपी वृक्ष की शा-
खा प्रशाखा, पल्लव, होकर अब इस (लीलारूपी) वृक्ष में विषमय फल हो गये।
(कुदरती प्राकृत राशि लीला का मर्म भूल कर श्रीकृष्ण महाराज जैसे आ-
दर्श पुरुष वा पुरुषोत्तम के चरित्र में कलङ्क लगा) नहीं तो अधःपतन शील
भारत भूमि में कुरुचि की धारा बहती हुई आदर्श पुरुष श्री कृष्ण जी की अतल
स्पर्श कलङ्करूपी समुद्र में निमज्जित हो, उछलना डूबना क्यों पड़ता !!!
(१)-गायत्र्युक्त सविता देव। (२)-ऋ० ८ । ७७ । १० ॥ऋग् १ । २२ । १६ ॥ (३)-गायत्री ॥
भूमिका ११
'तनकाल की विचित्र महिमा है! अनन्तकाल, अनादि-देव को ग्रास करने
के लिये उद्यत है। अनादि, देव आज भारत में कलुषित भाव से पूजित होते
हैं। अङ्गराग न होने से शीघ्र पूजा लोप होगी। भारत के विप्र कुल सदा-
शय साधुचित्त यह रूपक कल्पना करके भी आज सनातन आर्यसमाज के
निकट दायी हैं। हम जातीय ऋण विमोचनार्थ आज उस श्रीकृष्ण लीला के
रहस्य भेद करने में कृत संकल्प हुए हैं।
फाल्गुन की अमावास्या को सायङ्काल में पूर्व बार गोलक (आकाश की
ओर) सन्दर्शन करो। तब देखोगे कि यह आज श्रीकृष्ण लीला गोलक में
अनश्वर अक्षरों में अङ्कित हो रही है। उस समय अपने मस्तक की ओर
(आकाश में) तारक मय धनुराकृति जो तारा देखते हो उसका नाम
"पुनर्वसु" है। इस धनु नक्षत्र वा वसुदेव की गोद में * यह देवकी विरा-
जमान है। इस वसु नक्षत्र के तृतीय मण्डल में जो विन्दु देखते हो उस बिन्दु
का नाम 'कर्कट क्रान्ति' है। यह विन्दु उत्तरायण की चरम सीमा पर अ-
वस्थित है। इस बिन्दु के स्पर्श करने पर सूर्य्यदेव की अयन गति शेष होती
है। और इस पर नये वर्ष के "बालार्क" का उदय (जन्म) होता है। यह
बिन्दु बाल (नये साल का सूर्य्य) बाल कृष्ण के जन्म (उदय) स्थान है। क-
ल्पना नहीं समझो नव दुर्वादलश्याम (१) तुम्हारे सामने प्रत्यक्ष दर्शन हो रहा
है। श्रीकृष्ण रेखा से विषमण्डल छायावत (२) ज्योतिश्चक्रवृत्त में वाल डिंडी-के
सम्मुख में कर्कट सिंह कन्या तुला वृश्चिक और धनु राशि हैं। श्रीकृष्ण यमुना
(३) अतिक्रमण कर प्रथमतः अग्रसर हुए। सम्मुख में कर्कट राज्यस्थ तीन ता-
रात्मक वाण के आकार का पुष्य नक्षत्र पश्चिमोन्मुख विराजमान है।
श्रीकृष्ण पुष्य संक्रमण से पीछे कर्कट राशिस्थ इदं सर्प कालिय (४) कालीय
सर्प का मस्तक षट्तारकमय चक्राकृति और इसको आश्लेषा नक्षत्र कहते हैं।
इस की अधिष्ठात्री देवता 'फणी' हैं।
श्रीकृष्ण ने आश्लेषा में पर रखकर कालीय सर्प को दमन किया। सम्मुख
- पुनर्वसु नक्षत्र का अधिष्ठाता देवता देवमाता अदिति हैं उस कालिय, कालीदह। कन्हैया वसुदेवश्च ब्रह्मवै०पु०
श्रीकृष्ण जन्मखण्डे । 'अदितिर्देवका ह्यभूत्, इति हरिवंशे। रेवती नक्षत्र से चित्रा नक्षत्र पर्यन्त कृष्ण रेखाका
का नाम अदिति या देवकी मौमण्डल।
(१) Castor star अर्थात् विष्णु नामक पुनर्वसु नक्षत्र के छः तारों में से सबसे ऊर्ध्ववर्ती तारा। जैसे, - "धर्मोध्रुवश्च,
सोमश्च विष्णुरनिलोनलः प्रत्यूषश्च प्रभासश्च ।। अष्टौवसव इति क्रमात् स्मृता,," इति स्मृतः (२) Lynx Con-
tellation or Canis minor (३) गरुड०पु० १० । १७ । १।(४) Hydra Constillation
१२ आर्य्यभटीयस्य-
में सिंह राशिस्य पञ्च तारकामय मघा नक्षत्र है और इस की अधिष्ठात्री
देवता 'यम' हैं सुतरां मघा की ज्योतिः नव प्रसूत बालक का जीवन संहा-
रक "ग्रहि" पूतना नामक बाल रोग का उत्पादक यही मघा (१) पूतना है।
मघा की योगतारा (२) देवकी के (अयन रेखाद्धृ) उपरिस्थ कहने से पूतना
को मातृ पद में अभिषिक्त कर श्रीकृष्ण को स्तन्य देने में व्यापृत कियी गयी
है। सूर्य्य देव के मघा में अवस्थिति काल में मघा आच्छादित होता है।
श्रीकृष्ण ने मघा संहार कर पूतना को विनाश किया। सामने सिंहराशिस्य
पूर्व्वएवं उत्तर दोनों फल्गुनी वा अर्जुनी नक्षत्र (३) इन दो नक्षत्रों को अतिक्रम
कर श्रीकृष्ण ने "यमलार्जुन वृत्त" भञ्जन लीला दिखलाया है। सम्मुख में
कन्या राशिस्य हस्त, चित्रा, तुला राशिस्य स्वाती, विशाखा, वृश्चिक राशिस्य
अनुराधा, ज्येष्ठा, और धनु राशिस्य मूल, पूर्वाषाढ़, और उत्तराषाढ़ ये नव नक्षत्र
हैं। ये ही आधुनिक पौराणिक नव नारी हैं (४) आठ सखी और आद्यशक्ति
विशाखा या राधा (५) विशाखा की आकृति पुष्पमाला या तोरण की नाईं
या हिस्रन कीसी है। और विशाखा की अधिष्ठात्री देवता 'शक्राग्नी, या 'वि-
द्युत्' है। इस विद्युताग्नि का नाम यही 'र' (६) अग्नि का आधार कह कर वि-
शाखा 'राधा' नाम से विख्यात (७) है। श्रीकृष्ण, चन्द्रावलि, चित्रलेखा, ललिता
(८) इन तीन सखियों के साथ सम्भाषण कर श्री राधा के घर में आकर देखा कि
अयन रेखा को (९) श्रीराधा ने अधिकार किया है। श्रीकृष्ण और श्रीराधा का
मिलन हुआ। यह श्री राधा कौन हैं? वृषराशिस्य सूर्य्य देव "वृषभानु" राजा।
'कलावती, चन्द्रिमा उन की पत्नी हैं। कलावती अपने पति वृष (राशिस्य सूर्य्य)
भानु (राजा) से मिलने की आशा में उन्मत्ता होकर पूर्णाकृति लाभ के
