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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 109 में से

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पृष्ठ 72

( ६६ ) अपरोक्षानुभूतिः ।
ज्ञाननिवृत्तौ प्रारब्धाभावइति श्लोकार्थः । पदार्थस्तु
स्फुटएव ॥ ९१ ॥
• भा. टी. तत्त्वज्ञानके अनन्तर प्रारब्ध अर्थात् कर्म्मफल
नहीं रहताहै क्योंकि जैसे स्वप्नमें नानाप्रकार विचित्र विचित्र
प्रकार देखनेमें आवैं हैं और जब पुरुष जगैहै तौ सबझूटे
होजायहैं इसी प्रकार आत्मज्ञान होनेसे देहादि असत् स्वरूप
मालूम होने लगैं हैं और जब देहादिक असत् हुए हैं तब
प्रारब्ध कर्म्म और उनके फलभी असत्स्वरूप होजायहैं॥९१॥
कर्मजन्मांतरीयं यत्प्रारब्धमितिकी-
र्तितम् ॥ तत्तूजन्मांतराभावात्पुंसोने-
वास्तिकर्हिचित् ॥ ९२ ॥
सं. टी. इदानीं प्रारब्धशब्दं व्युत्पादयन्नुक्तमुपसंह-
रति कर्म्मोति तत्र कर्म त्रिविधं संचितक्रियमाणप्रारब्ध-
भेदात् तन्मध्ये भाविदेहारंभकं संचितं तथावर्तमान
देहनिर्वर्त्त्यंक्रियमाणं प्रारब्धंतु वर्तमानदेहारंभकं तत्र
यद्यपि संचितं जन्मांतरीयमेव तथापि भाविदेहस्य त-
त्प्रारब्धमेव भवति तेनेदं सिद्धमात्मनः स्वतः कर्तृत्वा-
भावात्कालत्रयेपि जन्मनास्तीति सर्वमवदातम् ॥ ९२॥
भा.टी. पूर्व जन्मके कर्म्म प्रारब्ध कहैं हैं और जब पुरुषको
तत्त्वज्ञान होय है फिर जन्म नहीं होयहै यदि जन्म नहीं
हुआ तौ कर्मका भोक्ता कोन होय इस कारण तत्त्वज्ञान होनेके