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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-३८ 177
ग्रामाणां च तथा सङ्ख्या देशानां च प्रमाणतः ।
राज्ञां च युक्तिमानं च अलङ्कारैस्तद्रूपतः ॥ २ ॥
अब यहाँ के ग्रामों तथा देशों की प्रमाणतः संख्या और यहाँ के राजागणों के
युक्तिमान और उनके अनुरूप अलङ्करणों यानी पदवियों को बताता हूँ।¹
कान्यकुब्जे ग्रामसङ्ख्या षट्त्रिंश₃₆ल्लक्षकाणि च ।
अष्टादश₁₈ लक्षमानं राज्यं गौडेश्वरे मतम् ॥ ३ ॥
कान्यकुब्ज की ग्राम संख्या छत्तीस लाख है और यहाँ के राजा गौड़ेश्वर की
पदवी या उपाधि धारण करते हैं जिनकी आय अठारह लाख मान कही गई है।
तदर्ध₁₈ कामरूपाश्च तत्समं मण्डलेश्वरम् ।
कार्त्तिकपुरे तत्सङ्ख्या चौडे लक्षद्वासमतिः₁₄॥ ४ ॥
इसका आधा कामरूप या आसाम है जहाँ के मण्डलेश्वर की पदवी प्राप्त राजा
की आय भी इसी के अनुरूप आधी है। कार्त्तिकपुर में भी संख्या उतनी ही अर्थात्
अठारह लाख है और यहाँ के अधीश्वर चौड़ कहलाते हैं जिनकी (वार्षिक) आय
चौदह लाख है।

  1. स्कन्दपुराण के माहेश्वरखण्ड-कुमारिकाखण्ड में राजा शतशृङ्ग के उत्तराधिकारियों के वर्णन में कुलदेवी
    कुमारी द्वारा भारतवर्ष के नौ खण्डों के बहत्तर विभाग करने का वर्णन है। इसमें मण्डल प्रदेश में चार
    करोड़ ग्राम व बालाक प्रदेश में ढाई करोड़ ग्राम निर्धारित किए गए। प्रदेशानुसार ग्रामों की संख्या इस
    प्रकार दी गई है—
    खुरासाहणक = सवा करोड़ ग्राम, अन्थल = चार लाख, नेपाल = एक लाख, कान्यकुब्ज = छत्तीस
    लाख, जनक = बहत्तर लाख, गौड़ = अठारह लाख, कामरूप = नौ लाख, लाहर्व व भालदेश = नौ-नौ
    लाख, कान्तिपुर = नौ लाख, माचिपुर = नौ लाख, जालन्धर व लोहपुर = नौ लाख, पाम्बीपुर व रटराज
    = सात-सात लाख, हरिआल = पाँच लाख, इड् = साढ़े तीन लाख, षाम्भण वाहक = साढ़े तीन लाख,
    नीलपुर = इक्कीस हजार, अम्ल = एक लाख, नरेन्द्र = सवा लाख, तिलङ्ग = सवा लाख, मालव =
    अठारह लाख बानवे हजार, सयम्भर = सवा लाख, मेवाड़ = सवा लाख, बागुरि = अस्सी हजार, गुर्जर
    = सत्तर हजार, पाण्डु = सत्तर हजार, तेजाकुति = बयालीस हजार, काश्मीर मण्डल = अड़सठ हजार,
    कौङ्कण = छत्तीस हजार, लघु कौङ्कण = चौदह सौ चालीस, सौराष्ट्र = पचपन हजार, ताड़ = इक्कीस
    हजार, अतिसिन्धु, अश्वमुख, सजानुहुति, वेणु, द्रविड़, भद्राश्व एवं देवभद्रार्श्व = दस-दस हजार, चिरायुष
    व यमकोटि = छत्तीस-छत्तीस हजार, रोमक = अठारह करोड़, कामरु, कर्णाटक तथा जाङ्गल = सवा-
    सवा लाख, स्त्रीराज्य = पाँच लाख, पुलस्ति = दस लाख, काम्बोज व कौशल = दस-दस लाख,
    वाहीक = चार लाख, लङ्का = छत्तीस हजार, वर्धमान = चौसठ हजार, सिंहलद्वीप = दस हजार,
    पाण्ड्य = छत्तीस हजार, भयानक = एक लाख, वरेन्द्रक = तीस हजार, मूलस्थान = पच्चीस हजार,
    यवन = चालीस हजार, पक्षबाहु = चार हजार ग्राम है। इस प्रकार बहत्तर देशों और उनके ग्रामों की
    संख्या है। भारतवर्ष के कुल ग्रामों की संख्या 96 करोड़, 72 लाख व 36 हजार है। (कुमारिकाखण्ड
    39, 125-163)

178 अपराजितपृच्छा
दक्षराज्ये सार्धसप्तलक्षाणि चैव सङ्ख्यया।
अष्टादश च लक्षाणि सहस्राणि द्विनवतिः ॥ ५ ॥
उज्जयिन्यां वै सपादलक्षाणि च स्वयम्भरे।
ललाटे गुर्जरे कच्छे सौराष्ट्रे लक्षकद्वयम् ॥ ६ ॥
दक्षराज्य में ग्रामों की संख्या साढ़े सात लाख है और उनसे होने वाली आय
भी साढ़े सात लाख ही है। उज्जयिनी के ग्रामों की संख्या अठारह लाख है और
आय भी अठारह लाख है। स्वयम्भर (साम्भर) राज्य की ग्राम संख्या सवा लाख है
तथा लाट, गुर्जर, कच्छ और सौराष्ट्र की ग्राम संख्या दो-दो लाख है।
सार्धत्रयं मरुकोटे लक्षाणां मरुमण्डले।
सिन्धुसागरदेशे तु सार्धलक्षत्रयं स्मृतम् ॥ ७ ॥
मरुकोट के ग्रामों की संख्या साढ़े तीन लाख है तथा मरुमण्डल, सिन्धुसागर
देश के ग्रामों की संख्या भी साढ़े तीन लाख मानी गई है।
खुरषाणे चत्वारिशल्लक्षाणि च तथैव च।
त्रिगर्तके द्विलक्षाणि तथा ग्रामास्तु सङ्ख्यया ॥ ८ ॥
खुरासान के ग्रामों की संख्या चार लाख है तथा इसी तरह त्रिगर्त के ग्रामों की
संख्या दो लाख है और उनके आय भी उतनी ही है।
सूर्यलक्षाण्यहिराज्ये षट्सार्धानि गुडाद्वीपे।
जलन्धरे सार्धत्रयं तथा लक्षाणि सङ्ख्यया ॥ ९ ॥
अहिराज्य की ग्राम संख्या बारह लाख और गुडाद्वीप की साढ़े छह लाख,
जालन्धर की साढ़े तीन लाख है।
ग्रामाः षष्टिसहस्राणि तथा षष्टिशतानि च।
षष्टित्रयस्तथा चैव चेत्थं काश्मीरमण्डलम् ॥ १० ॥
स्त्रीराज्यं च त्रिकूटाख्यं काश्मीरपूर्वगणाधिपः ?( पञ्चलक्षाधिश्च ) ।¹
हिमवान् दण्ड आख्यातो वर्षे भारतके तथा ॥ ११ ॥
काश्मीर मण्डल के ग्राम साठ हजार, साठ सौ तिरसठ है। काश्मीर के पूर्व में
त्रिकूट नाम का स्त्री गणराज्य है जहाँ स्त्रियाँ ही राज करती है। यही हिमवान् अर्थात्
हिमालय पर्वत भारतवर्ष की दण्डमान दीवार की तरह स्थित है।

