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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

वज्र, विद्युत्पात होने लगते हैं। वर्ष के अन्त में भूकम्प होते हैं। कभी-कभी वर्ष के
आधे में भी रह-रहकर भूकम्प पुनः होते हैं। दिन-रात धूल की वृष्टि होती है।
यमदंष्ट्रासमं रौद्रं भूतलं च प्रदृश्यते।
आन्ध्यं घोरं भवेन्मेघैः सर्पवृष्टिः प्रजायते ॥ 18 ॥
·स्वर्गतः पतति त्वेवं पुरुषो विकृताननः।
सर्वेशे सौरसम्भ्रूया मनुजा वीरविक्रमाः ? ॥ 19 ॥
चारों ही ओर यम के दाढ़ों वाले रौद्र रूप भूतल पर दिखाई देने लगते हैं। घोर
आँधियाँ चलती हैं और मेघों से सर्पों की वर्षा होती है। स्वर्ग से ऐसे-ऐसे विकृत
मुँहों वाले लोग गिरते हैं जो सभी वीर विक्रम मनुष्य सौर सम्भूया अर्थात् उग्र
प्रकृति लिए होते हैं।
यक्ष किन्नरगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः।
सर्वे ते प्रलयं यान्ति कल्पान्ते च समुत्थिते ॥ 20 ॥
पर्वताः सागरा द्वीपाः सरितः सागरादिकम्।
भक्षन्ति सर्वभूतानि कालाग्निश्च यमो यथा ॥ 21 ॥
कल्पान्त के होने पर यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस आदि सभी
प्रलय में समाप्त हो जाते हैं। पर्वत, सागर, द्वीप, नदियाँ, सागरादि सब लोगों को ऐसे
ही खा जाते हैं जैसे कालाग्नि में यम सब का भक्षण कर लेता है।
चतुर्दशमन्वन्ते च दिने प्राप्ते यथा ध्रुवम्।
रजन्यन्ते च सम्प्राप्ते ह्युदिते सूर्यमण्डले ॥ 22 ॥
बिम्बमध्यसमास्त्वेवं पुरुषाननसंनिभाः।
विकृताननरूपाश्च दंष्ट्रायुक्ताः करालिनः ॥ 23 ॥
चौदह मनुओं के अन्त में पुनः दिन यथा ध्रुवं- सदा की भाँति होने लगते हैं
जैसे रजनी-रात्रि के अन्त होने पर सूर्य मण्डल का उदय होता है और सूर्य मण्डल
के समस्त बिम्बों में कराल दांत किटकिटाते हुए विकृत, खूँखार मुँह वाले मनुष्यों
के मुखों के समान दिखाई पड़ते हैं।
द्वौ सूर्यौ पूर्वदिग्भागे द्वो च दक्षिणदिक्स्थितौ।
सूर्यद्वयं पश्चिमे चोत्तरे सूर्यद्वयोदयः ॥ 24 ॥
द्वौ सूर्यौ नागलोकस्थौ द्वौ सूर्याबुपरि स्थितौ।
इत्थं ते द्वादशादित्याः कल्पान्ते सर्वतो दिशम् ॥ 25 ॥
दहन्ति पृथिवीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम्।

