सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 38, कुल 109 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 38

( ३२ ) अपरोक्षानुभूतिः ।
सं.टी.तदेवातिवैलक्षण्यं दर्शयति अहमिति । अह-
महंशब्दप्रत्ययालंबन आत्मा द्रष्टृतया शब्दादिविषयप्र-
काशकतया सिद्धः शब्दंशृणोमीत्यादिव्यवहारेण प्र-
सिद्धः देहस्तु दृश्यतया शब्दादिवत्प्रकाश्यतया स्थितः
तत्र हेतुमाह ममेति ममायं देह इति घटादिवत्स्वीय-
संबंधितया निर्देशात् व्यवहारात् एवमुभयोर्वैलक्षण्ये
सति कथं देहकः पुमान् स्यादिति व्याख्यातार्थश्चतुर्थ-
पादः एवमग्रेपि बोद्धव्यम् ॥ ३२ ॥
भा. टी. यह मेरा है इस प्रकार निर्देश करनेसे आत्मा द्रष्टा
( देखने वाला ) देह दृश्य ( देखने लायक ) है.इसप्रकार प्रतीत
होयहै। फिर आत्मा किसप्रकार देहमय हो सकै है ॥ ३२ ॥
अहं विकारहीनस्तु देहो नित्यं विकार
वान् ॥ इति प्रतीयते साक्षात्कथं ० ॥ ३३ ॥
सं.टी. पुनर्वैलक्षण्यांतरमाह अहमिति अहं व्याख्या
तार्थः विकारहीनः जायतेस्तीत्यादिषड्विकारहीनः तुवै-
लक्षण्ये देहो नित्यं सर्वकालं विकारवान् अत्रकिंप्रमाण-
मत आह इतीति इति साक्षात् प्रत्यक्षप्रमाणेन प्रतीयते
अनुभूयते एवं सतिकथं स्याद्देहकः पुमानिति ॥ ३३ ॥
भा. टी. आत्मा विकाररहित है और देह सदा विकार-
वान् है ऐसा साक्षात् प्रतीत होय् है फिर किस प्रकार आत्मा
देहमय होसकै है ॥ ३३ ॥