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अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( १६ ) अपरोक्षानुभूतिः।
त्यादिलक्षणोऽन्तःकरणपरिणामः कारणानुकूलव्यापार
वान् कर्त्ता शेषं पूर्वोक्तम् ॥ १४ ॥
भा. टी. समस्त जगत् अज्ञानसे उत्पन्न होयहै ( अज्ञान
ये है इस सब संसारकी कल्पना होयहै ) ज्ञान होयहै तब नष्ट-
प्राय मालूम होयहै ( अर्थात् ज्ञानका प्रकाश होनेसे स्वरूप
जानाजायहै इसीकारण ज्ञानावस्थामें इस पुरुषको सङ्कल्प
विकल्प नहीं होयहैं ) नानाप्रकारका जो सङ्कल्पहै सो इस
संसारका कर्त्ता है इस प्रकार जो चिन्तनाहै सो विचारहै॥१४॥
एतयोर्यदुपादानमेकं सूक्ष्मं सदव्य-
यम् ॥ यथैव मृद्घटादीनां विचारः सो-
यमीदृशः ॥ १५ ॥
सं. टी. अथोपादानं किमस्तीत्यस्य निर्णयमाह
एतयोरिति एतयोरज्ञानसंकल्पयोर्यदुपादानं उत्पत्ति-
स्थितिनाशाय कारणं तत्तु सत्कालत्रयाबाध्यं ब्रह्मैव
नान्यदित्यर्थः अत एवाधिष्ठानज्ञाननिवर्त्त्याऽज्ञानका-
र्य्यत्वेन मिथ्याभूतमपि जगत् यावज्ज्ञानोदयं रज्जुसर्पा-
दिवत् संसारभयव्यवहारक्षमं भवेदितिभावः ब्रह्मणःस-
त्त्वेहेतुः अव्ययमिति अव्ययमपक्षयरहितं अनेनैतत्पूर्व-
भूताअपि जन्मादिविकारा निरस्ताः नाशश्च निरस्तः
षड्भावविकारराहित्ये हेतुः एकं सजातीयादिभेदशून्यं

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