अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (८३)
भा. टी. दृष्टिको ज्ञानमय करके उस दृष्टिके द्वारा ब्रह्ममय
जो जगत्को देखनाहै यही दृष्टि परम उदार मङ्गलकी देनेवाली
है नासाके अग्रभागमें देखनेको दृष्टि नहीं कहे हैं ॥ ११६ ॥
दृष्टिदर्शनदृश्यानां विरामो यत्रवाभ-
वेत् ॥ दृष्टिस्तत्रैवकर्त्तव्या न नासाग्रा-
वलोकिनी ॥ ११७ ॥
सं. टी. ननु तथापि ब्रह्मणि वृत्तिप्रवृत्तिनिमित्त-
जात्याद्यभावादिंद्रियादिप्रत्यक्षविषयस्य जगतो ब्रह्म-
रूपत्वेन दर्शनं कथं स्यादित्याशंक्य स्वारस्यात्पक्षां-
तरेणाह दृष्टीति वा शब्दः पक्षांतरे दृष्टीत्यादिना श्रो-
त्रादिसर्वत्रिपुटीनामुपलक्षणं यत्र यस्मिन् ब्रह्मस्वरूपे
दृष्ट्यादिसर्वत्रिपुटीनां विरामो लयो भवेत्तत्र तस्मि-
न्नेव प्रपंचातीते दृष्टिरंतःकरणवृत्तिः कर्तव्या न नासि-
काग्रावलोकिनीत्यर्थः ॥ ११७ ॥
भा. टी. और जिसमें दृष्टि दर्शन दृश्यका विराम होय है
उसकोभी दृष्टि कहें हैं वहीदृष्टि करना योग्य है नासाके अग्र-
भागमें देखना मात्ररूप जो दृष्टि है सो योग्य नहींहै ॥११७॥
चित्तादिसर्वभावेषु ब्रह्मत्वेसर्वभावना-
त् ॥ निरोधःसर्ववृत्तीनां प्राणायामःस-
उच्यते ॥ ११८ ॥