(१) Regulus (२) मघा को पूतना कहने का और भी कारण है मघा की आकृति हूल की सी है, और देखने
में ध्वजा Flag की नाईं मालूम पडता है इस कारण मघा को "ध्वजिनी,, कहना सार्थक है। और "ध्वजिनो
वाहिनी सेना,, पूतनाऽनीकिनी चमूः,, इत्यमरः। इस अमरकोश प्रमाण से पाया जाता है कि पूतना शब्द ध्व
जिनी के अर्थ में व्यवहार करने योग्य है और मघा पूतना दोनों ही ध्वजिनी, कहने से मघा पूतना और
पूतना को श्रीकृष्ण जी के मातृस्थान में विठालाने के अनेक कारण हैं। जैसे तृतीये दिवसे मासे (वर्षे वा गृह्णाति)
"पूतना नाम मातृका,, इति चक्रपाणिदत्त । श्रीकृष्ण जी को पूतना के स्तन्य देने का और भी कारण है जैसे
भावप्रकाश (वैद्यक) में यह पूतना "बाल रोग चिकित्सायम् तत्र संशोधने पूर्व धात्री स्तन्यं विशोधयेत् ,,॥
(३) ऋक् १० । ८५ । १३ ॥
(४) चन्द्रावलि, चित्रलेखा ललिता विशाखा तुङ्ग विद्या रंग देवी चम्पकलता सुदेवी और इन्दु लेखा ये ८ हैं।
(५) "राधा विशाखा पुष्येतु,, इत्यमरः (६) "स्मृते रः, पावके तीक्ष्णे,, इति मेदिनी (७) "वैशाखे माधवोराधः
इत्यमरः (८) स्वाती नक्षत्र की अधिष्ठात्री देवता 'पवन, और स्वाती तुला राशि में अवस्थित होने से इस का नाम
'ललिता, है। और हस्ता का पांच तारा चन्द्र तुल्य शुक वर्ण है (९) अयन घोष या रासण घोष॥
भूमिका ॥ १३
लिये ज्येष्ठा नक्षत्राभिमुख यात्रा काल में कमलाकृति विशाखा के बीच वि-
द्युत रूप राधा को प्राप्ति हुई । इस स्थान में राधा का पौराणिक जन्म और
लालन पालन आदि पाठक स्मरण करें ।
श्रीकृष्ण का, तुलाराशि में राधा नक्षत्र भोगकाल में आकाशाग्नि (सूर्य)
अन्तरिक्ष अग्नि में (विजुली में) मिलन हुआ । (१) सांख्य शास्त्रोक्त प्रकृति
पुरुष का मिलन हुआ । क्रमशः कार्त्तिकी पौर्णमासी आयी विद्यतमयी षट्
कृत्तिका की शोभा में पौर्णमासी की रौपमय' ज्योत्स्ना घर्षित हुयी । का-
र्त्तिकी पौर्णमासी की कौमुदी ज्योत्स्ना में जगत् भासित और हासित होने
लगा । पशु, पक्षी आदि सब जीवगण और जगत् जन प्रह्लाद मे पुलकित
हुए । जगत् जन इस विमुग्ध कर रजनी को नृत्य, गीत, द्वारा सुख से व्यतीत
करने लगे । यह विचित्र नहीं । इसी जगत् मय नृत्य, गीत, का नाम 'रास-
लीला' (२) है । श्रीकृष्णदेव श्रीराधा और आल सखी मिल कर रासलीला में
स्थान वृन्दावन में प्रमत्त हुए । आज पौर्णमासी कलावती और मातृका-
गण (३) (षटकृत्तिका) अपनी कन्या राधा के शुभगृह में उन्मत्ता हुयी ।
विमान पर पुरन्ध्रीगण, आज अट्टहास करती हैं । प्रकृति की इस अनुपम
शोभा में संसार मुग्ध हो रहा है ।
यह 'वृन्दावन' कहां ? यह देखो 'गोलोक' में लाखोलाख गोप । (४)
गोपी अर्थात् तारक तारका परिवेष्टित हो धाता, इन्द्र, सविता इत्यादि
द्वादश आदित्य (५) रूप में श्रीदामनु, सुदामन, प्रभृति' द्वादश गोप मण्डल
के साथ श्रीसूर्यदेव, श्रीकृष्ण' नाम से वृन्दावन में रासलीला में विराज-
मान (६) हैं। यदि इस प्राकृतिक रासलीला सुदर्शन से आप के हृदय में
गम्भीर विमल ईश्वर के प्रेम का उदय हो कर मन, प्राण, पुलकित न हो
और कलुषित भौतिक प्रेमभाव यदि किसी के क्षुद्र कुसंस्कार तिमिराच्छन्न
हृदय में प्रवेश करता हो तब हम और क्या कहेंगे, हां इतना तो अवश्य
कहेंगे कि भाइयो !, श्रीकृष्णभगवान् में चाहे ईश्वरभाव से अपनी रुचि अनुसार
पूजा करो परन्तु ऐसे पुरुषोत्तम आदर्श पुरुष के सचुरित्र में पापमय लीला
चित्रित आपे को कलङ्कित न करो और नारकी न बनो ! ! !
हमने पुनर्वसु नक्षत्र से राधा नक्षत्र तक आदित्यदेव' (श्रीकृष्ण) का
(१)—ऋक् १ । ६५ । १० ॥ (२)—गुणेरागेन्द्रव रसः । इत्यमरः । (३)—षट् कृत्तिका । (४)—गो—का अर्थ
किरण ऋक् १ । ६२ । ५ प-पालने (५)—वैशाख से चैत्र पर्यन्त सूर्य के नाम १ धाता, २ इन्द्र, ३ सविता,
४ विवस्वान्, ५ भग, ६ अर्यमन्, ७ भास्कर, ८ मित्र, ९ विष्णु, १० वरुण, ११ पूषा और १२ अंश है।
महाभारत आदि पर्व ॥ (६) ब्रह्मवैवर्त पुराण के श्रीकृष्ण जन्म खण्ड के ४ थे अध्याय ।
१४ आर्य्यभटीयस्य -
अनुसरण कर रासलीला का बोध कराया परन्तु इस से लीला का सम्यक्
बोध न हुआ है। क्योंकि बलदेव, नन्दगोप, यशोदा देवी और रोहिणी देवी
इन के न होने से रासलीला का आरम्भ नहीं हो सकता। अन्य ग्रह की
तरह आदित्य देव की क्रूरगति (१) नहीं होती, सुतरां नन्दराज के भवन में
श्रीकृष्ण को ले कर जाने के लिये उपाय रहित (२) इस कारण इस समय
बलदेव आदि को नन्दालय से रामलीला में निमन्त्रण कर, लाना पड़ा।
बहुत पर्यटन से प्रयोजन नहीं।
यह देखो एकवार, राशिचक्र में दृष्टि डालकर देखो कलावती चन्द्रमा
के पश्चात् भाग में वृषवीथि में। (३) वृषराशि में यशोदादेवी (४) और रोहिणी
देवी (Aldebaran in Hyades) विराजती हैं। वृषराशिश्च सूर्य्य इन्द्र
देव (५) देवराज सखा नन्दराज जहां? "यात्यमित्र नाहि तस्य दूरम्" सुतरां
हम ने आपलत नन्दराज को वृषराशि में व्यापन किया। विचार पीछे होगा।
यथा स्थान में विष्णुपुराण के ५म अंश में बलदेव जी का जन्मवृत्तान्त
वर्णित नहीं है। यथा स्थान में श्रीमद्भागवत के दशमस्कन्ध में ऋषिवाक्य