  1. 'पञ्चलक्षाधिश्च' इति स्यात्। तथा च स्कन्दपुराणे माहेश्वरखण्डे— पञ्चलक्षाश्च ग्रामाणां स्त्रीराज्यं
    परिकीर्तितम ॥ ( कुमारिकाखण्ड 39, 53)

सूत्र- ३८ <span style="float: right;">179</span>
महापर्वताश्रिताश्च सजलाशयवर्तिनः ।
पर्वतार्णवमध्यस्थाः सजला देशसम्भवाः ॥ 12 ॥
इस हिमालय महापर्वत के आश्रय में अनेकों सजल जलाशय है इसलिए यह
भारत वर्ष हिमालय पर्वत और सागर के मध्य एक बहुत ही सम्पन्न सजल देश
सम्भव हो सका है।
सिन्धुसागरतो देशाः काश्मीरान्ता जलैर्युताः ।
गौडबङ्गकामरूपाः सजलाः कार्तिकेश्वरे ॥ 13 ॥
इसी के फलस्वरूप सिन्धुसागर तक के देशों से लेकर काश्मीर के अन्त तक
के देश सभी पूर्णतः जल से सम्पन्न है और गौड़, बङ्ग, कामरूप, कार्तिकेश्वर आदि
भी सजल, सम्पन्न क्षेत्र है।
महापर्वताश्रमा वै हिमाद्रौ गन्धमादने ।
श्वेतशृङ्गे हेमकूटे नीलनिशधमन्दरे ॥ 14 ॥
इस हिमालय महापर्वत में अनेकों आश्रम है जिनमें गन्धमादन, श्वेतशृङ्ग,
हेमकूट, नील, निष

180 अपराजितपृच्छा
आत्रिकूटं हिमाद्यन्तं योजनैः शतपञ्चभिः ।
पूर्वापरौतोयनिधी हिमदण्डश्च भारते ॥ १९ ॥
आत्रिकूट अर्थात् त्रिकूट से लेकर हिमालय के अन्त तक की लम्बाई पाँच सौ
योजन की कही गई है और पूर्वा-पर स्थिति में तोयनिधि, समुद्रपर्यन्त फैलकर
भारतवर्ष के लिए एक हिमदण्ड अर्थात् हिमालय की दीवार बनकर खड़ा है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
भरतक्षेत्रग्रामसङ्ख्यानृपराज्यप्रमाणसङ्ख्याधिकारो नामाष्टात्रिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३८ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में भरत क्षेत्र
की ग्राम संख्या, नृपराज्य प्रमाण संख्या अधिकार नामक अड़तीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥
वनयात्रानामैकोनचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ३९ ॥
विश्वकर्मोवाच —
मेरुश्च मन्दरश्चैव पर्वतो गन्धमादनः ।
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च ॥ १ ॥
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव महाशैलाः प्रकीर्तिताः ।
एते पर्वतराजाश्च महावननदीभवाः ॥ २ ॥
विश्वकर्मा बोले कि मेरु, मन्दर, गन्धमादन, हिमवान, हेमकूट, निषध, नील,
श्वेत, शृङ्गवान आदि सब महाशैल कहे गए हैं। ये सभी पर्वतराज हैं और इनसे
महावन और महानदियाँ उत्पन्न हुई हैं।
महेन्द्रौ मलयश्चैव महाविन्ध्यस्तथैव च ।
हिमाद्रिः पारियात्रश्च श्रीशैलश्च तथाऽर्बुदः ॥ ३ ॥
महावनानि ख्यातानि शृणु चोपवनानि च ।
त्रिधोदितं च क्रमतो वनोपवनकाननम् ॥ ४ ॥
महेन्द्र, मलय, महाविन्ध्याचल, हिमाद्रि, पारियात्र, श्रीशैल तथा अर्बुद ये सब
महावनों के लिए विख्यात है। अब उपवनों के विषय में सुनो, जो कि तीन प्रकार
के हैं। यथा— 1. वन, 2. उपवन और 3. कानन।
उपवनदीनां लक्षणं —
यत्र देशाश्च विरला वनकूलेषु संस्थिताः ।
उपवनानि ज्ञेयानि येषु ग्राह्या द्रुमाः शिलाः ॥ ५ ॥

सूत्र-३९ 181
जिन देशों में विरले वनों के समूह स्थित है, उन्हें उपवन समझना चाहिए।
इनसे जलाऊ लकड़ी के पेड़ तथा वहाँ स्थित खदानों से शिलाएँ ली जा सकती हैं।
कीर्तिमान् कीर्तयेद्यत्र रोप्यमाना द्रुमैर्लताः।
काननं तच्च विज्ञेयं नृपक्रीडनहेतुकम् ॥ ६॥
जिन प्रसिद्ध वनों में द्रुम, लतादि का रोपण किया गया हो और जिनको
राजाओं की क्रीड़ा के लिए यथा मृगया, आखेटादि के लिए छोड़ा गया हो, उन वनों
को कानन कहते हैं।
क्रमागतं शम्भुभवं वनोपवनकाननम्।
वनयात्रा तु कर्तव्या तेषां कूलसमाश्रितैः ॥ ७॥
इन वन, उपवन और काननों में क्रमशः शम्भु, शिव की स्थापना करनी चाहिए
और इन वन, उपवन, काननों के किनारे इन शिव स्थानों की स्थापना करके वहाँ
इनके दर्शनार्थ वनयात्राएँ करना भी परम कर्त्तव्य समझना चाहिए।
योग्याः प्रासादप्रतिमालिङ्गगेहादिके तथा।
प्रशस्ता दारुशैलाश्र ग्राह्या यत्र सदा स्मृताः ॥ ८॥
इन स्थानों में योग्यतानुसार प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, गृहादि प्रशस्त माने गए हैं।
इनके निर्माण के लिए सदा ही पाषाण और पेड़, काष्ठादि ग्राह्य माने गए हैं।
अशोकशोकखदिराः कदम्बा देवदारवः।
श्रीपर्णास्तिनिशाश्चैव सरलाश्चन्दनास्तथा ॥ ९॥
भूर्जत्रिमिसश्रेण्यश्च ? शाल्मलीरक्तचन्दनाः।
अन्येऽपि बहवो वृक्षा महत्यश्च शिलास्तथा ॥ १०॥
इनके योग्य वृक्षों में अशोक, शाक, खदिर, कदम्ब, देवदारू, श्रीपर्ण, तिनिश,
सरल, चन्दन, भूर्ज, त्रिमिस, श्रेणी, शाल्मली, रक्तचन्दन आदि अन्य भी बहुत से
वृक्ष हैं। महान शिलाएँ भी ग्राह्य हैं।
संछन्ना बहुभिः पत्रैः प्रदेशा यत्र संस्थिताः।
सरित्तीरं समाश्रित्य रविरश्मिविवर्जिताः ॥ ११॥
(शिला, काष्ठ ग्रहणावसर पर यह विचारणीय है कि) जिस स्थान के प्रदेश
पूरी तरह बहुत से पत्रों से ढके हुए हों और नदी के किनारे के स्थान हों जहाँ इतनी
छाया हो कि सूर्य की किरणें भी भूमि पर नहीं पहुँच पाती हों।
ईशान्यन्त वादिनेत्रं पूर्ववातैः प्रपादिताः।
अन्यवातैर्हताह्येषु अप्रशस्ताः शुभप्रदाः ? ॥ १२॥

