अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं हो सकता और 'अग्निहोत्रं जुहोति' इसको नामधेय आगे कहेंगे
उससे विरोध भी लगेगा । इस लिये 'अग्निहोत्रं' यह वाक्य अनर्थक होगा
ही । और यदि 'दध्ना जुहोति' इसीको उत्पत्ति विधि मानेंगे तो 'पयसा जुहोति'
यह वाक्य भी अनर्थक होजायगा । और यदि 'पयसा जुहोति' इसी को उत्पत्तिविधि
मानेंगे तो 'दध्ना जुहोति' यह वाक्य ही व्यर्थ हो जायगा अथवा कर्मान्तरका
विधायक होगा, क्योंकि 'दध्ना जुहोति' इस विधिसे दधि विशिष्ट ही यागका विधान
होगा अतः उसमें पयोरूपगुणका अन्वय नहीं हो सकता । तब अनेक अदृष्ट याग
की कल्पना करनी होगी । 'अग्निहोत्रं जुहोति' इसको उत्पत्ति विधि मानने से तो
'दध्ना जुहोति, पयसा जुहोति' इत्यादि सब वाक्योंको 'खले कपोत' न्यायसे एक साथ
ही अन्वय हो जाता है, अर्थात् जैसे खलियानमें सब कबूतर एक ही साथ गिरते
हैं उसी तरह एक ही समयमें दध्यादि गुणोंकी विधायकता माननेसे अनेक
अदृष्ट की कल्पना नहीं करनी पड़ती है, इसलिये 'अग्निहोत्रं जुहोति' इस
वाक्यको उत्पत्ति विधायकत्व ही है ।
विनियोगविधिः ।
अङ्गप्रधानसंबन्धबोधको विधिर्विनियोगविधिः । यथा 'दध्ना जुहो-
ती'ति । स हि तृतीया प्रतिपन्नाङ्गभावस्य दध्नो होमसंबन्धं विधत्ते दध्ना
होमं भावयेदिति ।
अब विनियोग विधिका लक्षण करते हैं द्रव्य देवतादि रूप अङ्गोंको दूसरे
वाक्यों से विहित प्रधान (होमादि) के साथ सम्बन्धके बोधक जो विधि उसे विनियोग
विधि कहते हैं । जैसे 'दध्ना जुहोति' इस वाक्य से 'दध्ना' इस तृतीयाश्रुतिसे बोधित
दधि रूप अङ्गको 'अग्निहोत्रं जुहोति' इस वाक्यसे बोधित अग्निहोत्र रूप
प्रधानके साथ सम्बन्धका विधान होता है इस लिये 'दध्ना जुहोति' यह विनियोग
विधि है । 'दध्ना जुहोति' इसवाक्य से 'दधिसे होमकी भावना करे' यह बोध होता है ।
गुणविधौ च धात्वर्थस्य साध्यत्वेनान्वयः । क्वचिदाश्रयत्वेनापि यथा
'दध्नेन्द्रियकामस्य जुहुया'दित्यत्र दधिकरणत्वेनेन्द्रियं भावयेत् । तच्च
किन्निष्ठमित्याकाङ्क्षायां संनिधिप्राप्तहोम आश्रयत्वेनान्वेति ।
यहां शङ्का होती है कि— 'दध्ना जुहोति' इसस्थलमें तो यही अर्थ होगा
कि 'दधिसे होमकी भावना करे' और होमसे इष्टकी भावना करे इस
बोधमें होममें दधि करण है इसलिये दधिकरणक भावनामें होमका