सूत्र - १०
सर्वभूतानि दहति कालाग्निश्चापरस्तथा ॥ २६ ॥
कल्पान्त में सभी दिशाओं में भीषण सूर्यों का आतप फैल जाता है— पूर्व में
दो सूर्य, दक्षिण में दो, पश्चिम में दो, उत्तर में दो सूर्य; नागलोक, पाताल में दो सूर्य
और आकाश में ऊपर की ओर भी दो सूर्य— इस प्रकार बारहों आदित्य कल्पान्त
में सभी दिशाओं से पृथ्वी को इस प्रकार जलाने लगते हैं मानों कालाग्नि में जल रहे
हों।
देवदानवगन्धर्वान् पिशाचोरगराक्षसान् ।
पृथिव्यां दह्यमानायां हविर्गन्धः प्रजायते ॥ २७ ॥
अस्तंगते सूर्यबिम्बे द्रोणमेघोद्भवस्तथा ।
वर्षन्ते च महोमेघा धारा करिकरानिव ॥ २८ ॥
इस तरह देवों, दानवों, गन्धवों, पिशाचों, उरगों, राक्षसों और पृथ्वीवासी
मनुष्यों के जलने से ऐसी दुर्गन्ध प्रसारित हो जाती है जैसी पशुओं की हवि देने पर
फैलती है। सूर्य बिम्ब के अस्तंगत होने पर भयङ्कर द्रोण मेघों का उदय होता है। वे
बहुत घनी वर्षा करते हैं। इन महामेघों से होने वाली भयानक वर्षा की झड़ी और
धाराएँ ऐसी लगती है मानों विशाल हाथी अपनी सूण्ड से पानी की भयङ्कर बौछार
कर रहे हों।
अष्टादशैव मेघाश्च महाद्रोणघनोदये ।
पृथिवीत्थं समन्ताच्य समुद्रैश्चार्णवीकृता ॥ २९ ॥
चतुर्दशलक्षयोजनानि ध्रुवं रक्षतु उदकोद्भवम् ।
तमस्त्रौ विशीर्यन्ते अम्भोर्भव तनो वृता ? ॥ ३० ॥
अन्धकारे तथा घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
चन्द्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते ॥ ३१ ॥
इस तरह प्रलयङ्कारी महाद्रोण मेघों के उदय होने पर अठारहों प्रकार के मेघ
चारों ओर से घिर आते हैं और समस्त पृथ्वी को भयानक वर्षा से आप्लावित करके
एक तरह से चारों ओर समुद्र रूप में अर्णवीकृत कर देते हैं। जल ही जल का
सागर बना देते हैं। चौदह लाख योजनों तक यह जल चारों ओर एक तरह से ध्रुव
रूप से, स्थायी लगने लगता है और जब रात्रि की तमिस्रा अर्थात् अन्धकार मिटने
लगता है और पुनः सूर्य बिम्ब का उदय होने लगता हे तो इस जल से आवृत्ता सभी
स्थावर, जङ्गम जीव, चन्द्र, सूर्य, पवन, ज्योतियाँ आदि जो अन्धकार में नष्ट होकर
प्रलय को प्राप्त हो गई थीं (पुनः सृष्टिभूत होने लगती हैं)।

94 अपराजितपृच्छा
एवं जाते तदाकाले विष्णौ क्षीरोदसंस्थिते।
क्षीरोदस्थितविष्णोश्च शेषपर्यङ्कशायिनः ॥ ३२ ॥
नाभेर्ब्रह्मा समुत्पन्नः पद्मयोनिश्च सृष्टिकृत्।
ततः सर्वं समुत्पन्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ ३३ ॥
ऐसे हो जाने पर तब क्षीरसागर में शेषनाग के पर्यङ्क पर सोने वाले विष्णु की
नाभि से निकलने वाले कमल नाल से पद्मयोनि से जन्म लेने वाले ब्रह्मा पुनः सृष्टि
की रचना करते हैं जिससे सभी स्थावर, जङ्गम जीवों की उत्पत्ति होती है।
योऽसौ क्षीरोदमध्ये तु सप्तलोकजलाम्बुधौ।
शेषे च नागपर्यङ्के शेषस्याहेश्च तद्विधिः ? ॥ ३४ ॥
............. फणिमणिकिरणैर्व्यज्यते श्वासवातैः।
............. ऋषिमुनिगणैर्ऋग्यजुः साममन्त्रैः।
............. स्तूयमानो ............ ब्रह्मादि देवैः।
विष्णुस्त्रैलोक्यनाथः कलिकलुषहरः पातु वैः पद्मनाभः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार ये सभी जीव क्षीर समुद्र में सप्तलोक में व्याप्त जलाम्बुधि अर्थात्
सागर में शेषशय्या के नाग पर्यङ्क पर सोये हुए विष्णु भगवान् कलि-कलुष के हरने
वाले प्रभु की सर्प तो अपने फणों मणियों से श्वासाघात से पँखा करके और ऋषि
मुनिगण ऋक्, यजु और साम मन्त्रों से तथा ब्रह्मादि देवतागण उनकी स्तुतिगान
करके, उन पद्मनाभ भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
कल्पान्ताधिकारो नाम विंशं सूत्रम् ॥ २० ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में कल्पान्त
अधिकार नामक बीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २० ॥
अक्षयलिङ्गसृष्ट्युद्भवो नामैकविंशं सूत्रम् ॥ २१ ॥
अपराजित उवाच -
पूर्वसृष्ट्युद्भवो यद्वत्तथा तन्नाम देवता।
अन्यथा वा भवेदिन्द्रस्तथा च त्रिदशोद्भवः ॥ १ ॥
उपस्थिते च कल्पान्ते किं पुनः सृष्टिरुद्भवेत्।
पूर्वाभिधानयुक्ता चान्यथा वा कथय प्रभो ॥ २ ॥