182 अपराजितपृच्छा
वन में जाते समय वायु प्रवाह पर विचार करना अपेक्षित है। ईशानकोण के
अन्त से जब ध्वनि करती हुई जोर की हवाएँ बहती हुई आती है और उनके साथ
अन्य हवाएँ भी आहत होती हो तो यह अनुचित और अशुभ है।
सुप्रदेशाः सुसङ्ग्राह्याः सर्वकामफलप्रदाः ।
अप्रशस्ता अन्यकाले निमित्तं चोपलक्षयेत् ॥ 13 ॥
जहाँ-जहाँ सुप्रदेश पाए जाएँ उन्हें सुसंग्रह पूर्वक ग्राह्य किया जाए जिससे सभी
कामनाओं की शुभफलप्रद पूर्ति होती है तथा जो भी अप्रशस्त प्रदेश हों, उन्हें अन्य
काल के निमित्त शकुन हेतु भी दरगुजर कर देना चाहिए।
दिव्यानि चैव भौमानि शुभानि चाशुभानि च ।
प्रशस्तानि शुभान्यत्र चाशुभानि विवर्जयेत् ॥ 14 ॥
दिव्यों की, देवातादिकों की भूमि शुभ और अशुभ होती है उनमें वही प्रशस्त हैं
जो शुभ है, परन्तु जो अशुभ हो उन्हें छोड़ देना चाहिए।
नानाविधानिमित्तानि —
निमित्तानि गजश्चाश्वो वृषभश्च रथो विदुः ।
घृतं पुष्पाक्षते विप्रः कन्या रम्भा च गौर्मृगः ॥ 15 ॥
शतपत्रं च वैश्या च नृपः कुम्भश्च दीपकम् ।
वस्त्रयुग्मं फलं छत्रं यानं झम्पानमासनम् ॥ 16 ॥
वसुन्धरा धृत्यमानाय ? बहलं धान्यं पत्रादिकम ? ।
एतेषु दृश्यमानेषु निष्पत्तिः सुश्रियस्तथा ॥ 17 ॥
अब यात्राकाल में होने वाले निमित्तों या शकुनों के बारे कहता हूँ। गज, अश्व,
वृषभ, रथ, विद्वान, घृत, पुष्प, अक्षत, विप्र, कन्या, केला, गाय, मृग, शतपत्र या
तुलसीपत्र, वैश्या, राजा, घट, दीपक, दो वस्त्रों की जोड़ी, फल, छत्र-यान, पङ्खा,
आसन, वसुन्धरा, धृतिमान, बहुत धान्य पत्रादिक- यदि ये सब यात्रा काल में
दिखाई पड़े, तो अच्छे शकुन या श्रीवृद्धिकारक समझना चाहिए।¹

  1. पूर्वोक्त शकुन काश्यपशिल्पम्, समराङ्गण आदि में भी आए हैं। ये श्रीपति के मत से तुलनीय है—
    भृङ्गाराञ्जनवर्द्धमान मुकुराबद्धेकपञ्चा मिषोष्णीष क्षीरनुयानपूर्ण कलशच्छत्राणि सिद्धार्थकाः ।
    वीणाकेतनमीनपङ्कज दधिक्षौद्राय्य गोरोचनाः कन्याशङ्खसितोक्ष वस्तुमनोविप्राश्चरत्नानि च ॥
    प्रज्वलज्वलनदन्ति तुरङ्गाभद्रपीड गणिकाङ्कुशमृत्स्नाः । अक्षतेक्षुफलचामरभक्षाण्यायुधानि च भवन्ति
    शुभानि ॥ भेरिमृदङ्ग मृदुमर्दल शङ्खवीणा वेदध्वनिर्मधुरमङ्गलगीतघोषाः । पुत्रान्विता च युवतीः सुरभिः
    सवत्सा धौताम्बरश्चरजकोऽभिमुखः प्रशस्तः ॥ (ज्योतिषरत्नमाला 15, 62-64)

सूत्र-३९ 183
तैलाभ्यक्तस्तथाहिश्च मुक्तकेशाः स्त्रियस्तथा।
काष्ठभारं चाग्रहीनं विधवा गुरुषादिकम् ? ॥ १८ ॥
उल्कापातो दिशादाहो महावातप्रवर्तनम्।
तारापातोऽशनिघातः परितः पांशुवर्षणम् ॥ १९ ॥
एतेषु दृश्यमानेषु च भविष्यन्ति वै श्रियः।
न गच्छेत् पदमेकं तु यदीच्छेच्च निवर्तनम् ॥ २० ॥
अशुभनिमित्त के विषय में कहा जा रहा है। तैलाभ्यङ्ग किए हुए, सर्प, खुले
केश वाली स्त्री, लकड़ी का भार लिए हुए सामने आता, आगे से हीन, विधवा,
गुरुघाति, उल्कापात, दिशाओं का दाह, झंझावात चलना, तारा टूटना, गाज गिरना,
इसके उपरान्त पत्थर बरसना— ऐसा यदि सामने दिखाई पड़े तो समझना चाहिए
कि भला नही होने वाला है।¹ उपर्युक्त अपशकुन होने पर कहीं बाहर जाना हो तो
भूल कर भी एक भी कदम आगे न बढ़ाएँ यदि इन अपशकुनों का निवर्तन करना
चाहते हों तो।
मेघगर्जनवृष्टी च मत्स्योदयानि शोभनम्।
अन्तरिक्षे भवेच्छेदः फलपुष्पनिपातनम् ॥ २१ ॥
वायुकां सुरङ्गिकं वागि वामे वृक्ष्याग्रसंस्थिताम् ?।
कौशिको वामतः श्रेष्ठो ह्यशुभो दक्षिणै तथा ॥ २२ ॥
इसी प्रकार यदि मेघ गर्जन के साथ वृष्टि होती हो, मीन राशि आदि का शुभ
उदय हो, अन्तरिक्ष में छेद हो और उससे फल तथा पुष्प गिरते हों। वायुका
सुरङ्गिक वागी (शकुन चिड़िया) वामभाग में वृक्ष पर बैठी हो, कौशिक या उल्लू
बायीं ओर श्रेष्ठ और दक्षिण और अशुभ है।
कङ्कणं हारकेयूरौ मुकूटं कुण्डलादिकम्।
एतेषु दृश्यमानेषु सर्वकामफलं भवेत् ॥ २३ ॥

  1. वराह का मत हैं कि यात्रा में कपास, औषध, काला अन्न, नमक, नपुंसक व्यक्ति, अस्थियाँ, ताल-
    हरताल, अग्नि, साँप, कोयला, विष, कङ्गुली, मल, छुरा, रोगी, वमन करने वाला, पागल,
    पक्षाघातपीड़ित, अन्धा, तृण, तुस-भूसी, क्षुधापीड़ित, तक्र, शत्रु, मुण्डित सिर, तेल लगाया व्यक्ति, खुले
    केश वाला, पापी, लाल कपड़े पहने व्यक्ति आदि अशुभ होते हैं— कार्पासौषधकृष्णधान्यलवणक्लीबा-
    स्थितानलं सर्पाङ्गारगराहिचर्मशकृतः केशारिसव्याधिताः। वातोन्मत्तजडान्धकतुणतुष क्षुत्क्षामतक्रारयो
    मुण्डाभ्यक्तविमुक्तकेशपतिताः काषायिणश्चाशुभाः ॥ (बृहद्योगयात्रा 27, 6; योगयात्रा 13, 14 एवं
    लघुटिकिनिका 9, 15)

