अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
DevanagariHindipublished535 पृष्ठ
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ुलानां क्रमेण नवदेवताः ॥ 23 ॥`
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सिद्धार्थ अङ्गुल अर्थात् मध्यमा अङ्गुल के समान मोटाई का पिण्ड करके, - Line 23:
उसके आधे से चौबीस अङ्गुल के क्रम से नव देवता हैं। - Line 24:
रुद्राद्या ब्रह्मापर्यन्तं देवाः स्थानेषु पुष्पके । - Line 25:
ब्रह्मतो विष्णुपर्यन्तं रेखाः स्युर्द्वादशाङ्गुलैः ॥ 24 ॥ - Line 26:
इनमें रुद्र से आरम्भ करके ब्रह्मा तक के देवों के पुष्पक होते हैं और ब्रह्मा से - Line 27:
विष्णु पर्यन्त के बारह अङ्गुल में रेखा होती है। - Footnotes:
उदितः खदिरो वंशाधात्वोः ॥ (राजवल्लभ. 1, 33)
समराङ्गण. में आया है— तस्य निर्माणदारूणि देवताश्च प्रचक्ष्महे ॥ खदिराञ्जनवंशादिशूक्ष्णरूपं मनोरमम् ।
`सारवच्च भवेदिष्टं दारु हस्तप्रकल्पने ॥ ग्रन्थिलं लघु निर्दग्धं जीर्णं स्फुटितं तथा ।