में बलदेव जी का जन्मवृत्तान्त का विवरण प्रकाशित नहीं। यथा स्थान में
ब्रह्मवैवर्त्त पु० के जन्मखण्ड में संघर्षण देव (६) का जन्मवृत्तान्त विस्तृत है।
किन्तु एकवार इसी के साथ बुध-जन्म वृत्तान्त स्मरण करो (७) चतुर्थ
वसुदेव पुत्र संघर्षण रोहिणी गर्भजात कह कर 'रौहिणेय हैं' किन्तु 'देवकी-
नन्दन' या 'वसुदेवनन्दन' नाम क्यों नहीं पाया? तृतीय वसुदेव (८) पुत्र
बुध ने सौम्य' नाम पाया किन्तु 'तारकानन्दन' या तारासुत' नाम क्यों
नहीं पाया? दोनों ही का जन्म वृत्तान्त रूपक मूलक है। हम लोग ज्योतिष-
शास्त्र में बुध की आधिप्रक्रिया घटना में पाते हैं कि, बुध "रौहिणेय हे।"।
पुराण में रूपक बिगड़ने के भय से इस का इतिहास नहीं लिखा गया कि
किस कारण से बुध का 'रौहिणेय' नाम पड़ा।
(१)-Retrograde motion (२)-राशि चक्र में आदित्य देव मेष राशि से क्रमशः पूर्वदिशा में
वृष आदि द्वादश राशि एक वर्ष में परिभ्रमण करते हैं। वृष राशि में नन्दालय मिथुन राशिरथ पुनर्वसु नक्षत्र
के पश्चिम में वृष राशि अवस्थित सुतरां राशि चक्र पर्यटन न करने से श्रीकृष्ण वृष राशि में किस प्रकार जायगे ॥
(३)-वृष राशि के पूर्व और पश्चिम सीमान्त में स्थित दो ध्रुवक रेखा के मध्यवर्त्ता गोलकांश को वृषवीथि
कहते हैं। (४)-वृष राशिरथ पाटलवर्ण देवमातृका षोडश मातृका में देव सेना या षष्ठी नाम से ख्यात एव ताम्
वदन्ति महा षष्ठी पण्डिताः शिशुपालिकाम्। देवमातृका ने श्रीकृष्णलीला में यशोदा नाम पाया है ज्योतिष्मन्तां
कहने से यशोभि धवलता ॥ (५)-त्रयैष्टमन्वे भवेदिन्द्रः इतिकौर्मे १८ अध्यायः ॥
(६)-देवक्याः सप्तमे गर्भे कंसो रचो दधौ भिया। रोहिणी जठरे माया तमा कृत्य ररक्ष च ॥
तस्माद् बभूव भगवान् नाम्ना संघर्षणः प्रभुः।
(७)-तारका गर्भे सम्भूत स एव च बुधः स्वयम्। ब्रह्मवै०पु०ब्र०खण्डे६६अ० ॥ (८)-धरो ध्रुवश्च सोमश्च
विष्णुरनिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ क्रमात् स्मृताः ॥ गदा वरद खड्गिण इते ग्रह-योग तत्त्वे।
भूमिका ॥ १५
इस समय देखा जाता है जो, बलदेव का नाम रौहिणेय है। और बुध
का भी नाम रौहिणेय है। गदाधारी (१) यह रौहिणेय श्रीकृष्ण के चिरसङ्गी
हैं। गदाधारी अन्य रौहिणेय आदित्यदेव के चिरसङ्गी हैं। गदाधारी अन्य
रौहिणेय आदित्यदेव के चिर सङ्गी हैं (२)। आदित्यदेव श्रीकृष्ण हुए, बलदेव
को न्यायानुसार बुध ग्रह कहा जावे । घर का घर ही में मिला "गृहं चेत्स-
मुविन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्" इस समय हम रासलीला वर्णन में प्रवृत्त हुए।
रास-पूर्णिमा ॥
[चक्र-चित्र के अन्तर्गत शब्द:]
- केन्द्र व ग्रह: सूर्य, पृथिवी, चन्द्र, बुध
- राशियाँ व नक्षत्र (चक्र के अनुसार):
- हिन्दू मण्डल
- वृश्चिक: ज्येष्ठा, अनुराधा
- तुला: विशाखा, स्वाति
- कन्या: जल विषुव संक्रान्ति, चित्रा, हस्ता, उत्तर फाल्गुनी
- सिंह: पूर्व फाल्गुनी, मघा
- कर्कट: अश्लेषा, पुष्य, कर्कसङ्क्रान्ति
- मिथुन: पुनर्वसु, आर्द्रा, मृगशिरा
- वृष: रोहिणी, कृत्तिका
- मेष: भरणी, अश्विनी, महाविषुव संक्रान्ति
- मीन: रेवती, उत्तरभाद्रपद, पूर्वभाद्रपद
- कुम्भ: शतभिषा, धनिष्ठा, श्रवण
- मकर: उत्तराषाढ़, मकर संक्रान्ति
- धनु: पूर्वाषाढ़, मूल
(१) मुषली मुषला युधात् । (२) बुध ग्रह सूर्य के २८ अंश के बीच में रहता है अतएव यह प्रायः सूर्य किरण
में छिपा रहता है।
१६ आर्य्यभटीयम्-
और एक बार राशि-चक्र पर दृष्टि डालो तो देखोगे कि १२ राशिस्थ (१)
२७ नक्षत्रों में केवल पूर्वफाल्गुनी, उत्तरफाल्गुनी, स्वाती, विशाख के उत्तरस्थ
एक तारका और श्रवण, धनिष्ठा ये ही छः नक्षत्र अयनमण्डल के ऊपर,
राशि नक्षत्र तारा- आकृति अधिष्ठात्री अङ्गरेजी
संख्या देवता
अश्विनी ३ घोटकमुख अश्विन Aries
मेष भरणी ३ त्रिकोण यम Musca
कृत्तिका ६ अग्निशिखा दहन Pleiades
वृष रोहिणी ५ शकट कमठज Hyades
मृगशिरा ३ विडाल पद शशि ()
मिथुन आर्द्रा १ पदम शम्भुत Betelgeuse
पुनर्वसु ४ धनु अदिति Castor etc
कर्कट पुष्य ३ बाण जीव Asellus
अश्लेषा ६ चक्र फणि Hydra
मघा ५ लाङ्गल पितृगण या यम Regulus
सिंह पूर्वफाल्गुनी २ मञ्च योनि Zosma & Subra
उत्तरफाल्गुनी २ खट्टा अर्यमा Denebola & another
कन्या हस्ता ५ हस्त दिनकृत् Curvus
चित्रा १ मुक्ता त्वष्टृ Spica.
तुला स्वाती १ कुभकुभवर्ण पवन Arcturus.
विशाखा ४ तोरण शक्राग्नि Akrob, Dschubba.
and others.
वृश्चिक अनुराधा ७ सर्प मित्र Antares etc.
ज्येष्ठा ३ शूकरदन्त या कुण्डल शक्र ()
मूल ६ शङ्ख निर्ऋति Lesath etc.
धनु पूर्वाषाढ ४ शय्या तोय Kaus
उत्तराषाढ (त्यूक्ता) ४ सूर्य विश्वविरिञ्चि ()
मकर श्रवणा ३ शर हरि Aquila
धनिष्ठा ५ मर्दल वसु Delphinus
कुम्भ शतभिषा १०० मण्डल वरुण ()
पूर्वभाद्रपद २ खड्ग अजएकपाते Enif & Homan.
मीन उत्तरभाद्रपद ४ पर्यङ्क अहिर्ब्रध्न Square of Pegasus
रेवती ३२ मत्स्य पूषा Piscis.
(न्युक्त) अभिजित् ३ शृङ्गाटक विरिधि Vega Etc.
