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अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ९६ ) अपरोक्षानुभूतिः ।
उत्पत्ति नही होय इससे व्यतिरेकानुमानसे कारणका निश्चय
करै ( यथाहि कार्य्यं सकारणकम् ) ऐसे अनुमानमें ( यदि
कारणं न स्यात् तर्हि कार्य्यमपि नस्यात् कार्य्यं दृश्यते अतः
कारणमप्यनुमीयते ) यदि कारण नहीं होयतौ कार्य्यभी
नहींहोय कार्य्य है इस कारण कारणका अनुमान किया जाय
है । इस प्रकार व्यतिरेकानुमान होय है ॥ १३८ ॥
कार्ये हि कारणं पश्येत्पश्चात्कार्यं विस-
र्जयेत् ॥ कारणत्वंततोगच्छेदवशिष्टं
भवेन्मुनिः ॥ १३९ ॥
सं. टी. अथवैवं विचारयेदित्याह कार्येति आदौ
कार्ये कारणमेव विचारयेत् पश्चात्तत्कार्यं विसर्जयेत्
नानुसंदध्यात् कार्यवर्जने सति कारणत्वं स्वत एव
गच्छेत् एवं कार्यकारणवर्जनेऽवशिष्टं सच्चिन्मात्रं मुनि-
र्मननशीलः स्वयमेव भवेदिति ॥ १३९ ॥
भा. टी. पहले कार्य्यसे कारणका निश्चय करै पीछे
कार्य्यका त्याग कर देय, कार्य्यका त्याग करनेपर कारण
आपही अवशिष्ट रह जाय है इसी प्रकार कार्य्यके वर्जित
होनेसे मुनिगण स्वयं चिन्मय स्वरूप होजाय हैं ॥ १३९ ॥
भावितं तीव्रवेगेन यद्वस्तु निश्चयात्म-
ना ॥ पुमांस्तद्धि भवेच्छीघ्रं ज्ञेयं भ्रम-
रकीटवत् ॥ १४० ॥