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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (४१)
पूर्वावस्थामपरित्यज्यावस्थांतरप्राप्तिलक्षणविवर्त्तोपादान
त्वमेवोक्तं नारंभोपादानत्वं नापि परिणामोपादानत्व
मिति बोध्यं अन्यत् स्पष्टम् ॥ ४४ ॥
भा. टी. जिस समय रज्जुके स्वरूपका अज्ञान होय है
( अर्थात् यह रज्जुहै जब ऐसा ज्ञान नहीं होयहै ) तब रज्जुमें
भ्रान्ति होयहै ( अर्थात् अज्ञानसे रज्जुको सर्प समझै है) इसी
प्रकार जिससमयपर्य्यन्त आत्माका ज्ञान नहीं होयहै तब-
तक अज्ञानवशसे आत्माके विषयमें पुरुष नाना प्रकारकी
कल्पना करैहै ॥ ४४ ॥
उपादानं प्रपंचस्य ब्रह्मणोऽन्यन्न वि-
द्यते ॥ तस्मात्सर्वप्रपंचोयं ब्रह्मैवास्ति
न चेतरत् ॥ ४५ ॥
सं. टी. अत्र हेतुं दर्शयन् पूर्वोक्तमुपसंहरति उपा
दानमिति । यस्मात्प्रपंचस्याकाशादिदेहांतस्य जगद्वि-
स्तारस्य ब्रह्मणो मायाशबलाच्चैतन्यादन्यत्परमाणवो
यद्वा प्रकृतिरुपादानं कारणविशेषो न विद्यत इति “त-
स्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः” इत्यादिश्रुतेः
तस्माद्धेतोरिति स्पष्टमन्यत् ॥ ४५ ॥
भा. टी. ब्रह्मके सिवाय इस प्रपञ्चका उपादान कारण
और कोई नहीं होसकैहै इसकारण सम्पूर्ण प्रपञ्च ब्रह्मही है
( अर्थात् सर्व संसार ब्रह्मस्वरूप है ) और कुछ नहीं है ॥४५॥