अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
386 अपराजितपृच्छा
सीमा करसहस्रं तु आयामो विस्तरः समः।
चतुःषष्टिपदं कुर्याद् ब्रह्मरन्ध्रप्रमाणतः ॥ 16 ॥
यदि क्षेत्र की सीमा एक हजार गज हो और आयाम भी उसके ही समान एक
हजार गज का हो तो उसको भी चौंसठ पदों में विभाजित करें और उसमें भी
ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् मध्य का रिक्त भाग प्रमाणानुसार ही रखें।
नगरस्य केन्द्रे ब्रह्मप्रासादं —
चतुर्मुखं चतुर्द्वारं चतुर्वक्त्रं पितामहम्।
कुर्यान्नगरकेन्द्रे च प्रासादं कमलोद्भवम् ॥ 17 ॥
इस तरह का क्षेत्र विभाजन करके नगर के केन्द्र में कमलोद्भव ब्रह्मा का
प्रासाद, मन्दिर को बनाएँ जिसके चारों और चार द्वार हो जो ब्रह्मा के चारों मुखों के
दर्शन सुलभ करा सकें।
चतुरो वरुणाद्यांश्च चतुर्दिक्षु यथाक्रमम्।
महास्थानेषु चत्वाराश्चतुःकर्णेषु संस्थिताः ॥ 18 ॥
इसी तरह उस नगर के चारों दिशाओं में वरुणादि चारों देवों को स्थिति दें और
क्रम से चारों कोनों के महास्थान में भी देवताओं के मन्दिर बनाएँ।
सीमान्तेषु च सर्वेषु चतुःषष्ट्यादिसाधिते।
प्राकार उत्तमः कार्यो नवहस्तैः समुच्छ्रितः ॥ 19 ॥
नगर के सभी सीमान्त भागों पर चौंसठ पदों के साधने के पश्चात् नौ गज ऊँची
उत्तम दीवार या प्राकार बनाएँ।
द्विहस्तोच्छ्रिता च कार्या त्रिगूढा कण्डवारणी।
तत्तुल्योदयमाना कपिशीर्षैर्घनाकुला ॥ 20 ॥
उस प्राकार के ऊपर भी दो गज की ऊँचाई की त्रिगूढ़ा कण्डवारणी अर्थात्
तीन खण्डो की डोली बनाएँ। उसमें दो गज की ही ऊँचाई के कंगूरे पास-पास
बनाएँ।
कर्णे कर्णे तु कर्त्तव्या वृत्ताट्टालकशोभना।
(त्रि)सहस्रान्ते पुनः कुर्याद्योधविद्याधरीं तथा ॥ 21 ॥
इस परकोटे के प्राकार के प्रत्येक कोने के भाग में गोलाकार गुम्बद युक्त
अट्टालिका शोभायमान करें। इसी तरह प्राकार के प्रति तीन हजार गज की दूरी पर
पुनः योध विद्याधरी अर्थात बारहदरी बनाएँ।
सूत्र-७० 387
तत्तद्भागप्रमाणेण कुर्यात् सिंहावलोकनम्।
प्रतोलीनां तु चत्वारि चक्रद्वाराणि कल्पयेत् ॥ २२ ॥
उस बारहदरी में भी उसके उचित भाग प्रमाण से सिंहावलोकन अर्थात् गोखड़े,
झरोखें बनाएँ। उस नगर की प्राकार में चार बड़ी-बड़ी पोलें बनाएँ। उनके सुदृढ़
चक्रद्वार अर्थात् घूमने वाले किंवाड़ बने हुए हों।
अष्टौ सटक्क्या द्वाराणि प्रशस्तानि शुभानि च।
खटक्की सर्वद्वारेषु कुर्यात् सोपानसञ्चयम् ॥ २३ ॥
इसी तरह प्रत्येक पोल के अलावा प्राकार के चारों दिशाओं में दो-दो खिड़की
द्वार अर्थात् छोटे आवागमन के द्वार— इस तरह चारों और आठ द्वार भी बनाएँ जो
प्रशस्त और शुभ माने गए हैं। साथ ही यह भी ध्यान रखें कि इन सभी खिड़की
द्वारों में छोटी खिड़की भी अवश्य रखें जिसमें से निकलने के लिए सीढ़ियाँ बनी हों
ताकि उन पर चढ़कर खिड़की से आवागमन हो सके।
रथमार्गोद्भवं शस्तं प्रतोलीषु प्रवेशनम्।
कपाटाः सर्व
300 ...अपराजितपृच्छा
षड्विधं तदधः पीठं मालिकास्त्वेकविंशतिः ।₂₁
तन्मध्ये देवताः सर्वे स्वर्गपातालवासिनः ॥ 26 ॥
उस कीर्तिस्तम्भ के अधःपीठ की रचना छह प्रकार की कही है। उस पर बनी
हुई मालिकाएँ इक्कीस बनाई जाए और उन इक्कीस बालिकाओं में समस्त स्वर्ग,
पाताल निवासी देवताओं की स्थापना करें।
महाराणा कुम्भा ने कीर्तिस्तम्भ निर्माण पर 'स्तम्भराज' ग्रन्थ का प्रणयन किया है। चित्तौड़गढ़ पर कुम्भा
का बनवाया कीर्तिस्तम्भ वर्तमान है। यहाँ लगी प्रशस्ति में इसका वर्णन है—
कीर्तिस्तम्भमकारयेत्सरणधीरंभोलिहाग्रं समाधीशासर्वसुपर्वराजहरिति क्रीडानिवासं श्रियः।
यत्रागत्यसुराङ्गनाः सकलभूसाम्राज्यलीलान्धिरस्तेन्द्रस्य नितम्बिनीजनकतान् पश्यन्ति लीलारसान् ॥
इसी की एक शिला पर स्तम्भराज को उत्कीर्ण किया गया था। देश में यह एकमात्र शिलोत्कीर्ण
वास्तुशास्त्र है। इसमें कई देवी-देवताओं को समर्पित स्तम्भों के निर्माण की विधियाँ दी गई हैं। इसके
प्रारम्भ में वनावली में सङ्गीत साधिका भगवती सरस्वती की आराधना करते हुए लक्ष्मी के हृदय
निवासी विष्णु का स्मरण है। तदनन्तर विश्वकर्मीय योगदान का सन्दर्भ देते हुए कुम्भा स्तम्भों के लक्षणों
को कहते हैं, जैसा कि जय ने कहा था। जय और अपराजित ने भी अपने विद्याभ्यास में इन लक्षणों को
तीन प्रकार से बताया। ये स्तम्भ क्रमशः इन्द्र, ब्रह्मा और विष्णु के लिए बनाए जाते थे। इन्द्र के लिए
कीर्तिस्तम्भ की ऊँचाई 65 गज, विष्णु के लिए 108 और ब्रह्मा के लिए कीर्तिस्तम्भ का उदयमान इन्द्र
व विष्णु के स्तम्भ का मध्यमान वाला होगा। इस प्रकार कीर्तिस्तम्भ उत्तम, मध्यम और निम्न मान का
बनता है किन्तु जो भी कीर्तिस्तम्भ शास्त्रोक्त विधि से बना हो, वह उत्तम होता है। इसको 14 भागों में
विभाजित किया गया है। इसको तारकाकार पीठ पर बनाने का सङ्केत है जो अपराजित में भी आया है।
यह मेरुच्छन्द में बनाया जाता है।
इस खण्डित अभिलेख का आरम्भ इस प्रकार है—स्वस्ति।
श्रीमत्सकलकविताकदलीकदम्बबन्धुःकोमुलासः स्फुरतु सुकवेश्वारु सङ्गीतदेव्याः। सान्द्रानन्दं दिशतु
शोचिश्च वि...क मूर्तिर्लक्ष्मीवक्षस्थल कमलिनी कोशदेश द्विरेफः॥ 1॥