184 अपराजितपृच्छा
एवं शुभैश्च शकुनैः प्रविष्टो वनमध्यतः ।
वृक्षं सम्पूज्य तु करे कुठारं पूर्वतो धरेत् ॥ 24 ॥
इसी प्रकार कङ्कण, हार, केयूर, मुकुट, कुण्डलादि— इतने शकुन यदि दिखाई
पड़े तो सर्वकामना की सिद्धि होती है। इस तरह के शुभ शकुनों को ध्यान में
रखकर ही वन में प्रवेश करना चाहिए और पहले वृक्ष की अच्छी तरह पूजा सम्पन्न
करके पूर्व दिशा की ओर मुँह किए हुए हाथ में कुल्हाड़े को ग्रहण करे।
अयं मन्त्रः —
''तत आँ नमोरुद्राय पिङ्गलाय महात्मने ।
विश्वेदेवा विश्वरूप विश्वकर्मणे वै नमः''॥ 25 ॥
अनेन चैव मन्त्रेण कुठारमभिमन्त्रयेत् ।
तत्र क्षेत्रं बलिं दद्यात् समर्च्य सर्वदेवताः ॥ 26 ॥
इसके उपरान्त इस मन्त्र से कुल्हाड़े को अभिमन्त्रित करें— 'ॐ नमो रुद्राय
पिङ्गलाय महात्मने, विश्वेदेवा विश्वरूप विश्वकमणे नमः।' इसके उपरान्त उक्त क्षेत्र
के सभी देवताओं की ठीक तरह से पूजन करके बलि का चरु निवेदित करे।
तदा च छेदयेद् वृक्षं पतितं चोपलक्षयेत् ।
ईशानोत्तरपूर्वे च सर्वकामफलप्रदम् ॥ 27 ॥
इसके बाद ही वृक्ष का छेदन करे और ध्यानपूर्वक यह भी देखें कि वृक्ष
कटकर किस दिशा की ओर गिरता है? यदि कटा हुआ वृक्ष ईशान कोण अर्थात्
उत्तर पूर्व की ओर गिरे, तो इसे सर्वकामफलप्रद समझना चाहिए।
अशुभश्चान्यदिशायां शाखापातस्तथोच्यते ।
दिशायां चाप्रशस्तायां तच्छाखां वर्जयेद् बुधः ॥ 28 ॥
अन्य दिशाओं में वृक्ष की शाखाओं का गिरना अशुभ कहा गया है। जो
शाखाएँ अप्रशस्त दिशाओं की ओर गिरी हों, उन शाखाओं को काम में लेना
विद्वानों¹ ने वर्जित किया है।
एवं संगृह्यते वृक्षमानयेन्नगरादिके।
वेशयेदुत्तरदिशि वादित्रैर्ब्रह्मघोषकैः ॥ 29 ॥
इस प्रकार की सावधानीपूर्वक संग्रह किए हुए वृक्ष को नगर में गाजे-बाजे

  1. यह विधि समराङ्गणसूत्रधार, विश्वकर्माप्रकाश, मयमतम्, मानसार, ईशानशिवगुरुदेवपद्धति, शिल्परत्नम्,
    वास्तुमण्डनम् आदि में भी आई है।

सूत्र-४० 185
और ब्रह्म घोष के साथ लाकर उत्तर दिशा की ओर सम्भालकर उसको स्थान देना
चाहिए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां वनयात्राधिकारो
नामैकोनचत्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वनयात्रा
अधिकार नामक उनचालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥
वनयात्राशिलापरीक्षा नाम चत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४० ॥
विश्वकर्मोवाच –
लिङ्गार्चादिशिलानां च सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ।
पूजा पूर्वविधानेन शिलोद्धारं तु कारयेत् ॥ १ ॥
विश्वकर्मा बोले कि अब लिङ्ग, अर्चा-प्रतिमादि में प्रयुक्त होने वाली शिलाओं
केलक्षण कहता हूँ। शिलोद्धार हेतु अर्थात अर्चा, लिङ्गादि के निर्माण में काम आने
वाली शिला को भूमि से निकालने के लिए पहले वृक्ष लाने में जो (पूर्व अध्याय
में) पूजा विधान कहा गया, वैसा ही पूजा विधान

186 अपराजितपृच्छा
करके उस शिला में पुरुषाकृति में (किस दिशा में सिर और किधर पैर होंगे, ऐसा
देखकर) आकार के हेतु छेद करता जाए।
शिलालक्षणं, युवावृद्धाबालावयपरीक्षणम् —
निबिडा निर्व्रणा तीव्रगम्भीरमधुरान्विता ।
शीतला च सुगन्धा च मृद्वी तेजसमन्विता ॥ ५ ॥
अब योग्यायोग्य शिलाओं के गुण के बारे में कहता हूँ¹— शिला निविडा हो
अर्थात् गाँठ-गठीली न हो, निर्व्रणा हो अर्थात खाड़े खोचर युक्त न हो, तीव्र मधुर
गम्भीर ध्वनि देने वाली हो अर्थात अच्छी टङ्कार ध्वनि वाली हो, ठण्डी हो, सुगन्ध
वाली हो, मृदु हो, घड़ाई में सरल हो, तेज युक्त हो अर्थात आकर्षक हो।
युव नाम्नी शिला ज्ञेया सर्वकामफलप्रदा ।
पूजिता सर्वलिङ्गेषु ह्यर्चंना सर्वशोभना ॥ ६ ॥
ऐसी शिला को युवा नाम की शिला कहते है जो सभी कामनाओं की पूर्ति
करने वाली होती है। यह सभी लिङ्गों के निर्माणार्थ पूजित होती है और सभी
अर्चाओं, मूर्तियों के निर्माण में भी सब तरह से शोभायमान होती है।
मत्स्यमण्डूकतरला यैतैश्चिन्हैः प्रदृश्यते ।
वृद्धा सा तु शिला ज्ञेया सर्वकार्यविनाशिनी ॥ ७ ॥
जिस शिला में मत्स्य, मेंढक और तरला या लहरों के चिह्न दिखाई देते हों, उस
शिला को वृद्धा समझना चाहिए। यह सभी कार्यों में विनाशकारी है।
अतिमृद्वी भवेद् बाला मन्दपुष्पकवेष्टिता ।
टङ्काघातैः साधनीया छेदाद्यं च परीक्षयेत् ॥ ८ ॥
जो शिला बहुत मृदु या नरम हो, वह बाला शिला होती है। यह मन्दपुष्पों से
ढकी हुई होती है। इसको टाँकी के आघात, छेदादि करके परीक्षा करने के बाद ही
उपयुक्त हो तो काम में लिया जा सकता है।
विमलैर्दूषिता या तु वर्जयेत्तां शिलां बुधः ।
विमलं त्रिविधं ज्ञेयं लोहकांस्यजहेमऽम् ॥ ९ ॥
जो शिला विमलों से दूषित होती है, उसे समझदार लोग काम में लाने से मना
करते हैं। ये विमल तीन प्रकार के होते हैं- लोहज, कांस्यज और हेमज।
लोहविमलैर्दुर्भिक्षमनावृष्टिश्च कांस्यजैः ।

  1. देवतामूर्तिप्रकरण और रूपमण्डनं में भी ये ही लक्षण आएँ हैं। इनका उत्स मयमतम् है।

