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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 535 में से

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पृष्ठ 241

ुलानां क्रमेण नवदेवताः ॥ 23 ॥`

  • Line 22: सिद्धार्थ अङ्गुल अर्थात् मध्यमा अङ्गुल के समान मोटाई का पिण्ड करके,
  • Line 23: उसके आधे से चौबीस अङ्गुल के क्रम से नव देवता हैं।
  • Line 24: रुद्राद्या ब्रह्मापर्यन्तं देवाः स्थानेषु पुष्पके ।
  • Line 25: ब्रह्मतो विष्णुपर्यन्तं रेखाः स्युर्द्वादशाङ्गुलैः ॥ 24 ॥
  • Line 26: इनमें रुद्र से आरम्भ करके ब्रह्मा तक के देवों के पुष्पक होते हैं और ब्रह्मा से
  • Line 27: विष्णु पर्यन्त के बारह अङ्गुल में रेखा होती है।
  • Footnotes:
    उदितः खदिरो वंशाधात्वोः ॥ (राजवल्लभ. 1, 33)
    समराङ्गण. में आया है— तस्य निर्माणदारूणि देवताश्च प्रचक्ष्महे ॥ खदिराञ्जनवंशादिशूक्ष्णरूपं मनोरमम् ।
    `सारवच्च भवेदिष्टं दारु हस्तप्रकल्पने ॥ ग्रन्थिलं लघु निर्दग्धं जीर्णं स्फुटितं तथा ।