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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( १७ )
ताद्व कुतो न दृश्यते तत्राह सूक्ष्ममिति सूक्ष्मं मनोवा
गार्दीन्द्रियागोचरं तेषां प्रवृत्तिनिमित्तजातिक्रियादिशू-
न्यत्वादित्यर्थः ब्रह्मण उपादानत्वे दृष्टांतमाह यथैवेति
यथैव मृत्घटादीनामुपादानं तथैवेत्यर्थः एवंप्रकारेण
कार्यकारणभेदो नाममात्रमिति सूचितम् ॥ १५ ॥
भा. टी. जैसे मृत्तिका घटका उपादान कारणहै और
सुवर्ण कुण्डलादिका कारणहै इसी प्रकार जो एक ‘सूक्ष्म’
सत्यस्वरूप, अविनाशी अज्ञान ‘सङ्कल्प’ इनका जो उपादान
कारण है सोई इस जगत्का उपदान कारणहै इसका जो
निरूपण है सो विचार कहावे है ॥ १५ ॥
अहमेकोपि सूक्ष्मश्च ज्ञाता साक्षी सद
व्ययः ॥ तदहं नात्र सन्देहो विचारः
सोऽयमीदृशः ॥ १६ ॥
सं. टी. ननु यद्यपि कार्यकारणभेदो वाचारंभणमा
त्रस्तथापि जीवब्रह्मणोर्भेद्दोवास्तवः स्यादित्याशंक्याह
अहमिति अत्र यत इत्यध्याहारस्तथाचायमर्थः यतोह-
महंप्रत्ययवेद्योप्येकः सजातीयादिभेदशून्यो मनुष्यमा-
त्रेप्यहंबुद्धेरेकत्वप्रतीतेरित्यर्थः च पुनः सूक्ष्म इंद्रिया-
गोचरः पुनर्ज्ञाताऽहंकारादिप्रकाशकत्वेन चेतन इत्यर्थः
तथा साक्षी साक्षादिन्द्रियार्थसन्निकर्षं विनैवेक्षते पश्यति
प्रकाशयतीति साक्षी निर्विकार इत्यर्थः अत एव