श्रीविश्वकर्मा(ख्य) महार्यवीर्यमाचार्यमुत्पत्तिविधावुपास्य। स्तम्भस्य लक्ष्मातनुते नृपालः श्रीकुम्भकर्णे जय
भाषितेन॥ 2॥ जयपराजित मुखैर्भणितस्य त्रिधा यथा। इन्द्रस्य ब्रह्माणाश्चापि विष्णोर्नामभिरङ्कितः॥ 3॥
पञ्चषष्टि करोच्छ्रायः शक्रस्तम्भो विधीयते अष्टोत्तरं शतं हस्ता विष्णुस्तम्भसमुच्छ्रय... द्वयोर्मध्यमं मानं
ब्रह्मस्तम्भस्य तन्मत्रम् उत्तमादिभिदायोगात्स प्रत्येकं त्रिधा भवेत्। (...) उत्तमं भेदामारूढो
ब्रह्मस्तम्भोयमिष्यते। अमुष्योत्तमता प्रोक्ता मुख्यमान समाश्रयात्॥ 4॥ मे(घ)मानं विभजेच्चतुर्दश
विभा(जयेत् तथा?)। एक भागमितं पक्षे चेकस्मिन्पीमा(न् भवे?)त॥ 5॥ चतुर... स्थिरं तारकासंज्ञके
तस्या तत्रैव ... रपत्रीत्यनुक्रमात्। विमान छन्दसा....यां दिशि तद्वारमाद्य भूपो प्रकल्पये... भाग.... क॥
8॥ भमन्ते नमितंत्यमद्ये......... कर्म्म मनोहरम्॥ 9॥ मेरो पृ... (हैण्डबुक टू विक्टोरिया हॉल म्यूजियम
उदयपुर, राजस्थान राज्य पुरातत्वविभाग, जयपुर 1961, पृष्ठ 11 क्रमांक 38 व शिलालेख संख्या 10)
इसके कुछ और अंश प्राप्त हुए हैं जिनके श्लोकों में वही मत है जो कि 'अपराजितपृच्छा' और
'ज्ञानप्रकाशदीपार्णव' के स्तम्भ निर्माण निर्देशों के सम्बन्ध में कहा गया है। बहुत सम्भव है कि जयता
अथवा मण्डन ने ही इस ग्रन्थ का प्रणयन किया हो और इसको नृपेच्छा से उत्कीर्ण किया गया हो।
इसका उत्कीर्णकर्ता पोमा रहा होगा जिसकी मूर्ति कीर्तिस्तम्भ के पञ्चमखण्ड में इस अभिलेख के साथ
विद्यमान है— 'स्वस्ति श्री संवत् 1510 वर्षे श्रावणसुदि सोमवारे कीर्तिस्तम्भ राणा कुम्भकरणं कारापितं
सूत्रधार जइता पुत्र नापा भमि चथी।'
सूत्र-७० 389
मेरुच्छन्दभवः स्तम्भो ब्रह्माण्डसदृशः पुरः।
तदुपरि शिवमूर्तिः शक्तिस्त्रिज्योतीरूपिणी ॥ २७ ॥
इसी तरह जो कीर्तिस्तम्भ बनेगा, वह मेरुच्छन्द का बना हो और पूरे ब्रह्माण्ड के
सदृश हों अर्थात् उसमें समस्त सृष्टि की रचना मूर्तिकलारूप में प्रदर्शित हो। उस
कीर्तिस्तम्भ के ऊपरी भाग में तीन ज्योति रूपिणी शक्तियों के साथ शिवमूर्ति की
स्थापना करें।
तदर्थे मेरुच्छन्दमाह -
मेरुच्छन्दः समाख्यातः विभागान् शृणु साम्प्रतम्।
चतुरश्रं समं कृत्वा तारकं पीठमुत्तमम् ॥ २८ ॥
अब मेरुछन्द के विभागों के बारे में कहता हूँ, उसे सुनो। चौकोर क्षेत्र को
समतल करके उत्तम तारक-पीठ बनाएँ।
उक्ताश्च चतुरशीतिः कीर्तिस्तम्भा विभागशः।
समस्ता उत्सेधभागाः शतमष्टोत्तरं स्मृताः ॥ २९ ॥
उस पीठ पर चौरासी प्रकार के कीर्तिस्तम्भ विविध विभागों के अनुसार बनते
हैं। उन सभी की ऊँचाई के भाग एक सौ आठ कहे गये हैं।¹
- वास्तुविद्या और ज्ञानप्रकाशदीपार्णव में पाँच प्रकार के ही कीर्तिस्तम्भों का वर्णन आया है। उक्त पाठ भी
प्रासङ्गिक है - कीर्तिस्तम्भलक्षणम् - अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कीर्तिस्तम्भस्य लक्षण। पुराण भूषणार्थाय
राज्ञादि विजया यत्र॥ 1॥ वापिकूपतडागानां कुण्डानां पुष्करादिनाम्। ध्वजास्तत्रैव कर्तव्या सर्वमानेन
लक्षयेत्॥ पुरे च नगरे चैव कूटं कुर्यात् ध्वजरुहा। गजगृहे रथो वापि ध्वजास्तत्रैव कारयेत्॥ कण्टका
सफलत्व्यज्ञै महाराज ध्वजेद्भवा। यत्र गजा ध्वजास्तत्र अनेकाकार रूपिणिम्॥ विधातव्या पताकैश्च राज्ञा
च मानया। सङ्ग्राम रोहणे पताका गजारोहे मनोरमा॥ वसन्तादिकोत्सवेषु ध्वज सर्वेषु शोभना। नगरे पुरे
ग्रामादौ होलिकायां महोत्सवे॥ राज प्रवेशे नगरेषु नृत्यमाण्डो महोत्सवे। दिव्य वस्त्र पताका च
तोरणैर्युव्वसम्भवे॥ ततस्ता वाद्यभवने कोटे नित्यं तथैव च। कपिशीर्षान्तरे कुर्यात् त्रिपञ्चैकमथोच्यते॥
प्रतोल्याद्यालयालादि प्राकारे सर्वस्तथा। ध्वजामाला कुलसिद्धि कुर्यात्कैलाशोभवा॥ अर्क युद्धोद्भव स्थाने
पुष्यप्राकार सङ्कुले। अष्ट₈ द्विष्ट₁₆ द्वात्रिंश₃₂ दिव्यवस्त्रोद्भवा ध्वजा॥ ध्वजास्तम्भोद्भवा कार्या कीर्तिपताकथ
हस्तिपु। जयन्तश्च प्रतापख्य कीर्तिनन्दो महोत्सव॥ एकेच्छत्रस्तथा कार्या कीर्तिस्तम्भाश्च पञ्च हि।
एकविंशति₂₁ यदा हस्तौ जयन्तो नाम नामत॥ प्रतापाख्यस्तत् कुर्यात् त्रयचत्वारि₄₃ हस्तकम्। पञ्चषष्ठि₆₅
यदा हस्त स एव कीर्तिनन्दन॥ सप्ताशीति₈₇ हस्तान्तं तु महोत्सवै कीर्तितम्। नवोत्तरशतं₁₀₉ हस्ते
एकछत्रोद्भवस्तथा॥ एवं पञ्च महास्तम्भा महाराज्ञांहीदा पुरे। पृथुत्वे चतुथंशेन तत्षडांशे न चोर्ध्वत्॥
पञ्चमांशे नाऽधः कुर्यात् षडांशोच्छूय मानतः। ऊर्ध्वेपु माऽमर्धतु त्रिचतुष्टय भूमिकम्॥ (तत् षडांशेन
ऊर्ध्वेपु ऊर्ध्वमानं त्रिभूमिकम्)। वृत्ताकारं प्रकर्तव्य घण्टा कलश संयुतम्। दक्षिणे कीर्तिपताका वामे
कीर्तिस्तदूर्ध्वत्॥ एवं त्रिभूमोद्भवमाड धर्म कीर्ति यशोद्भवम्। पीठबन्धस्तत कुर्यात् ऊर्ध्वे तस्य मेखला॥
दिक्पाल लोकपालाश्च वसन्तानां च महोत्सवे। चतुःषष्ठिश्च देवानां स्वर्गिणाल्वेकविंशति॥ मौढपरि
तेन भागप्रमाणेन विस्तारः स्याच्चतुर्दश₁₄ ।
तत्त्वभागैश्च भद्रार्धं कर्णश्चैव द्विभागकः ॥ ३० ॥
उन भाग प्रमाणों के अनुसार उनकी चौड़ाई अर्थात् कीर्तिस्तम्भों की विस्तार
चौदह भागों का हो तथा उनके भीत का भद्र अर्ध भाग तत्व अर्थात् पाँच भाग का
और कर्ण दो भाग के होंगे।
पूर्वभद्रे भवेद् ब्रह्मा दक्षिणे तु जनार्दनः।
