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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ६४ ) अपरोक्षानुभूतिः ।
मम् ॥ अभावात्सर्वभावानांदेहस्य चा-
त्मता कुतः ॥ ८८ ॥
सं. टी. एतदेव विवृणोति सर्वमिति आत्मता देह-
स्य नेत्यर्थः स्पष्टमन्यत् ॥ ८८ ॥
भा. टी. जब स्थावर जङ्गम सम्पूर्ण जगत् आत्मस्वरूप मालूम
होने लगे है तब सब पदार्थोंके अनित्य होनेसे देह जो आत्मा
किस प्रकार होसके है अर्थात् कभीभी नहीं होय है ॥ ८८ ॥
आत्मानंसततंजानन्कालंनयमहाद्यु-
ते ॥ प्रारब्धमखिलंभुंजन्नोद्वेगंकर्तुम-
र्हसि ॥ ८९ ॥
सं. टी. ननु ज्ञानिनो निष्प्रपंचात्मतया मम किं स्यात्
ब्रह्मण्यभोजनेनान्यस्तृप्यतीतिचेदतआह आत्मानमि-
ति भोमहाद्युते कामादिपराभवेन स्वहितसाधनोन्मु-
खस्त्वं आत्मानं प्रत्यगभिन्नं सततं आसुप्तिमृतिपर्यन्तं
जानन् वेदांतवाक्यैर्विचारयन् कालं नयातिक्रामस्व,
विचारसाध्यज्ञानानंतरं चाखिलं प्रारब्धं चरमदेहारं-
भकं कर्म भुंजन् सुखदुःखाभासानुभवेन क्षपयन्समुद्वेगं
कर्तुनाहर्सीत्यर्थः ॥ ८९ ॥
भा.टी. हे महामते ! सदा आत्माको जानता हुआ सम-
यको व्यतीत कर समस्त प्रारम्भ किये हुए कर्म्मके फलको
भोगता हुआ उद्वेग मत कर ॥ ८९ ॥