भूमिका ॥ १७
गोलक के कदम्ब के (१) निकटतर है। कुरुक्षेत्रपर्व में हम प्रथम दो का ही प-
रिचय देंगे। द्वितीय दो'कृष्ण लीला की ललिता और श्रीराधा, तृतीय दो का
परिचय ग्रंथ में होगा। यह देखो ! श्रीराधा का किरीट, राशिचक्र के एक धनु
के (२) शिरोभाग में उच्चासन पर बैठा है। वाम भाग में ललिता सखी, अ-
न्यान्य सखियों में चन्द्रावती (हस्ता) (३) राशिचक्र के दक्षिण में, चित्रे लेखा
(चित्रा नक्षत्र) राशिचक्र के मध्य में। ललिता (स्वाती) और श्रीराधा की
(विशाखा का) (४) अवस्थिति स्थान ऊपर कहा गया है। रङ्गदेवी राशिचक्र
के मध्यमें अवस्थित है। सुदेवी (५) चम्पक लता (६) राशिचक्र के दक्षिण में
अवस्थित तुङ्गदेवी हैं तुङ्ग में और इन्दूलेखा (७)-राशि चक्र में अवस्थित हैं।
अयन मण्डल के अपर धनु राशि के शिरो भाग में वृष राशि में, यशोदा
देवी (देवमातृका कृत्तिका) (८) और बलदेव की माता रोहिणी देवी के
वामभाग में कलावती कौमुदी चन्द्रिमा के अवस्थित का स्थान है।
यह देखो ! कलावती आश्विनी पूर्णिमा, अश्विनी नक्षत्र में अवस्थित
कर रास-दर्शन के उल्लास में द्रुत वेग से राशि चक्र में दौड़ रही हैं। श्रीकृष्ण
और श्रीराधा में परस्पर रासलीला निमित्त विचार हो रहा है। कलावती
अश्विनी से भरणी, कृत्तिका, रोहणी, मृगशिरा, आदि एक २ नक्षत्र अतिक्रम
कर रही हैं और क्रम से जामाता के निकटस्थ होती जाती हैं, मानो नील
अवगुण्ठन मुखकमल आच्छादन करती हैं (९) पुनर्वसु नक्षत्रमें (११) विष्णु तारक
के दर्शन से कलावती (१२) ने ८ कलाओं को आच्छादित कर लिया है (१३)
एवं क्रमशः श्रीराधा नक्षत्र में आकर जामाता के दर्शन में १६ कला आ-
(१)-ध्रुव और अभिजित नक्षत्र के प्रायः मध्यवर्त्ती बिन्दु ध्रुव से १७ अंश दूर पर कदम्ब अवस्थित है।
ध्रुवात् जिन लवान्तरे इति भास्कराचार्यः (२)--Amphitheatre. (३)-हस्ता के ५ नक्षत्र चन्द्रवत् शुक्ल
वर्णी है ॥ (४)-विशाखा के तीन पद तुलाराशि में और एक पद वृश्चिक राशि में और उत्तरस्थ तारका अयनमण्डल
के उत्तर में एवं अन्य तीन दक्षिण में, इसकारण द्विवचन का व्यवहार है। रामायण लंकाकाण्ड । विशाखा के किरीट
में १० नक्षत्र है। (५)-अनुराधा का तृतीय तारा नरक लोहित वर्ण कह कर अनुराधा का रङ्ग देवी नाम है-न-रक
अर्थ से-न-सूर्य ॥ रकः स्फटिक सूर्ययोः । इत्यमरः । (६)--ज्येष्ठा वक्राकृति कहकर सुदेवी नाम मृणालता कृतिहै ॥
(७)--Line of beauty. (८)-तुङ्गरथ कहने से पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र तुङ्ग देवी ने नाम पाया है। (९)-सूर्याकार
शुक्लवर्ण चतुष् तारवामय उत्तराषाढ़ इन्दु लेखा है ॥
(१०)-चतुर्थं मानुमण्डलम् - काशी खण्डे (११) - कृष्णपक्ष का कनाद्यय (१२) - पुनर्वसु शब्द में वसु का
$\frac{३}{४}$ अंश। वसु = ८ । सुतराम् $८ \times \frac{३}{४} = ६$ । अर्थात् पुनर्वसु नक्षत्रमें ६ तारे है। वर्तमान आर्य ज्योतिषशास्त्र
में ५ गृहीत होते हैं। किन्तु ४ तारक को साधारण रख बाकी २ तारकों में से एक २ लेकर दो धनुष दीखेंगे वसु
अर्थ से धनुष का ग्रहण है ॥ (१३) - कार्त्तिकी कृष्णाष्टमी या गोपाष्टमी ॥
१८ आश्चर्यभटीयस्य-
च्छादन किये ( १ ) और अनुराधा में उपनीत हो कलावती अवगुण्ठन
विमोचनार्थ उद्योग करने पर देखती हैं कि श्रवणावस्थित त्रिविक्रम सम्मुख
में श्वशुर के दर्शन से बड़े पुलकित हैं । कलावती अर्द्धावगुण्ठित भाव से
श्रवणा अतिक्रम कर धनिष्ठा आदि एक २ नक्षत्र को प्रतिक्रम करती २
मुख कमल के नील अवगुण्ठन क्रम से मोचन करते २ चलने ( २ ) लगीं ।
अन्त में वृषराशि में उपनीत हो कृत्तिका और रोहिणी के वामभाग
में आकर आश्वस्त्य भाव से आनन्द में नील अवगुण्ठन एक मात्र विमोचन
कर सादर ऊंचे आसन पर बैठ गयीं । यों कार्त्तिकी पूर्णिमा की कौमुदी
पौर्णमासी का उदय हो कर ज्योत्स्ना में जगत् आलोकमय हुआ । कोमुदी
की ज्योत्स्ना-अङ्गना में आवृत्ता हो कर यशोदा देवी (कृत्तिका) छिपकर
नीलमणि की रासलीला देखने लगीं । और बलदेव की माता भी अर्द्धाव-गु
ण्ठित मुख से रासलीला देखने लगीं । किन्तु पौर्णमासी कलावती श्वश्रूजन
सुलभ अकुण्ठित भाव अवलम्बन से सम्पूर्ण जगत् के सामने पृथिवी के पृष्ठदेश
से वासर (दिवस) घर में रासलीला देखने की कामना से किनारे हो कर
लुकछुक करती हैं । पुनर्वार जगत् की ओर चाह कर श्रीराधा की सम्पद् में
गर्वित हो ठट्ठा कर हंसती हैं । उषा काल में कौमुदी चन्दमा वांके नजर से
उभय पार्श्वस्थ वैवाहिक द्वय (३) की ओर दृष्टिपात कर अस्फुट स्वर से कहती
हैं कि देखो देखो बहिन ! हमारी राधा आज स्वामी समागम से सखीकुलमध्ये
(तारानिचय) कहां छिप गयीं ? कभी तो कार्त्तिक की चन्द्रिमा के आह्लाद
से नाचती २ उन्मत्ता प्रायः हो कर पश्चात् वर्त्ती वैवाहिक सच्चिदानन्द गोपको
कहते हैं कि वाह ! आज हमारा क्या शुभ दिन है ! आनन्दपुत्र आनन्दमय
श्रीकृष्णकी कृपा से हमारी राधा पवित्रा हुयीं । नन्दराज आह्लाद से गदगदभाव
में कहते हैं कि श्रीमती अहह ! तुम्हारी सुता राधा ही आद्या (४) शक्ति हैं ।
यह देखो ! श्रीकृष्ण का रश्मि चूड़ा (उर्द्ध मुख मयूख को) तुम्हारे राधा के
पदतल को मार्जन और धौत करता है ।
यह देखो ! कौमुदी चन्द्रमा के ऊर्द्ध भाग में प्रजापति ब्रह्मा 'औरिक'
मण्डल (५) विराजमान हैं । आज प्रजापति ब्रह्मा पूर्ण चन्द्ररूपी हंस पर
(१) - अमावास्या ॥ (२) - शुक्लपक्ष की कलावृद्धि ॥ (३) - यशोदा और रोहिणी । (४) - कार्त्तिकी वर्ष
विशाखासे गणित करने पर और राकाग्नि या विद्युत् = मूर्ति अग्नि का आदि विकाश है ॥
(५) Auriga constellation प्रजापति ब्रह्मा के शिरोदेश में प्रजापति नक्षत्र .Delta auriga
हत् पदम से बहाहूत (Star capella) तारा दक्षिण कुक्षि में अग्निवारक (Star nath) ब्रह्म-हृत्
तारक के पूर्व दक्षिण अंश मे त्रिभुजाकार छोटे २ तीन तारे (The kids) क्या त्रिवेद चिह्न (Emblem)
१. गीतिका पाद (खगोलीय मान व अक्षराङ्क पद्धति)
भूमिका ॥ १९
सानन्द आसीन हैं । रासलीला देखने के आनन्द में ३३ कोटि देवता के साथ