अनन्तः पश्चिमे भद्रे रुद्रश्चोत्तरतो दिशि ॥ ३१ ॥
पूर्व की दिशा के भद्र अर्थात् दीवार पर ब्रह्मा की मूर्ति हो, दक्षिण दिशा की
भद्र अर्थात् दीवार पर जनार्दन, पश्चिमी भद्र पर अनन्त और उत्तरी भद्र पर रुद्र की
प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए।
कोणे भद्रे तथा स्तम्भे सप्तभागसमुच्छ्रिते ।
महाशृङ्गाणि चाष्टैव मेघाकाराणि तानि च ॥ ३२ ॥
अब कोणों की दीवार के तथा स्तम्भों की भद्र दीवार के सात भाग की ऊँचाई
तक मेघाकार अर्थात् विशाल महाशृङ्गों की रचना करें जितनी संख्या प्रतिकोण दो
के अनुसार से चारों कर्णभागों पर कुल आठ महाशृङ्ग बुर्ज बनेंगे।
सार्ध भागं तु परिधौ त्यजेच्छृङ्गक्रमेण वै।
तदूर्ध्वे दशभागा च इल्लका तोरणैर्युता ॥ ३३ ॥
इन बुर्जों की परिधि के डेढ़ भाग को छोड़ने के बाद उसके ऊपर के दस भागों
में तोरणयुक्त इल्लका बनाएँ अर्थात् आने-जाने के लिए रोस निकला हुआ बनाएँ
जिस पर तोरण अर्थात् छज्जा हो।
कोणे भद्रे तथा शृङ्गे यक्षगन्धर्वपन्नगाः।
भवन्ति ते स्वेच्छया च देवा वा दैत्यदानवाः ॥ ३४ ॥
इन कीर्तिस्तम्भों के कोणों पर भद्र अर्थात् दीवारों पर, शृङ्ग अर्थात् कंगूरों पर
यक्षों, गन्धर्वों, नागों, देवों, दानवों व दैत्यों के अपनी-अपनी इच्छानुसार कृत्तियों में
रचना करके सज्जित करें।
ध्वजाकार्या दण्ड पताक मर्कटिम्। एवं विधेय कर्तव्य इति कीर्तिस्तम्भलक्षणम्॥ तडागं च महायज्ञे
ध्वजास्तम्भ समोद्गवा। आनन्दो दुन्दुभि कान्तं श्रीमुख सुमनोहरम्॥ नव हस्तो भवेदाद्य सप्तदशकरोन्नतम्।
तदग्रे कलश कुर्याद् ध्वजावंश समन्वितः॥ वापिषु दक्षिणे द्वारे ध्वजस्तम्भ प्ररोपयेत्। पीठबन्ध सुकर्तव्या
एकद्वित्रिकरोन्नतम्॥ त्रिहस्त पञ्चसप्त समुन्नत तदूर्ध्वे कलशं दिव्य। कुण्डेषु पुष्करे कूपे ध्वजास्तम्भ
समुद्भवैत्॥ त्रिपञ्चसप्त हस्तान्ते उदकान्तर ? शतशुभम्। तथा प्राचिमीशान मध्ये विभज्ये नवभागत्। वामे
त्रयं परित्यजे दक्षिणे च त्रयत्यनेत्॥ (दीपार्णव उत्तरार्ध 23, 1-25)
सूत्र-७० 391
परिधौ मत्स्यादिदेवाश्च तथैकादशरुद्रकाः।
शिवशक्तयोऽनेकाश्च रूपभेदेन संस्थिताः ॥ ३५ ॥
परिधि को विष्णु के मत्स्यावतार आदि देवताओं तथा एकादश रुद्रावतार और
अनेकों शिव-शक्तियों के विविध रूप-भेद से बनी मूर्तियों से अलंकृत करें।
सागराः पर्वता द्वीपा समस्ता भोगरूपका।
समुद्रशैलवसना पृथ्वी च सप्तमातरः ॥ ३६ ॥
भूपालाश्च तथा कल्पवृक्षाश्च मुनिसत्तमाः।
वायुश्च सूर्यचन्द्राद्याः सनक्षत्राः सराशयः ॥ ३७ ॥
इसी क्रम में समस्त सागरों के मूर्त रूप, पर्वतों के मूर्तरूप, द्वीपों के मूर्तरूप
और समस्त भोग सामग्रियों के भी मूर्तरूप बनाएँ। इस समुद्र-शैल रूपी वस्त्रों को
धारण करने वाली पृथ्वीमाता का मूर्तरूप तथा सप्तमातृकाओं के मूर्तरूप, कल्पवृक्षों
के मूर्तरूप, मुनीश्वरों के मूर्तरूप, समस्त उनचास प्रकार के पवनों के मूर्तरूप और
सूर्य-चन्द्रादि ग्रहों से लेकर समस्त नक्षत्रों व राशियों के मूर्तरूप भी अलङ्करणार्थ
लगाएँ।
इन्द्रो रुद्रस्तथोपेन्द्रो ब्रह्मा विष्णुस्तथैव च।
शैलेयी ( पञ्चलीलया ) शङ्करश्च सदाशिवः ॥ ३८ ॥
[L18
392 अपराजितपृच्छा
शिलोलूखलयन्त्राणि शय्यासनानि पट्टकाः ।
नित्यकर्मस्थानस्थानं सन्ध्यावन्दनकुण्डिकाः ॥ 41 ॥
सर्वं गृहोपस्करं च आयसं काष्ठकादिकम् ।
द्विजदेवेषु दातव्यमात्मार्थे तु सनन्दनम् ॥ 42 ॥
इसी तरह प्राकार रक्षक अधिकारियों के सुख सुविधा के साधन रूप में
शिलानिर्मित ऊखल यन्त्रों, शय्या, खाट, कुर्सी मोढ़े आदि आसन, पाटले, नित्यकर्म
पूजा-सन्ध्यादि के पूर्व किए जाने वाले स्नान के लिए स्नानघर, सन्ध्या वन्दन के
समय हवनादि के उपयोगार्थ हवन-कुण्ड आदि और घर के काम-काज में आने
वाले सभी उपकरणों आयस अर्थात् लोहादि धातुओं से अथवा काष्ठ से निर्मित हो,
ये सब द्विज देवों को उनके कार्य में आने हेतु सनन्दन अर्थात् भवन सहित दान में
देना चाहिए।
भूमिदानं गजाश्वाश्च देशा ग्रामं च पत्तनम्।
मयूरलाक्षभिच्छत्रं हेमरत्नादिभूषणम् ॥ 43 ॥
उन द्विज-देवों को भूमिदान, माफी पट्टे, हाथी, घोड़े, ग्राम, देश पतन, मयूर के
लक्षणों से चित्रित छत्र चन्दोवे आदि और सोने व रत्नो के अनेक आभूषणों का दान
करें।
पूजयेत्सपत्नीकान् विप्रान् पूर्वे देषु पूजिताः ? ।
इन्द्रतुल्योद्भवं राज्यं स्वर्गे वा भूमिशासने ॥ 44 ॥
इन ब्राह्मणों की सपत्नी के उसी तरह से इस कार्य में पूजा करनी चाहिए जिस
तरह से इसके पहले उनके पूर्वजों को पूजा जाता रहा है, तभी उस नगर का राजा
अपने को इन्द्रतुल्य राजा मान सकेगा और इस भूमि को स्वर्ग के समान बना कर
शासन करके राजेन्द्र कहा जा सकेगा।
अन्यदप्याह —
क्रमोऽयमत्र विप्राणां कथयामि द्विजोत्तम ।
वंशावंशेस्तदेवा ? इन्द्राद्या ईशकोणतः ॥ 45 ॥
विष्णुदेवधान्याविप्रा पूर्वदेशे तां स्थापयेत् ? ।
निगमं¹ पूजयन्ति विप्रा दक्षिणां दिशं द्विजोत्तमाः ? ॥ 46 ॥
- 'जिगमं ?' इति प्रकाशित पाठः। मयमतम् में निगम का वर्णन है। यह भी कहा है कि वास्तुक्षेत्र में
ब्राह्मण और देवता की स्थापना की जानी चाहिए— एतस्याभ्यन्तरे विप्रदेवता स्थापनं भवेत्। (9, 64)
[...] में कहा गया है कि जिस नगर में शिल्पशास्त्रान्तर [...]
