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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 109 में से

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पृष्ठ 86

( ८० ) अपरोक्षानुभूतिः ।
तआरभ्य कलनात्सर्गस्थितिप्रलयाधारत्वादित्यर्थः शेषं
स्पष्टम् ॥ १११ ॥
भा. टी. जिसके निमेषमात्रमें ब्रह्मादि सर्वभूतोंका कलन
(सृष्टि, स्थिति, प्रलय, ) होयहै इस कारण अखण्ड आनन्द-
स्वरूप अद्वय ब्रह्मही काल शब्द करके कहाजायहै ॥ १११ ॥
सुखेनैवभवेद्यस्मिन्नजस्रंब्रह्मचिंतनम् ॥
आसनं तद्विजानीयान्नेतरत्सुखनाश-
नम् ॥ ११२ ॥
सं. टी. आसनं लक्षयति सुखेनैवेति यस्मिन्सुखे
सुखरूपे ब्रह्मणि चिंतनं कर्त्तव्याकर्त्तव्यचिंता नैवभवेत्
तद्ब्रह्मासनं विजानीयादित्यन्वयः कीदृशं ब्रह्म अजस्रं
कालत्रयावस्थायीत्यर्थः सुगममन्यत् ॥ ११२ ॥
भा. टी. जिसमें सदा भलीप्रकार सुखसे ब्रह्म विचार होय
उसको आसन कहैं हैं उससे अतिरिक्तमें ब्रह्म विचार नहीं
होय है इस कारण आसनसे अन्य सुखकारक नहीं होय है
किन्तु सुख नाश होयहै । सो आसन पद्म स्वस्तिकादिक
जानना ॥ ११२ ॥
सिद्धं यत्सर्वभूतादि विश्वाधिष्ठानम-
व्ययम् ॥ यस्मिन् सिद्धाः समाविष्टा-
स्तद्वै सिद्धासनंविदुः ॥ ११३ ॥