सूत्र-४० 187
हेमजैर्विमलैः पीडा ह्युदितं च त्रिधा क्रमात् ॥ 10 ॥
जिस शिला में लोहज विमल पाया जाए, उससे दुर्भिक्ष होता है। जिसमें कांस्य
विमल पाया जाता हो, उससे अनावृष्टि और हेमज विमल से पीड़ा पैदा होती है।
इसी प्रकार इन तीन दूषित शिलाओं को फल सहित क्रम से कहा गया।
छेदनावसरेमण्डलादीनां दर्शनफलं —
छेदने च कृते तस्या मण्डलं यत्र दृश्यते।
तद् गर्भितं विजानीयात् जीवशिल्प-विचक्षणः ॥ 11 ॥
जिस शिला के छेदन करते समय मण्डल बन जाते हों, उस शिला को गर्भित
समझना चाहिए, ऐसा जीव-शिल्प के जानकार विद्वानों ने कहा है।¹
माञ्जिष्ठे चैव मण्डूको हरिते कर्कटो भवेत्।
पीते गोधा विजानीयात् कृष्णे विद्याद् भुजङ्गमम् ॥ 12 ॥
ऐसी गर्भित शिलाओं के रङ्ग भेद से भी विविध जीवों के होने के सङ्केत
मिलते हैं जैसे मञ्जिष्ठ रङ्ग की शिला में मेंढक होगा और हरित वर्ण की शिला में
केंकड़ा पाया जाएगा। पीले रङ्ग की शिला में गोह या गोधा का होना जाने जबकि
काले रङ्ग की शिला में भुजङ्ग की स्थिति होती है।
पतिले मूषको ज्ञेयः कृकलासश्च श्यामके।
अतिरक्तेन वर्णेन चेन्द्रगोपकामादिशेत् ॥ 13 ॥
इसी प्रकार से पतिल वर्ण की शिला में मूषक जाने, श्याम वर्ण की शिला में
कृकलाश या करगेंटिया अथवा गिरगिट और बहुत ही लाल वर्ण की शिला में
इन्द्रगोप या वीरबहूटी (रामजी की गाय, मखमली जीव जो सावन के दिनों में खेतों
में रक्त के छींटों की तरह दिखाई देता है) जाने।
किंशुकाभे तु खर्जूरोऽतसीपुष्पे पिपीलिकाः।
गुडवर्णे तु पाषाणं कूर्म स्यादापसन्निभे ॥ 14 ॥
पलाश के पुष्पों जैसी दिखाई देने वाली शिला में बिच्छू होगा और अलसी के
पुष्पों जैसी प्रतीत होने वाली शिला में चींटियाँ होंगी और गुड़ के रङ्ग वाली शिला
में पानी के साथ कछुआ हो सकता है।
भस्माभे तिमिरी ज्ञेयो वारला श्वेतभस्मभे।
विचित्रे वृश्चिकं विद्यात् खद्योतं मधुवर्णके ॥ 15 ॥

  1. यहाँ ग्रन्थकार का निश्चय ही सङ्केत जीवाश्म या फॉसिल्स की ओर है। पाषाणों में ही पूर्वकाल में जीवों
    के जीवन के लक्षण मिलते हैं।

188 अपराजितपृच्छा
राख जैसी शिला में तिमिरी (मत्स्य तुल्य रचना) हो सकती है और श्वेत भस्म
के समान दिखाई देने वाली शिला में वारला अर्थात् बर्रे होते हैं और चितकबरी
शिला में बिच्छू होता है। शहद जैसे वर्ण वाली शिला में जुगुन्नू होता है।¹
पञ्चाल्यां खेचरा ज्ञेयाः श्वेतवर्णे नरो भवेत्।
एतैर्दोषैस्त्यजेल्लिङ्गं प्रतिमादोषमेव च॥ 16॥
पञ्चाली शिला में खेचर और श्वेतवर्णी में नर होता है। ये सभी शिलाएँ सदोष
हैं और लिङ्ग एवं प्रतिमा निर्माण में दोषपूर्ण कही गई है। ऐसे में इनका प्रयोग नहीं
करना चाहिए।
उत्तमाधमवर्णैश्च पाषाणानुपलक्षयेत्।
श्वेतश्च पद्मवर्णश्च कुमुदो मुद्गसन्निभः॥ 17॥
पाण्डरो माक्षिकवर्णः कपोतो भृङ्गसन्निभः।
उत्तम, अधम रङ्गों के आधार पर ही शिलाओं की पहचान करनी चाहिए।
सामान्यतया इनका रङ्ग श्वेत, पद्मवर्ण, कुमुद, मूंग जैसा, पाण्डुर, मधुमक्खी के
शहद जैसा, कपोत जैसा, भौंरे जैसा होता है।
श्वेते विप्राश्च वर्द्धन्ते राजन्याः पद्मवर्णके॥ 18॥
वैश्याश्च कुमुदाभेन मुद्गभे शूद्रजातयः।
अन्ये तु शेषवर्णेषु वृद्धिमेवं तु लक्षयेत्॥ 19॥
श्वेत रङ्ग के पाषाणों का प्रयोग लिङ्ग, प्रतिमादि के लिए किया जाने पर
ब्राह्मणों की वृद्धि होती है। पद्मवर्णी शिलाओं के प्रयोग से राजन्यवर्ग की वृद्धि
होती है। कुमुद की आभा वाली शिलाओं के प्रयोग से वैश्य समुदाय की और मूँग
के रङ्ग जैसी शिलाओं से शूद्र जाति की वृद्धि होती है। अन्य शेष वर्णों की शिलाओं
से तो केवल वृद्धि मात्र लक्षित होगी।
आरोग्यं पाण्डुवर्णेषु माषाभे विजयः स्मृतः।
कपोते चार्थवृद्धिश्च भृङ्गाभेषु प्रजाश्रियः॥ 20॥
पाण्डु वर्ण की शिला से आरोग्य और उड़द के रङ्ग वाली शिला से विजय
समझें और कपोत वर्ण की शिला से अर्थवृद्धि तथा भृङ्ग जैसी आभा वाली शिला से

  1. विष्णुधर्मोत्तरपुराण में आया है— सगर्भां तां विजानीयाद् यत्नेन च विवर्जयेत्। माञ्जिष्ठवर्ण संकाशे गर्भे
    भवति दर्दुरः॥ पीतके मण्डले गोधा कृष्ण विद्याद्भुजङ्गमम्। कपिले मूषकं विद्यात् कृकलासं तथारुणे॥
    गुडवर्णे तु पाषाणं कापोते गृहगोधिका। आपो निर्त्रिशवर्णाभे भस्मे वर्णे तु बालुका॥ (तृतीयखण्ड 90,
    11-13; विशेष द्रष्टव्य — प्रतिष्ठा लक्षण सार समुच्चय, पूर्वार्द्ध)

सूत्र-४० 189
प्रजा का भला होता है।¹
अपराजित उवाच -
यदि तत्प्राप्यते चिह्नं यथोक्तं च द्रुमाः शिलाः।
तेषां विधिं क्रियायुक्तं कथयस्य परेश्वर ॥ 21 ॥
अपराजित ने पूछा कि यदि आपने जितने चिह्न बताए हैं, वे चिह्न पेड़ों और
शिला में पाए जाएँ तो हे परमेश्वर! उनकी दुरुस्ती की विधि और क्रिया के बारे में
भी बताने की कृपा करें।
विश्वकर्मोवाच -
पुनश्चेत्राप्यते चिह्नमानीत्वा नगरोत्तरे।
आरोपयेत्ततो वृक्षं क्षिपेद् भूमध्यतः शिलाम् ॥ 22 ॥
विश्वकर्मा बोले कि पुनः यदि लाए गए वृक्ष नगर के उत्तर में रखे हों और
उनमें ये चिह्न पाए जाएँ, उन वृक्षों को भूमध्य में डाली गई शिला के पास आरोपित
कर दें।
शिलोपरि स्थण्डिलं च वृक्षं चोत्तरमाश्रितम्।
मृत्युञ्जयजपं चाष्टाधिकं कुर्यात्तथायुतम् ॥ 23 ॥
और, शिला पर मिट्टी का ढेर लगा लें और

