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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (९५)
भा. टी. जब कार्य कारणभाव निवृत्तहोय है तब शुद्ध
मन और वाणीसे अगोचर जो ब्रह्मवस्तु है सोई रहे है जैसे
घटका नाश होने पर मृत्तिका ही बाकी रहे है ऐसा ही
वारम्वार समझना ॥ १३६ ॥
अनेनैव प्रकारेण वृत्तिर्ब्रह्मात्मिका भ-
वेत् ॥ उदेति शुद्धचित्तानां वृत्तिज्ञानं
ततः परम् ॥ १३७ ॥
सं. टी. न केवलमयं विचारो ज्ञानसाधनमेवांपितु
ध्यानसाधनमपीत्याह अनेनेति अनेनैवप्रकारेण शुद्ध-
चित्तानां वृत्तिज्ञानम् उदेति ततः परं ब्रह्मात्मिका वृत्ति-
र्भवेदिति योजना पदानामर्थस्तु स्फुट एव ॥ १३७ ॥
भा. टी. इस प्रकार ब्रह्मात्मिका वृत्तिहोय है तदनन्तर
शुद्ध चित्तहोनेसे वृत्तिके ज्ञानका उदय होय है ॥ १३७ ॥
कारणं व्यतिरेकेण पुमानादौ विलो-
कयेत् ॥ अन्वयेनपुनस्तद्धि कार्ये नि-
त्यं प्रपश्यति ॥ १३८ ॥
सं.टी. तमेव विचारं विशदयति द्वाभ्यां कारणमिति
आदौ प्रथमं कारणं व्यतिरेकेण कार्यविरेहेण विचारयेत्
पुनस्तत् कारणमन्वयेनानुवृत्त्या कार्येपि नित्यं
प्रपश्यतीति ॥ १३८ ॥
भा. टी. मुमुक्षु पुरुष पहले कारणके विना कार्य्यकी