सूत्र-७१ ३९३
अब मैं यहाँ ब्राह्मणों के उत्तमोत्तम वंशों के, उनके देवों के क्रम को कहता हूँ।
इन्द्रादि देवताओं को ईशान कोण से आरम्भ करके पूर्व दिशा में विष्णु देव, धान्य,
विप्रादि की स्थापना करे ? निगमों के पूजन करने वाले ब्राह्मणों (दैशिक, तांत्रिक)
को दक्षिण दिशा की ओर स्थापित करें।
नैर्ऋत्यां दिशि पितॄंश्च प्रावृषे पौरुषं तथा।
उत्तरे पुनराचार्य ईशं च प्रतिपूजयेत् ? ॥ 47 ॥
नैर्ऋत्य दिशा की ओर पितरों को, वर्षा करने वाले देवों को, पौरुष अर्थात् नल
या धूपघड़ी को भी स्थापित करें। उत्तर की दिशा में पुनः आचार्य और ईश अर्थात्
महादेव शङ्कर का पूजन करें।
कनिष्ठं च समाख्यातं नगरं नाम भूधरम्।
देवलोकेषु विख्यातं पूज्यं सुरनरोरगैः ॥ 48 ॥
ऐसे ही जो कनिष्ठ नगर होते हैं उनका नाम भूधर कहा गया है जो सुर, नर
और नागों के द्वारा देवलोकों में पूजा जाता है और विख्यात है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तेऽपराजितपृच्छायां
भूधरादिब्रह्मनगराधकारो नाम सप्ततितमं सूत्रम् ॥ 70 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भूधरादि
ब्रह्मनगर अधिकार नामक सत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 70 ॥
हेमकूटाख्यनगरप्रमाणमेक-सप्ततितमं सूत्रम् ॥ 71 ॥
अपराजित उवाच—
चित्रकूट-त्रिकूटादिनगराणां च सर्वशः।
प्रमाणं गुणदोषांश्च कथयस्व प्रसादतः ॥ 1 ॥
अपराजित ने कहा कि हे तात्! अब आप सभी चित्रकूट, त्रिकूट¹ आदि नगरों
के प्रमाण, गुण और दोषों को कृपाकर कहिए।
है— तत्रागते नगर्यन्तं यदि विष्ण्वालयं भवेत्। राजधानीति तन्नाम विद्वद्भिर्वक्ष्यते सदा ॥ (मानसार 10,
23-24)
- ग्रन्थकार के रचनाकाल तक चित्रकूट के रूप में चित्तौड़गढ़ और त्रिकूट के रूप में नागदा नगर
अस्तित्व में थे। ये दोनों ही मेवाड़ की राजधानियाँ रहे हैं। तेरहवीं-चौदहवीं सदी के शिलालेखों और
15वीं सदी के 'एकलिङ्गमाहात्म्य' में ये नाम आए हैं। हालांकि शिवपुराण में भी चित्रकूट-त्रिकूट का
नाम है— क्षणं तु गिरिवत्तस्थौ चित्रकूटत्रिकूटकः (शतरुद्रसंहिता 15, 48) किन्तु, मेवाड़ के इन पर्वतों
गृहाश्च कतिः सङ्ख्याता मार्गाश्च कतिधा स्मृताः।
श्रेष्ठा वा निन्दिता वाथ प्रतोलीपरिखादिकाः ॥ २॥
वहाँ गृह कितनी संख्या में होते हैं और उनके मार्ग कितने प्रकार के होते हैं ?
उनके श्रेष्ठत्व को और निन्दित को, प्रतोली अर्थात् पोल व परिखा अर्थात् प्राकार
के बाहर बनने वाली खाई आदि के बारे में भी अवश्य कहिए।
कतिः स्थानानि देवानां कतिदेवाश्च संस्थिताः।
एतत्सर्वं प्रयत्नेन तथा जनपदादिकम् ॥ ३॥
किन-किन स्थानों में किन-किन देवताओं की स्थापना की जाए— ये सभी
प्रयत्नपूर्वक कहें।
भोगाय भूमिपालानां भोगिनां चैव सर्वदा।
विश्रामो वनितानां च यथा चेन्द्रपुरी तथा ॥ ४॥
इसके साथ ही जनपद के निवासी लोगों के भोग के लिए तथा भूमि विश्राम
करने हेतु और रमणियों के सदा आवास हेतु इन्द्रपुरी स्वर्ग के समान सुखदायी
भवनों के बारे में भी कहिए।
विश्वकर्मोवाच —
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि नगराणां च लक्षणम्।
हेमकूटाभिधानं च विश्रुतं भुवनत्रये ॥ ५॥
विश्वकर्मा ने कहा कि अब मैं तीनों लोकों में विख्यात् हेमकूट नामक नगरों के
लक्षणों को ठीक प्रकार से कहता हूँ।
पदादीनां विन्यासमाह —
चतुरश्रं समं कृत्वा भुजकर्णविशोधितम्।
भाजयेद् द्वादशांशैर्वा न्यूनाधिकपदैस्तथा ॥ ६॥
(इनके निवेशार्थ सर्वप्रथम) भूमिक्षेत्र को समतल करके चौकोर बनाएँ और
उसकी भुजाएँ और कोनों को भी सही-सही देख लें। इसके उपरान्त उसे बारह
अंशों में विभाजित करें अथवा कुछ न्यूनाधिक पदों में विभाजित करें।
और उन पर विद्यमान नगरों के रूप में चित्तौड़गढ़ व नागदा अनुमित किया जाना समीचीन है। चित्रकूट
की स्थापना चित्राङ्गदा मौर्य ने 7वीं सदी में और नागदा की स्थापना गुहिल राजाओं ने आठवीं सदी में
की थी। अपराजित यहाँ का शासक रहा था। जैसा कि 69वें सूत्रान्त पर टिप्पणी में कहा गया है नागदा
के पास ही स्थित कुण्डेश्वर से अपराजित का 661 ई. का अभिलेख मिला है। इस सूत्र में प्रश्न के
विपरीत विश्वकर्मा ने हेमकूटादि नगरों की रचना के विषय में कहा है।
सूत्र-७१ 395
ब्रह्मस्थानेषु सङ्गृह्य ह्येकांशं वामदक्षिणम्।
द्विधा तथा पुनस्त्रीणि द्वे द्वे त्रीणि द्वयं तथा ॥ ७ ॥
इन्द्रयाम्यापरसौम्ये विभज्य पदसङ्ख्यया।
जायन्ते तत्र सद्मानि ख्यातानि वसुधातले ॥ ८ ॥
उस क्षेत्र के ब्रह्मस्थान अर्थात् मध्य भाग के बायें और दायें एक अंश को
अर्थात् एक-पद भाग को दो प्रकार से तथा पुनः तीन को दो-दो प्रकार से और
तीनों तथा दोनों को पूर्व से पश्चिम तक भली प्रकार से पद संख्या में विभाजित
करके वहाँ भवन निवेश किए जाते हैं, जो कि पृथ्वीतल पर सुख्यात हैं।
वसति मार्गादीनां न्यासक्रमः –
निवसन्ति च सीमान्ते चतुर्वर्णा यथाक्रमम्।
द्वादशाथमार्गाश्च द्वौ त्रयः सद्मनां तथा ॥ ९ ॥
इन नगरों के सीमान्त में चारों वर्ण के लोग यथाक्रम निवास करते हैं। दो-दो
या तीन-तीन घरों को छोड़कर ऐसे नगर में बारह मार्ग बनाए जाते हैं।
अन्तरे कर्णभुजयोर्मार्गसङ्ख्या त्रयोदश।
सद्ममानं समाख्यातं चत्वारिंशत्सहस्रकम् ॥ १० ॥
कर्णभुज के अन्तर पर जाने तक मार्ग संख्या तेरह भी हो जाती है। इसमें
भवनों की संख्या का प्रमाण चालीस हजार तक का कहा गया है।