190 अपराजितपृच्छा
उत्तर में आश्रित या खड़ा करें। इसके बाद एक अयुत से आठ अधिक अर्थात् दस
हजार आठ महामृत्युञ्जय जप करने चाहिए।
अष्टोत्तरसहस्रं च हुत्वापामार्गसमिद्भिः।
दिक्षु चिन्हैः पूरितं च समुद्धरेत्पुनर्नवम् ॥ २४॥
इसी प्रकार एक हजार आठ आहुतियाँ अपामार्ग या चिचड़ा की समिधा से
हवन में देनी चाहिए। उनके सभी दिशाओं में प्राप्त चिह्नों को पूरित करके उन
सबको पुनः नए बनाकर उनका उद्धार कर लें।
अनेन विधिना वत्स उद्धरेच्च शिलाद्रुमम्।
अप्रशस्तं प्रशस्तं स्यादनेन विधिनान्वितम् ॥ २५॥
हे वत्स ! इस विधि से तुम शिला और वृक्षों के काष्ठ का उद्धार करके अप्रशस्त
को भी प्रशस्त कर सकते हो। यह विधि अप्रशस्त को प्रशस्त करने वाली है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचर्त्तोक्तेअपराजितपृच्छायां
वनयात्राशिलापरीक्षाधिकारो नाम चत्त्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ ४० ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में वनयात्रा
शिलापरीक्षा अधिकार नामक चालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥
हस्तकम्बीप्रमाणमेकचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४१॥
विश्वकर्मोवाच —
हस्तलक्षणमानं च गायत्रीमानसम्भवः₂₄।
मानोन्मान-प्रमाणं च सर्वकर्मसु कारणम् ॥ १ ॥
विश्वकर्मा बोले कि हस्त लक्षण मान अर्थात् गज के लक्षणमान गायत्री छन्द के
चौबीस अक्षरों की तरह ही चौबीस खण्डों का होता है और यह गजमान, उन्मान,
प्रमाण आदि के लिए सभी कर्मों में, कारणरूप में प्रयुक्त होता है।
विज्ञेयं सूत्रधारेण हस्तमानं च लक्षणम्।
मानोन्मानप्रमाणाख्यं वास्तुशास्त्रादिदीपकम् ॥ २ ॥
अतः सूत्रधार के हस्तमान अर्थात् गज के मान के लक्षण जानने चाहिए जो
मान, उन्मान, प्रमाणादि वास्तुशास्त्र को प्रकाशित करने वाले दीपक के समान हैं।
भास्करोदयनाद् दिष्टः किरणैश्च प्रकाशितः।
जालान्तरगते रश्मौ सूक्ष्मेरेणुर्व्वष्टमांशकः ॥ ३॥

सूत्र-४१ 191
परमाणुः प्रमाणं तत् समुद्दिष्टं समन्ततः।
परमाणुरष्टगुणमेकत्र पिण्डलक्षणम्॥ ४॥
रजोभिरष्टगुणितं केशाग्रं च प्रसिद्ध्यति।
केशाग्रैरष्टगुणितैर्लिक्षाक्रमं तु योजयेत्॥ ५॥
केशाग्रैश्चाष्टगुणितैर्लिक्षा चैका तु सिद्ध्यति।
लिक्षाभिरष्टभिर्यूका यूकाभिश्चाष्टभिर्यवः॥ ६॥
किसी अन्धेरे कक्ष में सूर्योदय के बाद छप्पर के किसी जालान्तरगत छिद्र से
जो रश्मि आती है, उस रश्मि में अन्धकार कमरे में सूक्ष्मातिसूक्ष्म धूलिकण
प्रकाशित होते दिखाई पड़ते हैं, ऐसे सूक्ष्म धूलीकणों को परमाणु कहते हैं और इस
तरह के आठ परमाणु की मात्रा का एक रेणु का प्रमाण कहा गया है। इस परमाणु
का आठ गुणा एक पिण्ड अर्थात् एक रज कहा गया है। ऐसे रज का आठ गुना
केशाग्र अर्थात् बाल की नोक प्रमाण प्रसिद्ध है। केशाग्र का आठ गुना एक लिक्षा
बनती है तथा ऐसी लिक्षा का आठ गुना एक यूका होती है और यूका का आठ गुना
यव अथवा जौ होता है।¹
तथाष्टगुणितैश्चैव यवैर्मानं प्रसिद्ध्यति।
निर्दोषं मानमेतं च स्यात्परमाणुमूलकम्॥ ७॥
इस तरह आठ-आठ गुणित करते हुए रेणु से यव मान प्रसिद्ध हुआ। इस
प्रकार यह परमाणु मूलक मान निर्दोष मान कहा गया है।
उत्तममध्यमाधमं त्रिविधो माननिर्णयः।
न्यूनाधिके कृते हस्ते दोषः स्याच्च महाभयम्॥ ८॥
ऐसे मानों के भी तीन प्रकार कहे गए हैं जिन्हें उत्तम, मध्यम तथा अधम त्रिविध मान

  1. इसी प्रकार वराहमिहिर ने कहा है— जालान्तरगे भानो यदणुतरं दर्शनं रजो याति। तद्विन्द्यात् परमाणुं
    प्रथमं तद्धि प्रमाणानाम्॥ परमाणुरजो वालाग्रलिक्षायूकं यवोऽङ्गुलं चेति। अष्टगुणानि यथोत्तरमङ्गुलमेकं
    भवति संख्या॥ (बृहत्संहिता 58, 1-2) इसकी टीका में उत्पलभट्ट ने निम्न प्रमाण उद्धृत किया है—
    जालान्तरगते भानौ यत् सूक्ष्मं दृश्यते रजः। प्रथमं तत्प्रमाणं परमाणुं प्रचक्षते॥ तस्माद्रजः कचाग्रं च लिक्षा
    यूका यवोऽङ्गुलम्। क्रमादष्टगुणं ज्ञेयं जिनसङ्ख्याङ्गुले करः॥ (सविवृत्तिबृहत्संहितायाम् 57, 2)
    कौटलीयार्थशास्त्र में आया है— अष्टौ परमाणवो रथचक्रविप्रुट्। अष्टौ लिक्षा। ता अष्टौ यूकामध्यः। ते
    अष्टौ यवमध्यः। अष्टौ यवमध्या अङ्गुलम्॥ अर्थात्- आठ परमाणु एक स्थरेणु के बराबर होते हैं, आठ
    स्थरेणु एक लिक्षा, आठ लिक्षा एक यूकामध्य, आठ यूकामध्य एक यवमध्य तथा आठ यवमध्य एक
    अङ्गुलमान के बराबर होते हैं। इसी प्रकार मत्स्यपुराण में कहा गया है— जालान्तरप्रविष्टानां भानूनां
    यद्रजः स्फुटम्। त्रसरेणुः स विज्ञेयो बालाग्रं तैरथाष्टभिः॥ तदष्टकेन लिख्या तु यूका लिक्ष्याष्टकैर्मता। यवो
    यूकाष्टकं तद्वष्टभिस्तैस्तदङ्गुलम्॥ (अध्याय 258, 17-18)

