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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 109 में से

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( ८४ ) अपरोक्षानुभूतिः ।
सं. टी. अथ प्राणायामं लक्षयति चित्तादीति मनो-
धीनत्वात्प्राणस्य मनोनिरोधेनैव प्राणनिरोधः नतु-
प्राणनिरोधेनैव पातंजलाभिमतेन मनोनिरोधस्तदधीन-
त्वाभावादिति फलितार्थः ॥ ११८ ॥
भा. टी. चित्तको आदिले सब प्रकारके पदार्थोंमें जो
ब्रह्म भावना कर सब प्रकारकी इन्द्रियोंकी वृत्तियोंका जो
रोकनाहै सो प्राणायाम कहावे है ॥ ११८ ॥
निषेधनं प्रपंचस्य रेचकाख्यः समीर-
णः ॥ ब्रह्मैवास्मीति यावृत्तिः पूरकोवा-
युरीरितः ॥ ११९ ॥
सं. टी. अमुं प्राणायामं स्वाभिमतेन रेचकादिवि-
भागत्रयेण लक्षयति सार्द्धेननिषेधनमितिस्पष्टम् ११९॥
भा. टी. प्रपञ्चका निषेध अर्थात् मिथ्यात्वको रेचकनाम
प्राणायाम कहे हैं एक ब्रह्मही सर्व रूपहै ऐसी जो वृत्तिहै
सो पूरकनाम प्राणायाम कहावै है ॥ ११९ ॥
ततस्तद्वृत्तिनैश्चल्यं कुंभकः प्राणसं-
यमः ॥ अयंचापिप्रबुद्धानामज्ञानांघ्रा-
णपीडनम् ॥ १२० ॥
सं. टी. तत इति अनात्मोपेक्षाऽऽत्मानुसंधानतद्दा-
र्ढ्यानि रेचकादिशब्दवाच्यानीति भावार्थः । नन्वयं
त्रिविधोपि प्राणायामो न कुत्रापि श्रुत इत्यपेक्षायामा-