अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 109 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ८१ )
सं. टी. प्रसंगादासनविशेषं लक्षयति सिद्धमिति
सिद्धंच तदासनंचाथवासिद्धानामासनं सिद्धासनमिति
कर्मधारयतत्पुरुषसमासाभ्यां ब्रह्मैवेत्यर्थः ॥ ११३॥
भा. टी. जिससे सिद्धपुरुष सिद्ध कहलावें हैं और जिसमें
सिद्ध पुरुष लीन रहें हैं और जो विश्वका अधिष्ठान स्वरूप
अव्यय है वह सिद्धासन कहावे है ॥ ११३ ॥
यन्मूलं सर्वभूतानां यन्मूलं चित्तबंध-
नम् ॥ मूलबंधः सदासेव्यो योग्योऽसौ
राजयोगिनाम् ॥ ११४ ॥
सं. टी. अथ मूलबंधं लक्षयति यन्मूलमिति आ-
काशादिसर्वभूतानां यन्मूलमादिकारणं ब्रह्म तथा चित्त-
बंधनं चित्तस्य बंधकारणं मूलाऽज्ञानं तदपि यन्मूलं
यदाश्रयं पृथक्सत्ताशून्यत्वादिति यद्वा चित्तस्य बंधनं
एकत्रलक्ष्ये निग्रहस्तदपि यन्मूलं यस्य ब्रह्मणः प्राप्ति-
निमित्तमित्यर्थः स मूलबंध इत्यन्वयः राजयोगिनां
व्यवहारेप्यविक्षिप्तचित्ततालक्षणो राजयोगस्तद्वतां ज्ञान-
परिपाकयुक्तानामित्यर्थः शेषंस्पष्टम् ॥ ११४ ॥
भा. टी. आकाशादिपञ्चभूतोंका आदि कारण और जो
चित्तैकाग्र्यका मूल है सो मूलबन्ध कहावे है यह मूलबन्ध
राजयोगियोंको सदा सेवन करना योग्य है ॥ ११४ ॥