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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ६७ )
अनन्तर पुरुष कर्म्मफलका भोक्ता नहीं होयहै । जन्म नहीं
होनेमें यह श्रुति प्रमाणहै ( “नं स पुनरावर्त्तते” ) ॥ ९२ ॥
स्वप्नदेहोयथाध्यस्तस्तथैवायं हि देह-
कः ॥ अध्यस्तस्य कुतोजन्म जन्मा-
भावे हि तत्कुतः ॥ ९३ ॥
सं. टी. पूर्वोक्तं दृष्टांतं विवृण्वन्सकारणजन्माभावे
युक्तिमाह स्वप्नेति जन्माभावे तत्प्रारब्धं कुतः स्पष्ट
मन्यत् ॥ ९३ ॥
भा. टी. स्वप्नके देहकी तरह यह देह अध्यस्त ( विनष्ट )
है फिर जन्म किसप्रकार होसकै है इससे किसप्रकार
प्रारब्ध अर्थात् पूर्व जन्मके कर्म्मफलको भोगसकै है ।
क्योंकि जब जन्महोय तौ कर्म्म भोगै जन्मही नहीं तौ कर्म्म
कहां ॥ ९३ ॥
उपादानं प्रपंचस्य मृद्भांडस्येवकथ्य-
ते ॥ अज्ञानं चैववेदांतैस्तस्मिन्नष्टेक्व
विश्वता ॥ ९४ ॥
सं. टी. ननु देहादिप्रपंचस्य यतोवेत्यादिश्रुतेः सत्य
ब्रह्मजन्यत्वात्कथंप्रातिभासिकत्वमितिचेदुच्यते उपा-
दानमिति अत्र कारणं द्विविधं निमित्तोपादानभेदात्
तत्र निमित्तं नामोत्पत्तिमात्रकारणं उपादानंतूत्प-
त्तिस्थितिलयकारणं तत्र वेदांतैः ‘ मायां तु प्रकृतिं वि