सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 449

404 अपराजितपृच्छा
बनाएँ और किसी महोत्सव या त्योहारों के लिए आमोद-प्रमोद हेतु वहाँ हिन्दोलक¹
अर्थात् हिन्दे-झूले, डोलर इत्यादि लगाएँ (अथवा हिण्डोलक तोरण बनवाएँ)।
नृत्यशालिकाः —
देवस्य परतः कार्या निगूढा नृत्यशालिकाः।
पूर्वस्यामथवाग्नेय्यां वायव्ये वारुणे शुभम् ॥ २8 ॥
देव मन्दिर के सामने बड़ी गहरी नृत्यशालिका बनानी चाहिए। इनकी स्थिति
पूर्व में, अग्निकोण में वायुकोण में या वारुण अर्थात् पश्चिम दिशा में उचित होती है।
मठस्थानं —
शेषासु ह्यप्रशस्ताश्च आग्नेय्यां सत्रमण्डपम्।
वास्तुवेदीसंस्थितं तन् मठः स्थाप्यस्तु दक्षिणे ॥ २9 ॥
अन्य दिशाएँ उक्त नृत्यशाला के लिए अप्रशस्त कही गई है। आग्नेय कोण में
यज्ञादिक सत्रों के लिए मण्डप बनाने चाहिए। जहाँ वास्तु की यज्ञ वेदी बनी हुई हों
और उस के सञ्चालन का मठ अर्थात् याजक ब्रह्मचारियों के पढ़ने-रहने के आवास
दक्षिण की दिशा में बनाएँ।
गृहं पञ्चारिकायुक्तं मैत्रस्थानसमाश्रितम्।
यतिध्यानालयं कुर्यात् ²प्रलीना यत्र शासने ॥ 30 ॥
वहाँ गृह पञ्चारिका युक्त अर्थात् उपयुक्त आकार का पञ्चायत घर बनाएँ तथा वह
मैत्र स्थान या पद के समाश्रित कहा है अर्थात् नगर की चौपाल (मैत्रस्थान) से लगा
हुआ हो; वहीं आस-पास यतियों, साधु-महात्मा के लिए एकान्त ध्यानार्थ उपयुक्त,
शान्त वातावरण वाला ध्यानालय भी बनाएँ जो शासन के प्रबन्ध से चलाया जाए।
पुरसीमान्तप्राकारे प्रतोलीहट्टमार्गयोः।
जलाश्रयं जगत्यन्ते(यत्रे!) घटिमालासमुद्भवम् ॥ 31 ॥
और उदयपुर में बागोर की हवेली और अन्य हवेलियों के हाथी-घोड़े, छड़ीदार, वरयात्रा,
कलशधारिणी रमणियों आदि के चित्राङ्कन मनोहारी दिखाई देते हैं।

  1. भूलोकमल्ल सोमेश्वर ने हिन्दोलक क्रीड़ा का वर्णन किया है। अजन्ता के चित्रों में हिण्डोल क्रीड़ा के चित्र
    बने हैं। ये वसन्तोत्सव की वेला में होती थीं— ऋतुराजे परिप्राप्ते वसन्तेति मनोहरे। आन्दोलने प्रकुर्वीत
    पृथुसम्बद्धयान्विताम्॥ महता तूर्यघोषेण वन्दीवन्देन वन्दितः। गीतवाद्यविनोदेन विप्राशीर्भिर्हृष्टः॥
    आरोहेच्चतमान्दोलनं प्रेयसीभिः समन्वितः॥ स्तूयमान्वस्तदा राजा राजते देवराजवत्। सन्तर्प्य प्रियै (मुखे
    ताम्बूलं) वस्त्रविभूषणैः॥ ब्राह्मणानायकार्दीश्चैतत् सर्वान्वितसर्जतः। ततः कान्ताजनैः सार्धं
    क्रीडादान्दोलकैर्नृपः॥ (मानसो. 5, 3, 183-187)
  2. 'प्रलीना' जिसमें घला मिला होः 'यत्र' जहाँ शासन भी हो।