विद्याधर, अप्सरागण, यक्ष, रक्ष, गन्धर्व, किन्नर, पिशाच, गुह्यक, सिद्धाचरण,
दैव, दानव, असुर, आदि परिवृत्त होकर रासमण्डल के ऊर्द्ध देश (१) में आसीन
हैं। इसी उपलक्ष्य से श्रीराधा 'ब्रजेश्वरी', 'रासेश्वरी', आदि पुराणों में कही
गयीं हैं । और महर्षि वाल्मीकि ने विशाखा को सूर्य्यवंश का कुल नक्षत्र
कह कर वर्णन किया है । और बङ्गाल के कवियों ने "रायो राजा,"
“रायी किशोरी” नाम से श्रीराधा का नाम कीर्त्तन किया है और उसी
से पाश्चात्य ज्योतिषी लोगों ने श्रीराधा नक्षत्र पर राजमुकुट वाला लिखा
(Corona) (२) है। आज राशिचक्र के केन्द्र स्थान में श्रीकृष्ण (सूर्य्यदेव) और उन
के दक्षिण भाग में बलदेव (वृषचक्र) अवस्थित हैं । और राशिचक्र में गोपी-
गण (तारकागण) श्रीराधा और ८ सखियों के सन्निकटतानुसार में चक्र व्यूह में
नाच कर कृष्ण बलराम को प्रफुल्लित करती हैं। बलदेव जी भी प्रमोदित हो
चक्र नृत्य में साथ दिया। राधेश्वर वासुदेव चक्र व्यूह की गति परीक्षा करते हैं।
कार्त्तिकी चन्द्रिका ज्योत्स्ना बाहु-विस्तार पूर्व्वत कम्बल, गन्ध, वातान आलिङ्गन
कर स्नेह में डूब रही हैं । कार्त्तिकी परिशोभा के रतिमय ज्योत्स्ना सागर में
तीनों जगत् बह चले। आनन्द मय सुखाम्बु सागर में जीव मात्र के हृदय
निमग्न और अभिषिक्त हुए । अकथनीय विमल ज्योत्स्ना जल में विश्व ने अव-
गाहन किया । बाहुली (कार्त्तिकी) ज्योत्स्ना ने सुफलता को विस्तार कर
ब्रह्मर्षि देवर्षि और राजर्षिगण को आलिङ्गन कर विमुग्ध किया। इस मोह में
विमुग्ध होकर हमारे ऋषियों ने सूर्य्य भूतरूप सर्व्वव्यापी परम पुरुष को
सूक्ष्मभाव से ज्ञानकृत रूप से सवितृमण्डल मध्यवर्त्ती नारायण का ही वर्णन
किया है। और सवितृमण्डल ही इस प्राकृतिक शोभा की (३) मूल कारण है
कहने से सवितृमण्डल को ही विष्णुभाव से पूजा किया करते थे। और श्रीकृष्ण
लीला की रूपक रचना कियी हैं। आदितिनन्दन आदित्य देव में और देवकी
नन्दन श्रीकृष्ण में भेद कहां ? क्या ऋषियों ने सतर्क नहीं कर दिया है कि
“अदितिर्देवकीह्यभूत् (हरिवंशे) (अदिति) और “देवमाता च देवकी”
(ब्रह्मवैवर्त्ते जन्मखण्डे) क्या ऋषियों ने इङ्गित नहीं कर दिया है कि आ-
दित्यदेव ही देवकीनन्दन हैं ?
(१) - गोलक में ५००० वर्ष पहिले यह दृश्य था इस समय अब उतना सुदृश्य नहीं रहा ।। (२) - श्रीराधा के शिर
पर किरीटमण्डल (Corona)
(३) सूर्य्यकिरण चन्द्रमण्डल में प्रतिफलित होने से ज्योत्स्ना की उत्पत्ति होती है ।
२० -आर्य्यभटीयम्-
"ततोऽखिल जगत्पद्मवोधायाच्युत भानुना ॥
देवकी पूर्व सन्ध्याया माविर्भूतं महात्मना ।" विष्णुपुराणे ५ अ० ३ श्लो०
इतना भ्रान्त क्यों ? क्या वेदाङ्ग भूत ज्योतिषशास्त्र यह नहीं कहता है
कि यशोदा (कृत्तिका का) की अधिष्ठात्री देवता दहन (अग्नि) और रोहिणी
का कमलज (ब्रह्मा); अग्नि एवं ब्रह्मा एक ही हैं। इन ब्रह्मा के नाभि पद्म में
( राशि चक्र के केन्द्र में ) विष्णु या आदित्य देव अवस्थित हैं। यह देखो
रोहिणी के शिरोभाग में प्रजापति ब्रह्मा हैं। यह ब्रह्मा ही नन्दराज हैं।
रासलीला—वस्त्रहरण ॥
राशि चक्र से परिचय रहने पर रासलीला समझ में आ सकता है किन्तु
"वस्त्रहरण" (लीला) समझने के लिये "गोलक" ज्ञान प्रयोजनीय है।
पृथिवीस्थ ज्योतिर्विद्गण ने पृथिवी के मेरु दण्ड (axis) उत्तर में प्रसारित
कर गोलक में जो विन्दु प्राप्त होते हैं, उस का नाम 'ध्रुवविन्दुरेखा' रक्खा
है और पृथिवी से दृश्य गोलक, वि-षु-वत् मण्डल द्वारा द्विधा किया है।
राशि चक्र के केन्द्रस्थ ज्योतिर्विद् (?) राशि चक्र के मेरु दण्ड को (axis)
उत्तर में प्रसारित कर गोलक में जो बिन्दु प्राप्त होता उस का नाम
कदम्ब रक्खा है। और इस केन्द्र से दृश्य गोलक अयनमण्डल द्वारा द्विधा
किया है। मान लो कि 'कदम्ब' पर सूर्य को रखने से अयनमण्डल के
दक्षिण भागस्थ दृश्यगोलकार्द्ध अन्धकारमय होगा।
इस समय वस्त्रहरण देखो ! असील गोलक के बीच आदित्य देव अव-
स्थित हैं। आदित्य देव का केन्द्र (centre) और गोलक का केन्द्र एक ही है ऐसा
कहने में दोष नहीं। आदित्यमण्डल को वेष्टन कर राशि चक्र अवस्थित है; इस
ससूर्य राशि चक्र का नाम 'सुदर्शनचक्र' है। इससे नाम की भी सार्थकता होती है।
यह देखो ! सवितृ मण्डल के बीच नारायण श्रीकृष्ण इस केन्द्र में अवस्थिति
कर ससूर्य राशि चक्र को कुलाल-चक्र की नाईं घुमाते हैं। श्रीकृष्ण इस कुलाल
चक्र का शक्तिमय मेधि काष्ठ हैं। सूर्यमण्डल--कुलाल चक्र को हड़काष्ठ और
राशि चक्र कुलाल चक्र का वेष्टन काष्ठ (बेलन काष्ठ) है। यही कुलाल चक्र
रासलीला का आदर्श (१) है।
गोपीगण (२७ नक्षत्र मय) राशिचक्र में अवस्थित रहकर सूर्य किरणरूपी
वस्त्र में आवृत हो जगत् के चक्षु पर रह कर लोगों के अदृश्यभाव में
(१) कुलालचक्रं प्रतिभं मण्डलं पद्मनाभशंकृतम् । इति उत्कलकलिका ॥
भूमिका ॥ २१
नृत्य-गीत में प्रमत्त हैं। कुलाल चक्र की नाईं सम्पूर्ण राशिचक्र घूमता है ।
किन्तु सूर्य केन्द्र को त्याग नहीं करते हहुकाष्ठ की भांति केवल घूमते हैं।
गोपीगण चक्र नृत्य में आदित्यदेव श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा करती हैं। क्या
सुदृश्य मनोहर व्यापार है ! विराट पुरुष का विराट व्यापार !*
विराट पुरुष के नाभि स्थल में सूर्य हैं। किन्तु, आदित्य देव पर्य्यन्त
काल के वशवर्त्ती हैं। तृतीय दिन आदित्य देव को श्रीराधा नक्षत्र त्याग
कर अनुराधा नक्षत्र में पदार्पण करना पड़ेगा । किस का साध्य है कि इस
नियम को तोड़ सके? इधर गोपीगण रास में उन्मत्ता हैं। अनुरोध तो सुनेंगी
नहीं; राम में बाधा डालेंगी नहीं। उधर श्रीकृष्ण ने अपना माया-जाल विस्तार
किया । विराट के नाभि देशस्थित सूर्य कदम्ब पर स्थापित हुए और अयन
मण्डल के दक्षिणस्थ गोलकार्द्ध निशामय हुआ। गोपी का-किरण वस्त्र अपहृत
(छीनागया) हुआ ? अभ्रज्जन, चन्द्रावली, चन्द्रलेखा, तुङ्गदेवी- चम्पकलता,
सुदेवी, और इन्दुलेखा प्रभृति तारा-सखियों को देख पाया। लज्जा से सखीगण
नील समुद्र (१) में निमज्जित हुयीं किन्तु परङ्गु-प्रयास । रूप छिपा नहीं !!!