ब्रह्मरन्ध्रप्रमाणं च शतमष्टोत्तरं शुभम्।
कर्णगर्भान् विजानीयाच्छतमष्टोत्तरं मतम् ॥ ११ ॥
इसी तरह ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् मध्य का भाग रखते हुए एक सौ आठ पद भागों का
क्षेत्र भी शुभ होता है तथा कर्णगर्भ भी एक सौ आठ माने गए हैं।
चतुर्वक्त्रं महापद्मं प्रासादं सुरवल्लभम्।
स्थापयेद् ब्रह्मकेन्द्रे च ब्रह्माणं तु पितामहम् ॥ १२ ॥
ब्रह्म केन्द्र में अर्थात् नगर के मध्य भाग में चौमुखा, महापद्म नामक देवताओं को
प्रिय लगने वाला प्रासाद बनाएँ और उसमें पितामह ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना करें।
चत्वारः कर्णप्रासादाः कर्णगर्भे च संस्थिताः।
आयान्तस्तु व्ययं कुर्यात् क्षेत्रमानानुसारतः ॥ १३ ॥
कर्णगर्भ के चारों ही कोनों पर भी कर्णप्रासाद चार की संख्या में बनाएँ। उसके
लिए आय और व्यय क्षेत्र मानानुसार ही शोधित करने चाहिए।
हस्तसङ्ख्याप्रमाणं च शतानां दशपञ्चतः ।
वेश्म सङ्ख्याप्रमाणं च सार्धसप्तशतानि च ॥ 14 ॥
गज की संख्या प्रमाण से इन नगरों में गृहों की संख्या एक सौ पन्द्रह से लेकर
साढ़े सात सौ तक हो सकती है।
प्रासादोपस्करं सर्वं प्रतोल्यादिसमन्वितम् ।
कीर्तिस्तम्भादिकं चैव कथितं पूर्वमेव हि ॥ 15 ॥
इति हेमकूटनगराभिधानम्।
इन नगरों के अन्य प्रासादों और उपकरणों, प्रतोली आदि से समन्वित कीर्ति
स्तम्भादिक के बारे में तो पहले ही (70वें सूत्र में) कहा जा चुका है।
अथ रत्नकूट नगरादीनां लक्षणं -
अतः परं प्रवक्ष्यामि नगराणां च लक्षणम् ।
नाम्ना तु रत्नकूटं तद् विज्ञातं वसुधातले ॥ 16 ॥
इनके बाद, अब मैं उन नगरों के लक्षणों के बारे में कहता हूँ जो रत्नकूट नाम
से वसुधातल पर पूर्णतः विख्यात है।
चतुरश्रं समं क्षेत्र भुजकर्णविशोधितम् ।
भाजयेद्वा षोडशांशैर्विविधैर्वा पदैस्तथा ॥ 17 ॥
इनके लिए समचौरस क्षेत्र हो और भुजाओं तथा कर्णों को पूर्णतः शोधित
करके सोलह अंश पदों में विभाजित करें या विविध अंशों के पदों में विभाजित
करें।
ब्रह्मस्थानं तु सङ्गृह्य चैकांशं वामदक्षिणम् ।
तच्चैकं तु त्रिधा कृत्वा पुनद्वौ चैकमेव हि ॥ 18 ॥
इसके ब्रह्म भाग अर्थात् मध्य के पदों के बायें-दायें एक के तीन भाग करके
पुनः उनके दो-दो भाग करें।
द्वौ द्वौ तु भागसंस्थाने चैकद्वयं त्रयं तथा ।
चत्वारश्च चतुर्दिक्षु पदसङ्ख्यां विभाजयेत् ॥ 19 ॥
इन दो-दो भागों के स्थानों पर एक, दो, तीन तथा चार भागों में चारों ओर के
पदों की संख्याओं को विभाजित करें।
गृहाणां जायते सङ्ख्या त्वेकमेव सहस्रकम्।
पदांशषट्कविस्तारं तदंशं निर्गमं विदुः ॥ 20 ॥
सूत्र-७१ ३९७
इससे गृहों की संख्या एक से लेकर हजार तक हो जाएगी; उन भवनों में छह-
छह पदों के अंश पर अर्थात् छह गृहों को छोड़कर उतने ही अर्थात् छह-छह निर्गम
मार्गों की रचना करें।
चतुर्दिक्षु विधातव्यं भद्रस्थानं मनोहरम्।
चतुःकर्णास्तु प्रासादे मार्गाः सप्तदश स्मृताः ॥ २१ ॥
इस प्रकार से रचे गए नगर के भवनों की दीवारों को चारों ओर से मनोहर रूप दें
और चारों कोणों पर प्रासाद, मन्दिरादि बनाएँ और सत्रह मार्ग आवागमन हेतु बनाएँ।
द्विपञ्चाशत् सप्तहस्ता ज्ञातव्या अत्र पण्डितः।
द्वात्रिंशन्मध्यवंशे तु चत्वारः षोडशान्विताः ॥ २२ ॥
इन मार्गों में भी बावन मार्गों की चौड़ाई तो सात गज की हो, ऐसा शिल्पशास्त्र
के पण्डितों ने बताया है और बत्तीस मार्ग मध्य में, आने-जाने वाले चार-चार
सोलह गज की चौड़ाई वाले कहे गए हैं।
सीमान्ते कर्णकर्णेषु चतुर्विंशतिकाः स्मृताः।
अष्टौ मार्गा द्वादश च हस्तसङ्ख्या निगद्यते ॥ २३ ॥
वहाँ पर कोनों से कोनों तक के सीमान्त पर चौबीस मार्ग हों, इनमें आठ मार्ग
बारह गज की चौड़ाई वाले होंगे।
चत्वारिशच्च चत्वारो द्विशतं गर्भमध्यतः।
कर्णे कर्णे च सीमान्ते शेषा विंशतिकान्विताः ॥ २४ ॥
क्षेत्र के नगर के मध्य से चारों ओर दो सौ मार्ग चालीस गज की चौड़ाई के
तथा कोनों से कोनों तक के सीमान्त के शेष मार्ग बीस गज की चौड़ाई के कहे हैं।
नामपादप्रमाणं च संस्थानोन्मानलक्षणम्।
सर्वेषामीदृशं मानं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २५ ॥
भगवान् आद्य विश्वकर्मा ने इन नगरों के नाम, पाद प्रमाण, संस्थानों के मान,
उन्मान के लक्षण आदि सभी मानों को इस प्रकार निश्चित किया है।
चतुर्द्वारं तु कैलासं चतुर्दृष्ट्य¹ समन्वितम्।
स्थापयेद् ब्रह्मकेन्द्रेषु ब्रह्माणं च पितामहम् ॥ २६ ॥
कैलास नगर के चार द्वार चारों ओर दृष्टि किए हुए (वातायन सहित) हों—
ऐसे मध्य ब्रह्मकेन्द्र के भाग में पितामह ब्रह्मा की मूर्तियुक्त मन्दिर की स्थापना करें।
१. 'चतुर्त्र्यष्ट ?' इति प्रकाशित पाठः।
398 अपराजितपृच्छा
सरस्वतीं तथैशान्यं वायव्यां तु जनार्दनम्।
नैर्ऋत्ये च सहस्राक्षमाग्रेय्यां तु गणाधिपम् ॥ 27 ॥
इसके ईशान कोण में सरस्वती मूर्ति सहित मन्दिर, वायव्य में जनार्दन मूर्ति
मन्दिर, नैर्ऋत्य में सहस्राक्ष मूर्ति मन्दिर और आग्नेय दिशा में गणपति मूर्ति मन्दिर
स्थापित करें।
सर्वेषामीदृशं स्थानं ज्येष्ठमध्यकनिष्ठकम्।
कुर्यात् कनिष्ठके प्राज्ञो मध्यस्थाने चतुष्टयम् ॥ 28 ॥
ज्ञात्वा नगरचिह्नानि द्विरष्टकैकेन ? शिल्पिभिः।
न्यूनाधिकं च द्वाराणां सूत्र सम्बोध्य बोधकम् ? ॥ 29 ॥
