सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 109 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ३३ )
यस्मात्परमिति श्रुत्या तयापुरुषलक्ष-
णम्॥ विनिर्णीतं विमूढेन कथं०॥३४॥
सं.टी.एवं युक्त्या देहात्मनोर्वैलक्षण्यमुक्तवा श्रुत्या-
प्याह यस्मादिति । “यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मा-
न्नाणीयो नज्यायोस्तिकश्चित् । वृक्षइव स्तब्धो दिवि ति-
ष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णंपुरुषेण सर्वम् ” इति तया प्रसिद्धया
तैत्तिरीयश्रुत्याकृत्वेति करणे तृतीया पुरुषस्यात्मनो ल-
क्षणं विमूढेन विगतमूढभावेनातिचतुरेण श्रुत्यर्थविवेच-
नकुशलेनेत्यर्थः इयं कर्तरितृतीया विनिर्णीतं विचार्य
स्थापितं अन्यत्पूर्ववत् यद्वा श्रुत्येति कर्तृपदमस्मिन्प-
क्षे विमूढेनेति देहात्मवादिनं प्रति संबोधन विमूढानां
इन स्वामिन् मूर्खशिरोमणित्वादेव श्रुतिं नाद्रियस इ-
तिभावः ॥ ३४ ॥
भा. टी. “ यस्मापरं नापरमस्ति किञ्चित् यस्मान्नाणीयो
नज्यायोऽस्तिकश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं
पूर्णं पुरुषेण सर्वम्”इति श्रुतिः । अर्थात् जिससे पर अपर कुछ
नहीं है जिससे और उत्कृष्ट नहीं है जिससे कोई सक्ष्म नहीं है
जिससे कोई प्रधान नहीं है जो एक आत्मा वृक्षकी तरह स्तब्ध
होकर स्वर्गमें वर्तमान है वही आत्मा इस सम्पूर्ण जगत्को
परिपूर्ण रखताहै । इस श्रुतिसे परमात्माका लक्षण निर्णयकिया
गया है फिर वह आत्मा किस प्रकार देहमय होसक्ताहै॥ ३४ ॥