अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 109 में से
संदर्भ में पढ़ें( १२ ) अपरोक्षानुभूतिः ।
पुरुषार्थं विशिनष्टि शुभमिति शुभं परमानन्दरूपत्वेन
मंगलं मोक्षसुखमित्यर्थः इच्छता प्रार्थयता आत्मनः
शुभमिति वान्त्रयः ॥ १० ॥
भा. टी. ऊपर कहे हुए वैराग्य आदि साधनों करके युक्त
अपना शुभ चाहनेवाले पुरुषको ज्ञानकी सिद्धिके निमित्त
विचार करना योग्यहै । (ऊपर कहे हुए साधनोंकरके युक्त )
इसकारण कहा कि 'शान्तो दान्तः' ऐसी वेदकी श्रुतिहै
अर्थात् शम, दम युक्त पुरुष वेदान्तका अधिकारी होय है । जैसे
और जगहभी कहाहै "प्रशान्तचित्ताय जितेन्द्रियाय प्रक्षीणदो-
षाययथोक्तकारिणे ॥ गुणान्वितायानुगताय सर्वदा प्रदेयमेतत्
सकलं मुमुक्षवे ॥ १ ॥" शान्तचित्त जितेन्द्रिय दोषरहित
शास्त्रोक्त कार्य्य करनेवाले शास्त्रोक्त गुणोंकरके युक्त शुभ
आचरण करनेवाले तथा मोक्षकी इच्छा करनेवाले पुरुषको
यह शास्त्र देना चाहिये ॥ १० ॥
( ज्ञानकी आवश्यकता )
नोत्पद्यते विना ज्ञानं विचारेणान्यसा-
धनैः ॥ यथा पदार्थभानं हि प्रकाशेन
विना क्वचित् ॥ ११ ॥
सं. टी. ननु ज्ञानसिद्धयर्थं विचार एव कर्तव्य इति
नियमः कुतः क्रियत इत्याशंक्य सदृष्टांतमाह नोत्पद्य-
तइति विचारेण विना अन्यसाधनैः कर्मोपासनालक्षणैः