यह ज्ञातव्य है कि ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ— सभी नगरों का इसी व्यवस्था
से निवेशन करें। कनिष्ठ नगर के मध्य स्थान (ब्रह्मस्थल) में चारों पदों में नगर
चिह्नों के जानकर सोलह शिल्पीगणों के द्वारा न्यूनाधिक द्वारों की रचना हेतु (सूत्र
सम्बोध्य बोधकम्) कोई सूत्र ढूँढने पर विचार-विमर्श किया जाए।
रत्नकूटाभिधानं च गृहसङ्ख्या सहस्त्रतः।
ज्येष्ठनगरमानं च सूत्रे चैव प्रसारिते ॥ 30 ॥
द्वारप्राकारकाद्यं च गृहोपस्करमेव च।
पूर्वोक्तं तु विधातव्यं द्विजदेवालयस्तथा ॥ 31 ॥
ऐसे रत्नकूट नामक नगर के अन्तर्गत गृहों की संख्या हजारों तक हो सकती है।
इसी तरह के कार्य के लिए ज्येष्ठ नगर मान लगाकर ऐसा ही सूत्र प्रसारित करके
निवेशन किया जाना चाहिए। नगरों में द्वार तथा प्राकार, गृह उपस्कर-उपकरणों
सहित वहाँ बसने वाले द्विजों, देवालयों के विषय में पूर्व में कहा जा चुका है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
हेमकूटाख्यनगरप्रमाणसूत्राधिकारो नामैकसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 71 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हेमकूट
नामक नगर व प्रमाण सूत्र अधिकार नामक इकत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 71 ॥
महाराजाधिराजपुरनिवेशो नाम द्वासप्ततितमं सूत्रम् ॥ 72 ॥
अथ विविधपुरस्य प्रमाणं। विश्वकर्मोवाच —
चतुर्भिस्तु सहस्रैश्च कनिष्ठं विस्तृतं पुरम्।
मध्यमं चाष्टसाहस्रं हस्तानां मानतः स्मृतम् ॥ 1 ॥
पृ० ... ३१४
द्व्यष्टसाहस्रहस्तं च व्यासे ज्येष्ठं पुरं मतम्।
चतुरष्टद्विरष्टं वा त्रिविधं चोदितं क्रमात् ॥ २ ॥
विश्वकर्मा बोले कि (अब महाराजाधिराज के पुर निवेश के लिए कहता हूँ।
इनमें) पहले कनिष्ठ पुर का विस्तार 4 हजार गज का होता है और दूसरे मध्यम पुर
का विस्तार मान 8 हजार गज का रखा गया है। तीसरे, ज्येष्ठ पुर का व्यास 16
हजार गज का माना गया है। इस तरह चार, आठ और सोलह हजार गज के विविध
क्रमों में कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ नगरों के मान क्रमशः कहे हैं।
कनिष्ठज्येष्ठयोर्मध्ये सहस्रवृद्ध्यैकादश।
चतुर्धापुनरेकैकं कनिष्ठं मध्यमुत्तमम् ॥ ३ ॥
उक्त कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ पुर में भी हजार गज की वृद्धि अनुसार क्रमशः
11 भेद बनते हैं। उनके भी फिर, एक के चार भेद कनिष्ठ, मध्यम, और ज्येष्ठ नाम
से होते हैं।
साष्टमांशं सपादं वा सार्द्धं वास्तु समायतम्।
कुर्यादेकैकमिथ्रं च चतुरश्रीकृतं शुभम् ॥ ४ ॥
अष्टमांश युक्त ( 1¹/⁸ ), सपाद युक्त ( 1¹/⁴ ) या अर्ध युक्त ( 1¹/² ) वास्तु समायत
होते हैं और इनको भी एक-एक से मिलाकर शुभ चतुरस्र बनाए जाते हैं।
वेदाश्रं वेदभक्तं च वेदापर नृपवेश्मने ?।
समस्तनृपगेहानां वेदवत् संस्थिता स्थितिः ॥ ५ ॥
इन क्षेत्रों के पार्श्व में चार (वेदाश्र) और चार भाग से चार ही राजमहल— इस
तरह समस्त राजमहलों की स्थिति भी वेदवत् अर्थात् चार-चार कही गई है।
एकस्यां द्वित्रिभिर्वशाख्रिथा पञ्चपदान्तगाः।
प्रसिद्ध राजमार्गश्च षट् पन्थानो नवांशकाः ॥ ६॥
पाँच-पाँच पद अर्थात् पाँच भाग के एक, दो और तीन अंशों वाले तीन
विधियों के प्रसिद्ध राजमार्ग तथा छह पन्था, पैदल मार्ग नौ अंश के होंगे।
इत्यनुक्रमवंशाश्च यानमार्गप्रभेदतः।
पुरान्तेषु समस्तेषु घण्टामार्गप्रसिद्धितः ? ॥ ७ ॥
इन अनुक्रम अंशों में यान-मार्गों के भेद बनते है जिन्हें समस्त नगरों के अन्त
तक घण्टा मार्ग नाम से प्रसिद्धि प्राप्त है। इन्हें नगर की मुख्य सड़क (घण्टा मार्ग या
घण्टा पथ) राजमार्ग भी कहते हैं।
प्राकारोच्छ्रयमाह —
सूर्यषोडशविंशत्यः प्राकारोर्ध्वं त्रिधोदितम्।
द्वादशाष्टौ दश वापि प्राकारस्कन्धविस्तृतिः ॥ 8 ॥
अब नगर के प्राकारों की तीन प्रकार की ऊँचाई के अनुसार बताते हैं कि यह
ऊँचाई 12, 16 और 20 गज की क्रमशः कनिष्ठ, मध्यम और ज्येष्ठ होती है। इन
प्राकारों के ऊपर के स्कन्धों की चौड़ाई भी क्रमशः 8, 10 और 12 गज उपयुक्त
कही गई है।
समादशकरोच्छ्रिता 'प्राकारं द्विहीनाधिकम् ?।
द्विकराधिकैमर्ध्यं च चोच्छ्रिता कण्डवारणी ॥ 9 ॥
कण्डवारणी स्थिता च पृथूदये च शिरोवापि ?।
घनानि कपिशीर्षाणि ह्यष्टाङ्गुल्यन्तराणि ॥ 10 ॥
इसके साथ ही 17 गज की ऊँचाई वाले प्राकार-परकोटे के दो कम दो अधिक
गज तक की छूट समझें। प्राकार के स्कन्ध पर बने चौड़े मार्ग पर सुरक्षा के लिए
उसके एक ओर दो गज के आसपास की ऊँचाई की कण्डवारणी अर्थात् डोली
बनानी चाहिए (कण्ड = रक्षा करना, बचाना; वारणी = प्रतिरक्षा करने वाली)
अर्थात् डोली-भित्ति। यह कण्डवारणी पर्याप्त ऊँची होनी चाहिए और उसके सिर
पर घनानि (पास-पास) कपिशीर्ष या कंगूरे 8-8 अङ्गुल के अन्तर पर बनाने
चाहिए।
प्राकारान्ते रथाः कार्या दिग्भास्वच्छक्रविस्तरः।
चत्वारिंशस्त्रिंशमध्यं शाश्वतं च रथन्तरम् ॥ 11 ॥
प्राकार के अन्त में रथमार्ग करने चाहिए जो स्वच्छ विस्तार युक्त दश गज तक
की चौड़ाई के होंगे और इन रथमार्गों के मध्य का अन्तर 20 या 30 गजों को
आस-पास शाश्वत कहा गया है।
प्रवेशद्वारलक्षणं —
उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च हीनबाहुस्तथापरः।
प्रतिकायमिति प्रोक्तं प्रवेशानां चतुष्टयम् ॥ 12 ॥
अब चार प्रकार के नगर प्रवेश द्वारों के बारे में कहता हूँ— 1. उत्सङ्ग, 2.