192 अपराजितपृच्छा
निर्णय किए गए हैं। अस्तु, हस्त में अर्थात् गज के प्रमाण में इनको बताए गए नियमों से
न्यूनाधिक रखने पर महान भय उत्पन्न हो सकता है, अतः पूरा ध्यान रखना चाहिए।
ज्येष्ठादीना हस्तभेदाः —
ज्येष्ठं चाष्टयवैः ₈ प्रोक्तं मध्यमं सप्तभिर्यवैः ₇ ।
स्यात्कनिष्ठं षड् ₆ यवैस्तच्च्यतुर्विंशतिभिः ₂₄ करः ॥ 9 ॥¹
आठ यव के प्रमाण के 24 भागों वाले गज को ज्येष्ठ गज कहा जाता है। सात
यव के प्रमाण के चौबीस भागों वाले गज को मध्यम और छह यव के प्रमाण के
चौबीस भागों वाले गज को कनिष्ठ गज कहा जाता है। यहाँ गज को ही कर अथवा
हस्त या हाथ कहा है।
एवं मानोद्भवो हस्त उदितश्च त्रिधा क्रमात् ।
अङ्गुष्ठाग्रे पर्वरैखा पुष्पकं त्रिभिरङ्गुलैः ॥ 10 ॥
इस प्रकार के मान अर्थात् नाप से ही उद्भव होने वाले अर्थात् बनने वाले हस्त
का उदित भी तीन प्रकार का होता है— हस्त या गज के अङ्गूठे से दबे भाग के
आगे से पर्व रेखाएँ आरम्भ होती है उनमें तीन अङ्गुल यव प्रमाणानुसार बने भाग
पर पुष्पचिह्न बनाए जाते हैं² और निम्न रुद्र गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों के
अनुसार ये चौबीस भाग बनते हैं—
अथ रुद्रगायत्री —
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि ।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्............ ॥ 11 ॥
(वह तत्पुरुष जिसका का कि रूप महादेव है, उसका ध्यान करते हैं, वह रुद्र
हमारी बुद्धियों को आलोक के मार्ग पर प्रेरित करें।) इसमें चौबीस अक्षर हैं।³


  1. यह श्लोक समराङ्गण. से तुलनीय है— अष्टाभिः सप्तभिः षड्भिरङ्गुलानि यवोदरैः । ज्येष्ठमध्यकनिष्ठानि
    तच्चतुर्विंशतिः करः ॥ (समराङ्गण. 9, 5)
  2. राजवल्लभ में कहा गया है कि एक मात्रा या अङ्गुल बिना छिलके के छह उत्तम यवों के मध्य को
    संयुक्त करने से होती है। हस्त के पूर्व भाग में एक-एक अङ्गुल की दूरी पर चार पुष्प, इसके बाद हस्त
    के मध्य से अङ्गुल आठों पर्व पर्यन्त पुष्प करने चाहिए— हस्तः पर्वाष्टयुक्तो मुनिवररचितः पर्व चैकं
    त्रिमात्रम् मात्रा षण्णां यवानामुदरविमिलिता निस्त्वचामुत्तमानाम् । (राजवल्लभ. 1, 33)
  3. यह मन्त्र लिङ्गपुराण में (खण्ड 2, 27, 45; 2, 48, 7 तथा 2, 48, 7 पर) आया है। साधकों के लिए
    इसके जाप का नियम इस प्रकार कहा गया हैं— ॐ तत्पुरुषाय से अङ्गुष्ठ, विद्महे से तर्जनी, महादेवाय
    से मध्यमा, धीमहि से अनामिका, तन्नो रुद्रः से कनिष्ठिका का स्पर्श करें, प्रचोदयात् से करतलकर पृष्ठ
    स्पर्श करें। इसके लिए अङ्गन्यास - ॐ तत्पुरुषाय से हृदय, विद्महे से सिर, महादेवाय से शिखा,
    धीमहि से कवच, तन्नो रुद्रः से नेत्रत्रय, प्रचोदयात् से अस्त्र हथेली में दो अङ्गुलि ताडन करे।

सूत्र-४१ 193
एते अङ्गुलाक्षराणि क्रमशश्चैव संस्थितः।
पुष्पके देवतास्तिस्रः प्रतिष्ठाप्या यथाक्रमम्॥ १२॥
ये इतने अङ्गुल अक्षरोंके अनुसार क्रमशः बनते हैं और प्रत्येक पुष्प चिह्न के
स्थान पर तिस्र पर यथाक्रम देवताओं की प्रतिष्ठा करके स्थापना करनी चाहिए।
आदौ विष्णुरग्रे रुद्रो ब्रह्मा मध्ये च संस्थितः।
भूर्भुवः त्वर्बीजत्रयं स्युराद्यस्वरदेवताः॥ १३॥
हस्त-गज के अन्त में विष्णु, आगे की ओर रुद्र और मध्य में ब्रह्मा स्थित होते
हैं तथा भूर्भुवः स्वः की बीजत्रयं की आद्यस्वर देवता रूप में प्रतिष्ठा है।
ईश्वरो वायुविश्वे च वह्निर्ब्रह्मा दिवाकरः।
रुद्रौ यमो विरूपाक्ष्यो वसुरिन्द्रो जलाधिपः॥ १४॥
स्कन्द इच्छा क्रियाज्ञानं धनदो विजयस्तथा।
वासुदेवो बलभद्रः प्रद्युम्नश्चानिरुद्धकः॥ १५॥
एते च वासुदेवांशाः कम्बिकानिश्चला स्मृताः।
आगमैर्वेद मन्त्रैश्च पूज्याश्च परमाः कलाः॥ १६॥
ईश्वर, वायु, विश्वेदेव, वह्नि, ब्रह्मा, दिवाकर, रुद्र, यम, विरुपाक्ष, वसु, इन्द्र, वरुण,
स्कन्द, इच्छा, क्रिया, ज्ञान, कुबेर, विजय, वासुदेव, बलभद्र, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध— इतने
सभी वासुदेव के अंश इस कम्बिका, गज में निश्चल रूप से अवस्थित है, ऐसा माना जाता
है। अस्तु, आगमों और वेद मन्त्रों से इस परमा शिल्प कला को पूजा जाता है।
रुद्रश्च पवनस्त्वष्टाऽनलो ब्रह्मा तथा यमः।
वरुणो धनदो विष्णुर्मूलतश्चान्ततः स्थिताः॥ १७॥
रुद्र, पवन, त्वष्टा, अनल, ब्रह्मा, यम, वरुण, कुबेर, विष्णु आदि मूल से लेकर
अन्त तक गज में स्थित है।
हस्तोपयोगीकाष्ठादीनां —
अञ्जनैः खदिरैर्वंशैः कनिष्ठाः सर्जपादपैः।
हेमरौप्यताम्रमयाः श्रेष्ठा लौहाश्च मध्यमाः॥ १८॥
हस्त जिन-जिन धातु, काष्ठादि से बनाए जा सकते हैं उनके नाम हैं— अञ्जन
वृक्ष की लकड़ी, खदिर, बाँस तथा सर्जपादप या सहजना के कनिष्ठ तथा स्वर्ण,
चाँदी, ताम्र के श्रेष्ठ और लोहे के हस्त-गज मध्यम कहे गए हैं।¹

  1. राजवल्लभ. में कहा गया है- पुष्पैः चत्वारि पूर्वं तदनु च विभजेत्तुलैः पर्वपुष्पैर्निग्रन्थी रक्तकाष्ठो मधुमय