इस रूपक में सूर्य श्रीकृष्ण कदम्ब कदम्बवृक्ष, तारागण गोपी, सूर्यकिरण
वस्त्र, नील अन्तरिक्ष, कालिन्दी-जल, महर्षिगणारचित इस सुधामय रूपक
वृक्ष ने जो विषमम फल धारण किया है, इस को देख कर महर्षिगण आत्म-
ग्लानि से दग्ध प्रायः हो गये । रासलीला भङ्ग हुयी । श्रीकृष्ण व्रज (अयन-
मण्डल) में चले । सम्मुख में अनुराधा नक्षत्र है। भ्रान्त आर्य्यकुल ! जो ज्योतिष-
शास्त्र तुम्हारे शयन में, स्वप्न में, उत्सव में, व्यसन में, शोक में, सुख में, समाज
में, विजन में, पाप में, पुण्य में, सहाय होता था; आज तुम लोग उसी ज्यो-
तिषशास्त्र को भूल कर श्रीराधाकृष्ण के आह्लीन, रासलीला के अस्तित्त्व में
विश्वास करते हो !!! कहां श्रीकृष्ण ! कहां राधा ! पृथिवी से करोड़ों योजन
से अधिक दूरी पर सूर्य, उस से लक्ष २ गुण योजन अन्तर पर राशिचक्र के
नक्षत्र श्रीराधा आदि अवस्थित, दुर्दशामें पड़ने से इतना मोह पैदा होता है।
आदि जात आदित्यदेव श्रीकृष्ण का राशिचक्र ही "सुदर्शनचक्र" है । चक्री
के उस चक्र के किरण जाल में प्रच्छन्न हो आर्य्यजाति, पुरस्थित प्राकृतिक
रासलीला को देखनेमें असम होरही है । रूपक रक्षाके अनुरोध से, श्रीकृष्ण की
रासलीला वर्णन में पुराणकार महर्षियों ने कौतुक छल से कुकथा में कहि-०
*(१) अन्तरिक्ष का नाम है। ऋग्वेद १० । ६८ । ६-१२
२२ आर्य्यभटीयम्-
पय दो २ अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग किया है। वेद और वेदाङ्ग ज्योतिष-
शास्त्र के पाठ और ज्योतिषशास्त्र के अनुशीलन में और ज्योतिषक मण्डल के
पर्यवेक्षण (Observation) से भारतीय आर्य्यजाति विमुख हो, महर्षि-
प्रणीत पुराणस्थ इन सब दो अर्थ वाले शब्दों के प्रकृत अर्थ ग्रहण में असम-
र्थ हो गयी, और महर्षिगण पूजित आदित्य देव में अधिष्ठित परम पुरुष
प्रकृतदेव श्रीहरि को भूल कर आर्य्यजाति अन्धे की नाई अपने गन्तव्य मार्ग
को भूल कर इधर उधर भटकती फिरती है। क्या आश्चर्य है! क्या आश्चर्य
है! क्या भयावह विधाट भारत में उपस्थित हुआ है! षडङ्ग को छोड़ कर
कौन पण्डित वेद का अर्थ कर सकता? गोलरूप ग्रह-नक्षत्र की गति विधि
छोड़ कर, कौन सुशिक्षित सुधीजन पुराण की व्याख्या कर सकते? इस
भ्रम प्रमाद में फसकर भारत माता के हृदय के अरविन्द मुख मणि श्रीकृष्ण में
भक्ति स्थापन करने से पराङ्मुख होकर, भौतिक कृष्ण के पदाश्रय ले रहे हैं।
कोई तो नवद्वीप में मानव-ईश्वर स्थापन में भूरि यत्नतः ललायित हो रहे
हैं। आर्यगण! एकवार आलस्य छोड़ कर नक्षत्र, चन्द्र, सूर्य, ग्रहों की गति
परीक्षा करो तो वेदोक्त श्रीकृष्ण (श्रीविष्णु) के चरित्र की निर्मलता हृदयङ्गम
कर सकोगे। खेड़-हारा हो कर आर्य्यजाति को निर्याक निरुत्तरभाव से अवन-
त मस्तक में, देश २ में, विदेश में, नगर नगर में, गांव २ में, गली २ में, मार्ग
में, घाट २ पर, श्रीकृष्णकी कलङ्क रटना और व्यङ्गोक्ति नहीं सुननी पड़ेगी।
इसी खेद से हम लोगों ने आज पुराण के रूपक जाल को फाड़ने में हाथ
डाला है। नहीं तो ऐसी मनोरम अपूर्व मरीचिका के ध्वंस करने में किस
की प्रवृत्ति हो सकती? अब इस के आगे सिद्धान्त ज्योतिष तथा आर्यभटीय
के विषय संक्षिप्त विचार किया जावेगा और अन्यान्य पुराणोक्त वा ब्राह्म-
णोक्त उपाख्यानों का वर्णन-सिद्धान्त शिरोमणि के अनुवाद की भूमिका में
लिखा जावेगा।
भूमिका ॥ २३
सिद्धान्तज्योतिषग्रन्थ ॥
भारतवासियो ! आप वेद और धर्मशास्त्र अध्ययन करते हैं, कोई वेद
और धर्मशास्त्र अध्ययनार्थ तैयार हैं; परन्तु आप जानते हैं ! यह क्या लिखा है-
“द्वे विद्ये वेदितव्यं इति हस्म यद्ब्रह्म विदोवदन्ति पराचैवा पराच ।
तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षाकल्पो व्याकरणं निरुक्तं
छन्दो ज्यौतिषमिति” ॥ मुण्डक उ० १ । १ । ४, ५ ॥
अर्थात्-विद्या दो प्रकार की है, एक परा दूसरी अपरा । इन में ऋग्वेद
यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त एवं ज्योतिष अपरा
विद्या है। और जिस विद्या से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान हो उसे परा विद्या कहते।
इन में से शिक्षा आदि वेदरूपी पुरुष के छः अङ्ग स्वरूप हैं जैसा कि कहा है-
“शब्द शास्त्रं मुखं ज्यौतिषं चक्षुषी, श्रोत्रमुक्तं निरुक्तञ्च कल्पः करौ ।
या तु शिक्षाऽस्य वेदस्य सा नासिका, पादपद्मद्वयं छन्द आदिर्बुधैः” ॥१०॥
अर्थात्-वेदरूपी पुरुष के व्याकरण तो मुख, ज्योतिष नेत्र, शिक्षा नासिका,
कल्प दोनों हाथ और छन्दः (शास्त्र) पैर हैं। क्या विना नेत्र के वेद पुरुष को
अन्धे रक्खेंगे एवं आप भी नेत्र हीन हो वेद के ज्योतिष सम्बन्धि गूढ़ मर्म
का ऊटपटाङ्ग अश्लील अर्थ कर आर्यों का प्राचीन गौरव नष्ट करेंगे ?