पूर्णबाहु, 3. हीनबाहु और 4. प्रतिकाय— ये चार प्रवेश द्वारों के नाम कहे गए हैं।
- 'प्रासादं ?' इति प्रकाशित पाठः।
सूत्र-७२ 401
आनन्दश्च तथोत्कण्ठो जयन्तो रिपुमर्दनः ।
कर्णालयश्च चत्वारो वृत्ताकारेण संस्थिताः ॥ 13 ॥
इन द्वारों में भी 1. आनन्द, 2. उत्कण्ठ, 3. जयन्त और 4. रिपुमर्दन नगर के
चारों कोनों पर गोलाकार निर्मितियाँ अच्छी तरह से बनाई जाती हैं।
सिंहावलोकनाश्चैव योधविद्याधरीयकाः ।
एकान्तरप्रभेदेन क्रमेवापि सुसंस्थिताः ॥ 14 ॥
इन सभी द्वारों के ऊपर की ओर सिंहावलोकन अर्थात् विशाल गोखड़े-झरोखे
और योध विद्याधरी अर्थात् बारहदरी¹ एक-एक के अन्तर पर क्रम से ठीक तरह
बनी होती है अर्थात् झरोखों के बाद बारहदरी और बारहदरी के बाद पुनः अन्तराल
पर झरोखे आदि क्रमानुसार बनाए जाते हैं।
चत्वरे देवस्थानानि —
षट्त्रिंशतश्च षड्वृद्धौ विदुरष्टोत्तरं शतम् ।
पुरे प्रासादसङ्ख्याभिर्देवस्थानानि चत्वरे ॥ 15 ॥
इसके अतिरिक्त 36 से आगे 6-6 की वृद्धि करते हुए 178 संख्या हो जाए,
उतनी संख्या नगरों के प्रासादों अर्थात् मन्दिरों की और देवता के स्थानों की होती है
जो कि चौराहों (चत्वर) के साथ बनते हैं।²
पुर्मानानि द्वादशैव चत्वरं देवसङ्ख्यया ।
अनुक्रमेण कर्त्तव्यं पुरच्छन्दानुरूपतः ॥ 16 ॥
पुरों के मान भी बारह है जो चौराहों पर स्थापित देवताओं की संख्या जितने
ही हैं। इनको भी पुरों के छन्दों के अनुरूप ही अनुक्रम से निवेशित करना चाहिए।
देवस्य मुखस्थितिं —
नोत्तराभिमुखाः कार्या न देवा दक्षिणामुखाः ।
पूर्वापरमुखाः कार्या वास्तुशास्त्रेषु गीयते ॥ 17 ॥
पुरों में देवताओं को न तो कभी उत्तराभिमुखी करें न दक्षिणाभिमुखी क्योंकि
- सूत्रधार मण्डन ने कहा है— प्राकारेऽपि च कोष्ठका दशकराः सूर्येन्द्रहस्तास्तथा प्रोक्तास्तेन समैव
कोणसहिता विद्याधरी मध्यगाः । (राजवल्लभ. 4, 15) - सूत्रधार मण्डनकृत वास्तुमण्डनं में कहा गया है कि दुर्ग, देवस्थान व चत्वर या चबूतरों पर यदि 36
हाथ की चौड़ाई हो तो वहां की लम्बाई छह हाथ अधिक रखनी चाहिए। इस प्रकार सौ पर अनुपातः
बारह हाथ अधिक रखना चाहिए—षट्त्रिंशत् प्रथमे दुर्गे देवस्थानानि चत्वरेषण्णाम्। (वि)वृद्धया
क्रमेणैव द्वादशेह्याऽधिकशतम् ॥ (वास्तुमण्डनम् 3, 13)
402 अपराजितपृच्छा
वास्तुशास्त्रों में यह कहा गया है कि देवता सदा पूर्वाभिमुखी अथवा पश्चिमाभिमुखी
ही स्थापित होते हैं।
पुरप्राकारबाह्ये तु देवा यत्र च संस्थिताः।
नगराभिमुखास्त्वेव मध्यमे च पराङ्मुखाः॥ 18॥
पुर की दीवार या प्राकार के बाहर जो देव मन्दिरादि बनाए जाएँ उनके मुख
सदा नगराभिमुखी होने चाहिए और पुर के मध्य में जो देवता मन्दिर बने हैं उनको
बाह्यमुखी बनाएँ।
पराङ्मुखा स्थिता ये तु शिवः सूर्यो विधिर्हरिः।
हन्यते तत्पुरं राष्ट्रे राज्यध्वंसश्च जायते ॥ 19॥
यदि शिव, सूर्य, विधि और हरि की मूर्तियाँ नगर के पराङ्मुख अर्थात् उलटी
हुई या पीठ पीछे की हुई बनाई जाएंगी तो नगर, उस पुर, या राष्ट्र का हनन होगा
और राज्य विध्वंस तक हो जाएगा। अस्तु, इन देवों की स्थापना नगर की ओर मुख
किए हुए ही करनी चाहिए जो शुभफलदायी होती है।¹
प्राकारान्तरे परिखप्रमाणादीनां —
प्राकारोच्छ्रयाद् द्विगुणं तदन्ते परिखात्रयम्।
अम्भो ? विमार्गशस्तादिग्विधिक्षु च जलाश्रयाः ॥ 20॥
अब प्राकार के बाहर परिखाओं, खाइयों के बारे में कहता हूँ। प्राकार अर्थात्
नगरकोट जितने हाथ गज ऊँचा हो उतने से दुगुने गजों की दूरी रखते हुए बाहर की
ओर तीन परिखा अर्थात् खाइयाँ खोदी जाए। उनको पर्याप्त जल से पूरित कर दें
और उनके द्वारा दिशा और विदिशाओं में आने-जाने के मार्ग भी जल के आश्रय के
बने हों अर्थात् जल से भरी हुई खाइयों के आर-पार जाने के साधन या तो
जलाश्रयी नावें हो या काष्ठ निर्मित उठाऊ पुलिया बनी हुई हों जो आवश्यकता के
अनुसार आवागमन के लिए लगाई जा सके और रोकने के लिए हटाई जा सके
जिससे खाई के जल को पार न किया जा सके।
कनिष्ठे च पुरे पादात् मध्यमे च पदार्धतः।
षोडशांशात् पुरे ज्येष्ठे ह्यतिरिक्ते च बाह्यतः ॥ 21॥
कनिष्ठ पुर में एक चौथाई, मध्यम पुर में आधा और ज्येष्ठ पुर में पूरा ही बाहर
की ओर अतिरिक्त भाग रखें।
- राजवल्लभ में भी यही मत है— ब्रह्मा विष्णुशिवेन्द्रभास्करगुहाः पूर्वापरास्याः शुभाः प्रोक्तौ सर्वदिशामुखौ
शिवजिनौ विष्णुर्विधाता तथा। चामुण्डा ग्रहमातरो धनपतिद्वैमातुरो भैरवो देवा दक्षिणदिङ्मुखाः कपिवरो
नैर्ऋत्यवक्त्रो भवेत्॥ (राजवल्लभ. 4,13) अग्निपुराण में भी मंदिर नगरोन्मुखी बनाने का उल्लेख है।
सूत्र-७२ 403
प्रतोली राजगेहाग्रे राजमार्गस्तदग्रतः ।
विस्तीर्णा विंशतिकरैर्द्विरष्टद्वादशाधमा ॥ २२ ॥
राजभवन के आगे बनी प्रतोली अर्थात् बड़ी पोल से जाने वाला राजमार्ग आगे
से 20 गज चौड़ा हो तो ज्येष्ठ, 16 गज चौड़ा हो तो मध्यम और 12 गज चौड़ा हो
तो कनिष्ठ कहा गया है।
हट्टश्रेणिस्ततः कार्या षोडशांशेन मार्गतः ।
बलिकर्मसमस्तानां हट्टोपरि गृहोत्तमम् ॥ २३ ॥
इसके बाद, राजमार्ग पर दुकानों की कतारें बनानी चाहिए जो राजमार्ग के 16वें
भाग की चौड़ाई जितनी सड़क से दूरी पर हों। इन हाटों अर्थात दुकानों के ऊपरी
भागों पर समस्त कर्मों के लिए उत्तम गृहों (कार्यशालाएँ) को बनाएँ।
विदिशासु पुरं कार्यं जगत्यस्त्रिगुणं शुभम्।
युग्मगृहाश्च कर्त्तव्याः पक्षयोश्चैव सन्मुखाः ॥ २४ ॥
पुर अर्थात नगर की विदिशाओं में इससे भी अर्थात् सोलवें भाग की चौड़ाई से
भी तीन गुणी चौड़ाई की शुभ जगती अर्थात् चबूतरियाँ बनाएँ जिनके दोनों पक्षों पर
अर्थात आजू-बाजू पर, आमने-सामने युग्म भवन होने चाहिए।
प्रासादस्य प्रमाणेन पादोनेनाथवोच्यते।
प्रासादार्द्धात्तु कर्तव्या ज्येष्ठ-मध्य-कनिष्ठिकाः ॥ २५ ॥
प्रासाद अर्थात् भवन के प्रमाणानुसार उन्हें प्रासाद के प्रमाण के बराबर ज्येष्ठ,
प्रासाद के प्रमाण के एक पाद कम अर्थात् पौन भाग मध्यम और प्रासाद प्रमाण का
आधा कनिष्ठ को रखें।
एकभौमा द्विभौमा वा शाला निर्गमभूषिता ।
मत्तवारणसंयुक्ता निर्गताश्चित्रशालिकाः ॥ २६ ॥
जगत्यग्रे वामनं स्याद् भिट्टं तद्भुवि संस्थितम् ।
महोत्सवे च वासन्ते कुर्याद्धिन्दोलकं त्विह ॥ २७ ॥
