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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 535 में से

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पृष्ठ 442

सूत्र-७१ ३९७
इससे गृहों की संख्या एक से लेकर हजार तक हो जाएगी; उन भवनों में छह-
छह पदों के अंश पर अर्थात् छह गृहों को छोड़कर उतने ही अर्थात् छह-छह निर्गम
मार्गों की रचना करें।
चतुर्दिक्षु विधातव्यं भद्रस्थानं मनोहरम्।
चतुःकर्णास्तु प्रासादे मार्गाः सप्तदश स्मृताः ॥ २१ ॥
इस प्रकार से रचे गए नगर के भवनों की दीवारों को चारों ओर से मनोहर रूप दें
और चारों कोणों पर प्रासाद, मन्दिरादि बनाएँ और सत्रह मार्ग आवागमन हेतु बनाएँ।
द्विपञ्चाशत् सप्तहस्ता ज्ञातव्या अत्र पण्डितः।
द्वात्रिंशन्मध्यवंशे तु चत्वारः षोडशान्विताः ॥ २२ ॥
इन मार्गों में भी बावन मार्गों की चौड़ाई तो सात गज की हो, ऐसा शिल्पशास्त्र
के पण्डितों ने बताया है और बत्तीस मार्ग मध्य में, आने-जाने वाले चार-चार
सोलह गज की चौड़ाई वाले कहे गए हैं।
सीमान्ते कर्णकर्णेषु चतुर्विंशतिकाः स्मृताः।
अष्टौ मार्गा द्वादश च हस्तसङ्ख्या निगद्यते ॥ २३ ॥
वहाँ पर कोनों से कोनों तक के सीमान्त पर चौबीस मार्ग हों, इनमें आठ मार्ग
बारह गज की चौड़ाई वाले होंगे।
चत्वारिशच्च चत्वारो द्विशतं गर्भमध्यतः।
कर्णे कर्णे च सीमान्ते शेषा विंशतिकान्विताः ॥ २४ ॥
क्षेत्र के नगर के मध्य से चारों ओर दो सौ मार्ग चालीस गज की चौड़ाई के
तथा कोनों से कोनों तक के सीमान्त के शेष मार्ग बीस गज की चौड़ाई के कहे हैं।
नामपादप्रमाणं च संस्थानोन्मानलक्षणम्।
सर्वेषामीदृशं मानं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ २५ ॥
भगवान् आद्य विश्वकर्मा ने इन नगरों के नाम, पाद प्रमाण, संस्थानों के मान,
उन्मान के लक्षण आदि सभी मानों को इस प्रकार निश्चित किया है।
चतुर्द्वारं तु कैलासं चतुर्दृष्ट्य¹ समन्वितम्।
स्थापयेद् ब्रह्मकेन्द्रेषु ब्रह्माणं च पितामहम् ॥ २६ ॥
कैलास नगर के चार द्वार चारों ओर दृष्टि किए हुए (वातायन सहित) हों—
ऐसे मध्य ब्रह्मकेन्द्र के भाग में पितामह ब्रह्मा की मूर्तियुक्त मन्दिर की स्थापना करें।
१. 'चतुर्त्र्यष्ट ?' इति प्रकाशित पाठः।