ुलानां क्रमेण नवदेवताः ॥ 23 ॥`

  • Line 22: सिद्धार्थ अङ्गुल अर्थात् मध्यमा अङ्गुल के समान मोटाई का पिण्ड करके,
  • Line 23: उसके आधे से चौबीस अङ्गुल के क्रम से नव देवता हैं।
  • Line 24: रुद्राद्या ब्रह्मापर्यन्तं देवाः स्थानेषु पुष्पके ।
  • Line 25: ब्रह्मतो विष्णुपर्यन्तं रेखाः स्युर्द्वादशाङ्गुलैः ॥ 24 ॥
  • Line 26: इनमें रुद्र से आरम्भ करके ब्रह्मा तक के देवों के पुष्पक होते हैं और ब्रह्मा से
  • Line 27: विष्णु पर्यन्त के बारह अङ्गुल में रेखा होती है।
  • Footnotes:
    उदितः खदिरो वंशाधात्वोः ॥ (राजवल्लभ. 1, 33)
    समराङ्गण. में आया है— तस्य निर्माणदारूणि देवताश्च प्रचक्ष्महे ॥ खदिराञ्जनवंशादिशूक्ष्णरूपं मनोरमम् ।
    `सारवच्च भवेदिष्टं दारु हस्तप्रकल्पने ॥ ग्रन्थिलं लघु निर्दग्धं जीर्णं स्फुटितं तथा ।

सूत्र-४१ 195
ब्रह्मादिस्थानपञ्चकं द्विभक्तं चाङ्कितं त्रिधा।
अष्टतङ्गुलं कार्यं चतुर्था द्वादशाङ्कितम् ॥ २५ ॥
ब्रह्मा से आरम्भ होने वाले स्थान पञ्चक को दो भागों में बाँटे और अष्टम स्थान
को तीन भाग में बाँटे तथा बारहवें अङ्गुल स्थान को चार भाग में बाँटकर अङ्कित
कर देना चाहिए।
इत्युक्तमानप्रमाणं प्रयुक्तं वास्तुवेदिभिः ।
वास्तोरुत्तरपार्श्वेऽर्च्यं कम्बिकाकलशादिकम् ॥ २६ ॥
इस प्रकार मान प्रमाण को वास्तुशास्त्र के विद्वानों ने प्रयुक्त किया है। इस कम्बिका-
गज की और कलशों की वास्तु के उत्तर की ओर स्थापना करके पूजा करनी चाहिए।
आच्छादयेद्वस्त्रयुग्मैः कम्बिकां कलशांस्तथा ।
सुगन्धधूपपुष्पैश्च देवतार्थार्नादिकैः ॥ २७ ॥
इसके बाद, दो वस्त्रों से कम्बिका-गज और कलश को अलग-अलग ढक दे
और सुगन्धित धूप, पुष्पों से देवताओं का पूजन, अर्चादिक करें।
समुद्धरेत् पूजयित्वा स्तोत्रैर्याम्यकरोत्तमैः ।
उच्चाटनं व्याधी रोगस्तथा सन्तापकारणम् ॥ २८ ॥
अग्निभयं प्रजापीडा मृत्युर्व्याधिः पुनस्तथा ।
निधनं नरकपातं रुद्रादि विष्णुतुस्तथा ॥ २९ ॥
इसी प्रकार स्तोत्र का पाठ करते हुए दाहिने उत्तम हाथ से उनको उठाएँ।
कम्बिका-गज के रुद्र से आरम्भ करके ब्रह्मा भाग तक (पीड़ित होने पर) होने
वाले विघ्न हैं— 1. उच्चाटन, 2. व्याधि, 3. रोग, 4. सन्ताप, 5. अग्निभय, 6.
प्रजापीड़ा, 7. मृत्यु व्याधि, 8. निधन और 9. नरक में गिरना।
एकाङ्गुलौ मानप्रयोग एवं सङ्ख्याशब्दादिकोत्तमः ? ।
पर्यायशब्दा व्यवहारयोगे समीरिताः सूत्रकलाप्रवीणैः ॥ ३० ॥
एक अङ्गुल से बनने वाले मान, माप का प्रयोग एवं शब्दादिकों के द्वारा समझी
जाने वाली संख्या के उत्तम पर्याय शब्द जो व्यवहार में लाने के योग्य हैं, ऐसे सूत्र
कला के प्रवीण विद्वानों ने निर्धारित किए हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
हस्तकम्बीप्रमाणाधिकारो नामैकचत्वारिंशत्तमं सूत्रम् ॥ 41 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में हस्तकम्बी
प्रमाण अधिकार नामक इकतालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 41 ॥

196 अपराजितपृच्छा
गणितशब्दनिघण्टुर्नाम द्विचत्वारिंशं सूत्रम् ॥ ४२ ॥
विश्वकर्मोवाच -
शब्दा उक्ता अङ्गुलाद्या निघण्टौ भाषितानि च।
भूयोजनप्रमाणानि प्रवक्ष्यामि यथार्थतः ॥ १ ॥
विश्वकर्मा बोले कि निघण्टु में भाषित जो शब्द अङ्गुल से आरम्भ करके भूमि
के योजन प्रमाणों के लिए कहे गए हैं, उनको मैं ठीक-ठीक तरह से कहता हूँ।
अथाङ्कज्ञानमाह -
क्ष्माक्षितितनुशब्दरूप-मन्त्रचन्द्राश्चैकपर्यायाः।
पक्षयुग्मनेत्रद्वन्दगोलकं दस्त्राश्विन्यौविषाणचरणा द्वयोः ॥ २ ॥
एकादि संख्याओं के पर्यायार्थक शब्द क्रमशः ये हैं- संख्या 1 के लिए क्ष्मा,
क्षिति, तनु, शब्द, रूप, मन्त्र और चन्द्रमा शब्दों का प्रयोग होता है। इसी प्रकार संख्या
2 के लिए - पक्ष, युग्म, नेत्र, द्वन्द, गोलक, हस्त, अश्विनौ, विषाण और चरण होते हैं।
अग्नयो गुणरामाश्च कालसङ्ख्याविधिस्तथा।
शक्तयो हरनेत्राणि त्रयाणां वाचका इमे ॥ ३ ॥
संख्या 3 के लिए अग्नि, गुण, राम, काल, संख्या, विधि, शक्ति-त्रिशूल,
हरनेत्र - इतने तीन के पर्याय हैं।
कृतकोणयुगविध्यास्य तुर्याम्बुधि दिग्विदिग्मङ्गला।
गोचरणमार्गाख्यातं भागाः श्रुतयश्च सङ्ख्या चतुर्णाम् ॥ ४ ॥
संख्या 4 के लिए कृत, कोण, युग, विधिमुख या आस्य, तुर्य, अम्बुधि, दिक्-
विदिक्, मङ्गल, गोचरण, मार्ग, भाग, श्रुतियाँ— ये संख्या चार के पर्याय हैं।
इषुविषयतत्त्वेन्द्रियधृषण ? (स्वर्द्रु !)शम्भुवक्त्र क्षेत्राणि।
वास्तुलिङ्ग प्रतीता हत ? (व्रत !)भवमुखानि च पञ्चानाम् ॥ ५ ॥
संख्या 5 के लिये इषु, विषय, तत्त्व, इन्द्रिय, (धृषण ? स्वर्दु), भूषण,
शम्भुवक्त्र, क्षेत्र, वास्तुलिङ्ग, प्रतीत, हत ? भवमुख - ये पाँच के पर्याय हैं।
गायत्रीदर्शनखण्डरसर्तुयान कर्णिक ? ( कोणक! ) रागषण्मिश्रम्।
द्विशक्ति काणगण रत्नशक्त्या ननामृत ग्रन्थ स्कन्दवक्त्रं षण्णाम् ॥ ६ ॥
संख्या 6 के लिए गायत्री, दर्शन, खण्ड, रस, ऋतु, यान, कर्णिक ? (कोणक),
राग, षण, मिश्र, द्विशक्ति, काणगण, रत्नशक्ति, नानामृत, ग्रन्थ, स्कन्दवक्त्र
(कार्तिकेय के मुख, षडानन) - इतने छह संख्या के पर्याय हैं।