इन भवनों में भी एक मंजिला, दो मंजिला भवन और शाला निर्गम अर्थात रोस
भी बनाएँ जिससे आने-जाने की सुविधा रहे। उस रोस पर छाया के लिए मत्तवारण
भी बना हो अर्थात छज्जे हों। उन भवनों के बाहर की ओर चित्रशाला बनाएँ अर्थात्
दीवारों पर चित्र बने हों।¹ जगती के आगे उससे लगी हुई छोटी भिट्ट अर्थात् भींत
- प्राचीन भवनों में ऐसे चित्र आज भी देखे जा सकते हैं। चित्तौड़ दुर्ग पर कुम्भा महल, जयमल-पत्ता की
हवेलियों पर इस प्रकार का चित्राङ्कन कार्य अद्यावधि शेष है। नाथद्वारा में महुआगढ़, मोतीमहल आदि
404 अपराजितपृच्छा
बनाएँ और किसी महोत्सव या त्योहारों के लिए आमोद-प्रमोद हेतु वहाँ हिन्दोलक¹
अर्थात् हिन्दे-झूले, डोलर इत्यादि लगाएँ (अथवा हिण्डोलक तोरण बनवाएँ)।
नृत्यशालिकाः —
देवस्य परतः कार्या निगूढा नृत्यशालिकाः।
पूर्वस्यामथवाग्नेय्यां वायव्ये वारुणे शुभम् ॥ २8 ॥
देव मन्दिर के सामने बड़ी गहरी नृत्यशालिका बनानी चाहिए। इनकी स्थिति
पूर्व में, अग्निकोण में वायुकोण में या वारुण अर्थात् पश्चिम दिशा में उचित होती है।
मठस्थानं —
शेषासु ह्यप्रशस्ताश्च आग्नेय्यां सत्रमण्डपम्।
वास्तुवेदीसंस्थितं तन् मठः स्थाप्यस्तु दक्षिणे ॥ २9 ॥
अन्य दिशाएँ उक्त नृत्यशाला के लिए अप्रशस्त कही गई है। आग्नेय कोण में
यज्ञादिक सत्रों के लिए मण्डप बनाने चाहिए। जहाँ वास्तु की यज्ञ वेदी बनी हुई हों
और उस के सञ्चालन का मठ अर्थात् याजक ब्रह्मचारियों के पढ़ने-रहने के आवास
दक्षिण की दिशा में बनाएँ।
गृहं पञ्चारिकायुक्तं मैत्रस्थानसमाश्रितम्।
यतिध्यानालयं कुर्यात् ²प्रलीना यत्र शासने ॥ 30 ॥
वहाँ गृह पञ्चारिका युक्त अर्थात् उपयुक्त आकार का पञ्चायत घर बनाएँ तथा वह
मैत्र स्थान या पद के समाश्रित कहा है अर्थात् नगर की चौपाल (मैत्रस्थान) से लगा
हुआ हो; वहीं आस-पास यतियों, साधु-महात्मा के लिए एकान्त ध्यानार्थ उपयुक्त,
शान्त वातावरण वाला ध्यानालय भी बनाएँ जो शासन के प्रबन्ध से चलाया जाए।
पुरसीमान्तप्राकारे प्रतोलीहट्टमार्गयोः।
जलाश्रयं जगत्यन्ते(यत्रे!) घटिमालासमुद्भवम् ॥ 31 ॥
और उदयपुर में बागोर की हवेली और अन्य हवेलियों के हाथी-घोड़े, छड़ीदार, वरयात्रा,
कलशधारिणी रमणियों आदि के चित्राङ्कन मनोहारी दिखाई देते हैं।
- भूलोकमल्ल सोमेश्वर ने हिन्दोलक क्रीड़ा का वर्णन किया है। अजन्ता के चित्रों में हिण्डोल क्रीड़ा के चित्र
बने हैं। ये वसन्तोत्सव की वेला में होती थीं— ऋतुराजे परिप्राप्ते वसन्तेति मनोहरे। आन्दोलने प्रकुर्वीत
पृथुसम्बद्धयान्विताम्॥ महता तूर्यघोषेण वन्दीवन्देन वन्दितः। गीतवाद्यविनोदेन विप्राशीर्भिर्हृष्टः॥
आरोहेच्चतमान्दोलनं प्रेयसीभिः समन्वितः॥ स्तूयमान्वस्तदा राजा राजते देवराजवत्। सन्तर्प्य प्रियै (मुखे
ताम्बूलं) वस्त्रविभूषणैः॥ ब्राह्मणानायकार्दीश्चैतत् सर्वान्वितसर्जतः। ततः कान्ताजनैः सार्धं
क्रीडादान्दोलकैर्नृपः॥ (मानसो. 5, 3, 183-187) - 'प्रलीना' जिसमें घला मिला होः 'यत्र' जहाँ शासन भी हो।
सूत्र-७२ 405
इसी तरह शासन की ओर से और भी व्यवस्थाओं का वर्णन है। नगर के
सीमान्त या दीवारों, परकोटों के पास, प्रतोली या पोलों-दरवाजों के पास,
हट्टमार्गेयो- बाजारों के मार्गों के पास जगत्यन्ते- चबूतरी के अन्त में जलाशय बनाए
जाने चाहिए और उन पर जलोत्थान के लिए घटिमाला¹ (रहट अथवा नेज-डोरी
गिरगिड़ी) की व्यवस्था होनी चाहिए।
तत्र मण्डपिकादीनां -
क्रयवस्तुयुतौकश्च तदग्रे विक्रयादिकम्।
यतश्चागम्यते लोकैर्वर्तते जनसङ्कुलम्॥ ३२ ॥
(अब व्यापार मण्डी की व्यवस्था के बारे में कहते हैं) जहाँ मण्डियों में क्रय वस्तु
अर्थात् सामान के क्रय-विक्रय के निमित्त लोगों का आना-जाना लगा रहे और भीड़-
भाड़ बनी रहती हो [वहाँ उपर्युक्त जलस्रोतादि के प्रबन्ध में कमी नहीं रहनी चाहिए]।
स्वर्णकारं सुगन्धं च गन्धिकं च तृतीयकम्।
दन्तकर्म धान्यगृहमेतत्कुर्यात्तु पूर्वतः॥ ३३ ॥
इसी तरह मण्डी की व्यवस्थाओं में स्वर्णकारों-सर्राफों की दुकानें, तथा
- उपनिषदों में रहट का वर्णन मिलता है, 906 ई. के आसपास हुए सिद्धर्षि ने 'उपमितिभावप्रपञ्चकथा' में
रहट का वर्णन किया है तथा 10वीं सदी में ही जालोर में लिखित 'कुवलयमाला' में रहट का उल्लेख
मिलता है, वहां जन्मचक्र को रहट के उपमान के साथ समझाया गया है। आद्य शङ्कराचार्य ने
छान्दोग्योपनिषद के भाष्य और अज्ञानबोधिनी ग्रन्थ में 'घटीयन्त्रकूपे' लिखकर इस यन्त्र के आठवीं
सदी में प्रचारित होने का सङ्केत दिया है। 'प्रबन्धचिन्तामणि' में अरघट्टघटीयन्त्र नाम से उल्लेख मिलता
है। रहट का प्राचीनतम विवरण विनयपिटक पर समन्तपादिका टीका में उपलब्ध होता है, जबकि
चुल्लवंग्ग में तुलम्, करकटकम्, चक्कवट्टकम् नाम से सिंचाई के यन्त्रों का सङ्केत मिलता है। दूसरी सदी
में हुए विष्णु शर्मा ने 'पञ्चतन्त्र' तथा इसके प्राचीन पाठ 'तन्त्राख्यायिका' में भी रहट का वर्णन एक
मेंढक व सांप के आख्यान के साथ हुआ है। बारहवीं में पूर्णभद्र द्वारा लिखित 'पञ्चाख्यानक' में भी
रहट का जिक्र है, यह ग्रन्थ मेवाड़ में लोकप्रिय था और महाराणा उदयसिंह के शासनकाल में चित्तौड़
में इसकी प्रतिलिपि तैयार हुई थी। इसी प्रकार हर्षचरित, कादम्बरी में क्रमशः उद्घाटघटी, चूनम नाम
से रहट का उपयोग हुआ है, ये मालवा-मेवाड़ में लोकप्रिय थे। 'विक्रमाङ्कदेवचरित' में
'घटियन्त्रगुणोपम' कहकर इसे उपमेय रूप में दर्शाया गया है। हलायुध के 'अभिधानरत्नमाला' में नहरों
के पानी का उत्थान करने वाले एक साधन के रूप में रहट का उल्लेख किया गया है जिस पर
शब्दकोशकार मोनियर विलियम ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया है। मेवाड़ की सीमा पर मन्दसौर में
यशोधर्मन के 510 ई. के अभिलेख में वहाँ खुदवाए गए कूप पर निरन्तर जलोत्थान के लिए प्रयुक्त यन्त्र
के रूप में मालाकार जलयन्त्र का प्राचीनतम उल्लेख है जबकि रहट के साथ खेतों के दान का प्रथमतः
उल्लेख वीरपुरा, उदयपुर के 1185ई. के ताम्रपत्र में है जिसमें गुजरात के भीमसिंह के सामन्त
अमृतपाल द्वारा लसाड़िया गाँव में अरहट के साथ भूमिदान का अहद है। (कला की कालकथा : डॉ.
श्रीकृष्ण 'जुगनू', रहट प्रकरण)