ज्योतिष शास्त्र कहने से-यह न समझ लीजिये कि केवल फलित के ग्रन्थों
ही को ज्योतिष कहते किन्तु संहिता, जातक आदि और सिद्धान्त मिल कर
ज्योतिष कहाता है। यह बात हम ही नहीं कहते किन्तु जगत् विख्यात पं०
बापूदेव शास्त्री जी की वक्तृता हमारे सू०सि० की भूमिकामें पढ़ लीजिये । और
महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी जी अपने “ गणक तरङ्गिणी ” नामक
ग्रन्थ में जिस में सिद्धान्त ज्योतिषियों का इतिहास लिखा है। लिखते हैं कि-
“ आधुनिका ज्योतिर्विदः फलमात्रैकवेदिनः ”
व्याकरण शास्त्र मज्ञात्वैव लघुपाराशरीबालबोधशीघ्रबोधमुहूर्त्तचिन्ता-
मणानीलकण्ठीवृहज्जातकजैमिनिसूत्राणामेकदेशेन मत्ता आत्मानं कृत कृत्यं-
ज्योतिषशास्त्रपारङ्गतमन्यन्ते। तत्र साहसिनो मकरन्दादिरचित सारण्यनुसारेण
तिष्याद्युपपत्तिं विनैवाऽऽधारसारणी च वस्तुतः शुद्धा वा नेति सर्वमबुद्ध्वैव
तिथिपत्रं विरचय्या ऽऽत्मप्रसिद्धिं कुर्वन्ति” । गणकतरङ्गिण्याम्” पृ० १३२ ॥
अर्थात्-आज कल प्रायः लोग, थोड़े से छोटे २ फलित ज्योतिष के ग्रन्थ शीघ्र
बोध, मुहूर्त्तचिन्तामणि आदि पढ़ २ कर आपे को ज्योतिषी मान बैठते और
२४ आर्य्यभटीयस्य-
तिथिपत्र बना २ कर अपनी प्रसिद्धि करते हैं और वास्तविक ज्योतिष
सिद्धान्त संहिता के ग्रन्थ नहीं पढ़ते इत्यादि । कतिपय ग्रन्थों में ज्योतिष
शास्त्र के पांच भेद लिखे हैं जैसा कि-
पञ्चस्कन्धमिदंशास्त्रं होरागणितसंहिता ।
केरलिशकुनश्चैव प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ प्रश्नरत्नटीकाकारः ।
अर्थात् ज्योतिषशास्त्र पांच प्रकार का है, १ होरा, २ गणित, ३ संहिता,
४ केरलि एवं ५ शकुन । इसी प्रकार पूर्वोक्त म० म० पं० सुधाकर जी ने उक्त
ग्रन्थ के प्रारम्भ में लिखा है कि- "अस्ति सिद्धान्तहोरासंहितारूपं स्कन्धत्र-
यात्मकमष्टादशमहर्षिप्रणीतं ज्योतिषशास्त्रं वेदचक्षूरूपं परम्परातः प्रसिद्धम् ।
अष्टादशमहर्षयश्च ज्योतिषशास्त्र प्रतिपादका ये तेषां नामानि प्रकाशितानि (१)
अत्र पुलस्त्य पौलिशयोर्भेदेन पराशरेण ज्योतिषशास्त्रप्रवर्त्तका एकोनविं-
शति संख्याका आचार्या अभिहिताः । केचनाष्टादशाचार्य्यानुरोधेन पुलस्त्यो-
मनुविशेषणपरश्चेति वदन्ति । नारदेन तु सूर्यं हित्वा सप्तदशाचार्या एव स्वसं-
हितायां प्रकाशिताः । तत्रापि ब्रह्माचार्यो वसिष्ठोऽत्रिरित्यादौ ब्रह्मसूर्यो वसि-
ष्ठोऽङ्गिरित्यनेपाठं वदन्ति ।
अथाहो एते संहिताकारा महात्मनो लगधस्य न कुर्व्वन्ति चर्चाम् । येन
महात्मना वेदाङ्गमूलरूपं ज्यौतिषं पञ्चवर्षयुगवर्णन परं विलक्षणं चक्रे ।
सूर्येण मयारुणकृते ब्रह्मणा नारदाय व्यासेन स्वशिष्याय वसिष्ठेन
माण्डव्यवामदेवाभ्यां पाराशरेण मैत्रेयाय पुलस्त्याचार्यो गर्गात्रिभिश्चैवं स्वस्व-
शिष्येभ्यो ज्योतिषशास्त्र विशेषाः प्रतिपादिताः । तथाचाह पराशरः ।
“नारदाय यथा ब्रह्मा, शौनकाय सुधाकरः ।
माण्डव्यवामदेवाभ्याम्, वसिष्ठोयतपुरातनम् ॥
नारायणो वसिष्ठाय, रामेशायापिचोक्तवान् ।
व्यासःशिष्याय सूर्योऽपि, मयारुणकृतेस्फुटम् ॥
पुलस्त्याचार्य्यगर्गात्रि, रोमकादिभििरीतम् ।
विवस्वता महर्षीणाम्, स्वयमेव युगेयुगे ॥
मैत्रेयाय मयाप्युक्तम्, गुह्यमध्यात्मसंज्ञकम् ।
शास्त्रमाद्यं तदेवेदम्, लोकेयच्चाति दुर्लभम् ॥
(१)-"सूर्यःपितामहो व्यासो वसिष्ठोऽत्रिपराशरः । कश्यपोनारदोगर्गो मरीचिर्मनुरङ्गिराः ॥
लोमशःपौलिशश्चैव च्यवनो यवनो भृगुः । शौनकोऽष्टादशाश्चैते ज्योतिःशास्त्रप्रवर्त्तकाः ॥
पराशरश्च —विश्वसृङ्नारदो व्यासो वसिष्ठोऽत्रि पराशरः । लोमशोयवनः सूर्य श्च्यवनः कश्यपो भृगुः ॥
पुलस्त्यःमनुगाचार्यो पौलिशःशौनकोऽङ्गिराः । गर्गोमरीचिरित्येते ज्ञेयाज्योतिःप्रवर्त्तकाः॥
भूमिका ॥ २५
अथैतेषामाचार्याणां समयादिनिरूपणं तत्तद्रचितसिद्धान्तानामलाभेऽतीव
काठिन्यमतो ऽस्माभिस्तोत्रज्योतिषसिद्धान्तग्रन्थकारपुरुषाणा मुत्तरोत्तरं ख-
ण्डनप्रतिखण्डनद्वारेण बहुविशेषरचयितॄणां यावच्छक्यं तत्तद्ग्रन्थमर्मस्थलानां
सम्यगवलोकनेन समयादिकं निरूप्यते ॥
उपरोक्त संस्कृत का आशय—नीचे लिखे सिद्धान्तज्योतिष के ग्रन्थों के
नाम तो पाये जाते हैं पर ये ग्रन्थ नहीं मिलते अतएव ये ग्रन्थ कब २ बने
इस का पता लगाना कठिन है ॥
सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थों के नाम ॥
ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ नाम ।
१ ब्रह्मसिद्धान्त । ६ मनुसिद्धान्त । ११ पुलस्तसिद्धान्त । १६ च्यवनसिद्धान्त
२ मरीचिसद्धान्त । ७ अङ्गिरस्सिद्धान्त । १२ वसिष्ठसिद्धान्त । १७ गर्गसिद्धान्त ।
३ नारदसिद्धान्त । ८ बृहस्पतिसिद्धान्त । १३ पराशरसिद्धान्त । १८ पुलिससिद्धान्त ।
४ कश्यपसिद्धान्त । ६ अत्रिसिद्धान्त । १४ व्याससिद्धान्त । १६ लोमशसिद्धान्त ।
५ सूर्य्यसिद्धान्त । १० सोमांसद्धान्त । १५ भृगुसिद्धान्त । २० यवनसिद्धान्त ।
आधुनिक पौरुष ज्योतिष ग्रन्थ ॥
ग्रन्थ नाम । ग्रन्थ कर्त्ता ग्रन्थनिर्माणकाल स्थान
१ आर्य्यभटीय । पं० आर्य्यभट ४२३ शाके पटना
२ पञ्चसिद्धान्तिका । पं० वराहमिहिर ४२७ ,, कालपी
३ ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त । पं० ब्रह्मगुप्त ५२० ,, भीलमाल (दक्षिणपश्चिमोत्तर)
४ द्विती. यआर्य्य सिद्धान्त । द्विती.यआर्यभट ८७५ ,,
५ सिद्धान्त शिरोमणि । पं० भास्कराचार्य्य १०७२ ,, दौलताबाद
६ सिद्धान्तसार्वभौम । पं० मुनीश्वर १५२५ ,, एलचपुर
७ तत्त्वविवेक । पं० कमलाकर भट्ट १५८० ,, विदर्भ
आर्यभटीय ॥
उपलब्ध पौरुष ज्योतिष ग्रन्थों में सब से पुराना—“आर्यभटीय” है ।
आर्यभट नामक ज्योतिषी ने आर्याछन्द के १२० श्लोकों में इस ग्रन्थ को शाके
४२३ में—स्थान कुसुम पुर (बिहार प्रान्त के अन्तर्गत पाटलिपुत्र या पटना)
में बनाया और इस ग्रन्थ का नाम “आर्यभटीय” रक्खा । लोग इसे “आर्य-
सिद्धान्त,” “लघु आर्यसिद्धान्त” या “प्रथमार्य-सिद्धान्त” भी कहते हैं। आर्य-
भट स्वयं अपने जन्मस्थान एवं ग्रन्थ निर्माणकाल के विषय में यों लिखते हैं कि —
“ब्रह्म कु शशिशुधभृगुरविकुजगुरुकोणभगणान्ममस्कृत्य ।
आर्य्यभटस्त्विह निगदति कुसुम पुरेऽभ्यर्चितं ज्ञानम्॥१॥आ०भ०ग०प०१श्लो०
भा०:--पृथिवी, चन्द्रमा, बुध, शुक्र, आदि अधिष्ठित परब्रह्म को नम-
२६ आर्य्यभटीयम्-
स्कार कर आर्य्यभट इस 'कुसुम पुर' (पटना) के लोगों से समाहृत आर्य्यभटीय
ग्रन्थ को कहते हैं ॥ १ ॥ पुनः—
“षष्ट्यब्दानां षष्टिर्यदा व्यतीतास्त्रयश्च युगपादाः ।
त्र्यधिका विंशतिरब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः ॥ आ०भ०गी०३श्लो०॥१९॥
भा०:–इस वर्त्तमान २८ वीं चौयुगी के चतुर्थ भाग में से तीसरे भाग के
६० वर्ष बीतने पर मेरा (आर्य्यभट का) जन्म हुआ। और मेरे जन्म काल
से अब तक २३ वर्ष बीत गयीं। वर्त्तमान महायुग के चतुर्थपाद के ३६०० सौ
वर्ष बीतने पर मेरी उमर २३ वर्ष की हुई। इसी समय मैं ने इस ग्रन्थ को
रचा ॥ १० ॥ पुनः आर्य्यभट ने यह भी लिखा है कि मैं ने यह ग्रन्थ प्राचीन
वैदिक ज्योतिष के अनुसार ही बनाया है–इसे नवीन रचना समझ कर लोग
इस की निन्दा न करें:–
“सदसज्ज्ञान समुद्रात् समुद्धृतं देवताप्रसादेन !
