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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 109 में से

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पृष्ठ 46

( ४० ) - अपरोक्षानुभूतिः।
स्यांचिदवस्थायामपि भेदो नयुक्तो नयथार्थइत्यर्थः त-
र्हिजीवभेदःसत्यः स्यादित्यत आह जीवत्वमिति जीवत्वं
चकारोप्यर्थः मृषा मिथ्या ज्ञेयं तदुपाधेरेवांतःकरणादे-
र्मायामयत्वादित्यर्थः । अधिष्ठानसत्यत्वेन कल्पितस्य
मिथ्यात्वबोधे दृष्टांतमाह रज्जाविति यथारज्जौ तदज्ञा-
नात् वक्रतादिसादृश्येन मंदांधकारे सर्पग्रहः सर्पबु-
द्धिरव्युत्पन्नस्य भवति न तु व्युत्पन्नस्य तथैवात्मन्या-
त्माज्ञानात् प्रकाशसादृश्यादविशेषप्रकाशे चिज्जडग्रं-
थिरूपचिदाभासभ्रमो भवत्यविवेकिनां न तु विवेकिना
मिति वेदांतसिद्धांत रहस्यम् ॥ ४३ ॥
भा, टी. चैतन्यको (भूत भौतिक प्रपञ्चका जो आधान
है उसको चैतन्य कहते हैं ) एकरूप होनेसे और आत्माको
चैतन्यस्वरूप होनेसे देह और आत्माका भेद कभीभी युक्ति
युक्त नहीं है जिसतरह रज्जुमें वह सर्पका भ्रम होय है वास्तव
में वह सर्प नहीं होय है तिसीप्रकार आत्मासे भिन्न जीवका
मानना वृथा है ॥ ४३ ॥
रज्ज्वज्ञानात् क्षणेनैव यद्वद्रज्जुर्हि स-
र्पिणी ॥ भाति तद्वच्चितिः साक्षाद्वि-
श्वाकारेण केवला ॥ ४४ ॥
सं.टी. इदानीं पूर्वोक्तमेव दृष्टांतं विवृण्वन् सर्वस्यापि
प्रपंचस्य ब्रह्मरूपतामाह रज्ज्वाति। केवलेति विशेषणेन