सञ्ज्ञानोत्तमरत्नं मया निमग्नं स्वमति नावा ॥” आ०भा०गी०४श्लो०४९
भा०:–ज्योतिषशास्त्ररूपी समुद्र में अपनी बुद्धिरूपी नौका पर सवार हो
समुद्र में निमग्न होकर ब्रह्मा (ब्रह्माकृत वेदाङ्ग ज्योतिष) की कृपा से सद्ज्ञान
रूप रत्न को मैं ने (आर्य्यभट ने) बाहर किया अर्थात् प्रकाशित किया॥४९॥पुनः–
“आर्य्यभटीयं नाम्ना पूर्वं स्वायम्भुवं सदा सद्यत् ।
सुकृतायुषोः प्रणाशं कुरुते प्रति कञ्चुकं योऽस्य ॥ आ०भ०गी०४श्लो०५०
भा०:–आदि काल में जिस ज्योतिषशास्त्र को वेद से निकाल कर लोक
में प्रचार किया गया उसी ज्योतिषशास्त्र को अर्थात् वैदिक ज्योतिषशास्त्रको
मैं ने (आर्य्यभट ने) “आर्य्यभटीय” नाम से प्रकाशित किया। इस शास्त्र में
जो कोई व्यक्ति मिथ्या दोष दिखलाकर इस का तिरस्कार करेगा–उस के
सुकृत, पुण्य वा यश एवं आयु का नाश होगा ॥ ५० ॥
इस “आर्य्यभटीय” में दो मुख्य भाग हैं और १०८ आर्या छन्द के श्लोक हैं
अतएव कोई २ इस को “आर्याष्टशत” भी कहते हैं। इन दो भागों को कोई २
टीकाकार–भिन्न २ दो ग्रन्थ मानते हैं–जैसा कि–इस के टीकाकारों में से
सूर्ययज्वन्–टीकाकार ने–इन भागों को दो प्रबन्ध मानकर प्रत्येक की आदि
में विघ्न शास्त्र्यर्थ मङ्गलाचरण किया है; अतएव बहुत से लोगों ने इन दो भागों
को भिन्न २ ग्रन्थ माना है। परन्तु ग्रन्थ देखने से मालूम होता है कि एक
भाग दूसरे भाग पर अवलम्ब रखता है। अर्थात् यदि एक को छोड़ दिया जावे
तो दूसरे का कुछ उपयोग नहीं रहता। इस लिये दोनों को मिलाकर एक
सिद्धान्त मानना ठीक है। स्वयं आर्य्यभट ने भी प्रथम भाग का कोई पृथक नाम
भूमिका ॥ २७
• नहीं रक्खा है और न उस के अन्त में उपसंहार ही किया है, एकत्र पूरे
(दोनों भागों का) ग्रन्थ के अन्त में ही उपसंहार किया है और "आर्य-
भटीय" ऐसा नाम रक्खा है। इसीप्रकार ग्रन्थकार ने ग्रन्थ भर में चार
पाद रक्खे हैं पाद का अर्थ चौथा भाग है और चतुर्थ भाग किसी पूरे १६
अंशों की वस्तु में होता है-अतएव प्रथम पाद के पूर्व दो श्लोक, प्रथम पाद
में १० श्लो०, द्वितीय में ३३ श्लो०, तृतीय पाद में २५ और चतुर्थ में ५०, यों सब
मिल कर १२१ श्लोक हैं। परन्तु "आर्याष्टशत" इस लेख को देख कर बहुतसे
युरोपियन विद्वानों ने भ्रम से इस ग्रन्थ में ८०० श्लोकों का होना माना
है। जो श्रीमान् डाक्टर करण साहब के-सन् १८७४ ई० के छप वाये संस्कृत टीका-
सहित आर्यभटीय के देखने से पाश्चात्य विद्वानों का ८०१ आर्या श्लो० होने
का भ्रम दूर हुआ। आर्यसिद्धान्त नाम से एक दूसरा भी ज्योतिष ग्रन्थ-
प्रसिद्ध है-उस पर विचार किया जाता है।
द्वितीय आर्यसिद्धान्त ॥
द्वितीय आर्यभट शाके ८७५ में हुए "प्रथम आर्यभट" के अतिरिक्त यह
एक द्वितीय "आर्यभट" नवीन हुए; अतएव इन्हें "द्वितीयआर्यभट" और
इन के ग्रन्थ को "द्वितीयआर्यसिद्धान्त" कहते हैं। पूना के "दक्षिण-
कालिज" में "द्वितीय आर्यसिद्धान्त की एक प्रति है जिस पर "लघुआर्य-
सिद्धान्त" लिखा है, परन्तु स्वयं ग्रन्थकार ने अपने ग्रन्थ में ग्रन्थ का
नाम "लघु" या "बृहत्" कुछ भी नहीं लिखा है। इस ग्रन्थ के पहिली
"आर्या" (छन्द) में लिखा है कि-
"विधि ध खगागम पाटी कुट्टक बीजादि दृष्टशास्त्रेण ।
आर्यभटेन क्रियते सिद्धान्तो रुचिर आर्याभिः" ॥
भाः-इन ने अपने ग्रन्थ को "सिद्धान्त" ऐसा लिखा है इस के पूर्व के
"आर्यभट" से यह नवीन हैं, (जो आगे सिद्ध होगा) इसलिये इन को
"द्वितीय आर्यभट" और इन के सिद्धान्त को "द्वितीय आर्यसिद्धान्त" कहते हैं।
इन ने अपना ग्रन्थ निर्माण या जन्मकाल के विषय में कुछ नहीं लिखा
है। किन्तु "पराशरसिद्धान्त" ग्रन्थ का मध्यम मान दिया है इससे इन
ने दोनों सिद्धान्त ग्रन्थों का उल्लेख किया है।
"एतत् सिद्धान्तद्वयमषिष्ट्यादि कलौ युगे जातम्" ॥ २ ॥ अध्याय २ ॥
इस के अनुसार कलियुग के थोड़े ही समय बीतने पर ये दोनों सिद्धान्त
रचे गये ऐसा दिखलाने का-इन का उद्देश्य है।