सूत्र-२१ 95
अपराजित बोले — पूर्व में जिस प्रकार से सृष्टि उत्पन्न हुई और उसके नाम के
जो-जो देवता हुए, क्या उनसे अन्यथा अर्थात् अन्य प्रकार के इन्द्र और देवता,
कल्पान्त के उपस्थित होने पर पुनः उत्पन्न होते हैं? हे प्रभु! क्या वे पहले का नाम,
धाम वाले ही होते हैं या अन्य प्रकार के होते हैं, यह सब आप कहिए।
विश्वकर्मोवाच —
कल्पान्ते च गते त्वेवं जीवरूपा नु चेतसा।
सर्वे ते प्रलयं यान्ति गङ्गेव हरमस्तके ॥ ३॥
कल्पे कल्पे प्रलीयन्ते यत्र यत्रापि देवताः।
आत्मरूपे पञ्चलिङ्गे सर्वभूतात्मकेषु च ॥ ४॥
विश्वकर्मा ने कहा — कल्पान्त होने पर इस प्रकार समस्त जीव रूपी चैतन्य
प्राणी प्रलय को प्राप्त हो जाते हैं जैसे शिव के मस्तक में गङ्गा समा गई थी। कल्प-
कल्प में जहाँ कहीं भी देवता होते हैं, वे भी उसी प्रकार प्रलय में लुप्त हो जाते हैं
तथा सभी भूतात्मकों में अर्थात् प्राणियों में सभी पाँच लिङ्गों की आत्मा-रूप में
लीन हो जाते हैं।
अविमुक्तं च केदारं ओङ्कारामरकण्टके।
पञ्चमं श्रीमहाकालं कल्पान्ते लिङ्गंमव्ययम् ॥ ५॥
ततः काले समुद्भूता भरतक्षेत्रदेवताः।
बदरीमथुरायोध्या योगेशं विश्वसम्भवः ॥ ६॥
पञ्चाक्षयानि कल्पान्ते हरिक्षेत्राणि वै विदुः।
एषु भव्यकलाः सर्वा विष्णोश्चामोघमालिनी ॥ ७॥
पहला अविमुक्त, द्वितीय केदार, तृतीय ओङ्कारेश्वर, चतुर्थ अमरकण्टक और
पञ्चम श्रीमहाकाल— ये पाँचों कल्पान्त में अव्यय लिङ्ग में समा जाते हैं। भरत क्षेत्र
में उत्पन्न होने वाले देवता, बदरीनाथ, मथुराधीश, अयोध्यापति, योगेश, द्वारकाधीश
और विश्वेश्वर विष्णु क्षेत्रों के पाँचों देवता कल्पान्त में क्षय को प्राप्त होते हैं, ऐसा
सभी जानते हैं और इन सभी की पुनः उत्पन्न होने की कला भगवान् विष्णु की
अमोघमाला वाली अर्थात् कभी व्यर्थ नहीं होने वाली है।
केतुमालादि लिङ्गोद्भवक्षेत्राणि —
भूर्भुवं भुवनेशं च भवोद्भवं तृतीयकम्।
अट्टहासं तत्पुरुषं केतुमालं स्वयम्भुवम् ॥ ८॥

96 अपराजितपृच्छा
(१.) भूर्भुव, (२.) भुवनेश, (३.) भवोद्भव, (४.) अट्टहास और (५.)
तत्पुरुष— ये पाँचों यक्षलिङ्ग केतुमाल में उत्पन्न हुए।
ईश्वरं शङ्करं श्रेयं श्रीकण्ठं व उग्रोहरम्।
अक्षयपञ्चलिङ्गस्य इलावर्ते समुद्भवः ॥ ९ ॥
(१.) ईश्वर, (२.) शङ्कर, (३.) श्रेय, (४.) श्रीकण्ठ और (५.) उग्रोहर— ये
पाँच अक्षय लिङ्ग इलावर्त में उत्पन्न हुए।
पुष्करं पुष्कराख्यं च शङ्कुतेजं महाबलम् ।
गोकर्णं पञ्चमं लिङ्गं पुष्कराख्येऽक्षयोद्भवम् ॥ १० ॥
(१.) पुष्कर, (२.) पुष्कराख्य, (३.) शङ्कुतेज, (४.) महाबल और (५.)
गोकर्ण— ये पाँच लिङ्ग अक्षय होकर पुष्कर नामक क्षेत्र में उत्पन्न हुए।
सद्यं शान्तं महाकान्तं विश्वतेजो महोद्भवम् ।
पञ्चाक्षयानां लिङ्गानां पौरुषे स्यात्समुद्भवः ॥ ११ ॥
(१.) सद्य, (२.) शान्त, (३.) महाकान्त, (४.) विश्वतेज, (५.) महोद्भव—
ये पाँचों लिङ्ग अक्षय पौरुष क्षेत्र में उद्भूत हुए।
शङ्कुं शशाङ्कशम्भू च सिद्धेशं चन्द्रशेखरम् ।
पञ्चाक्षयानि लिङ्गानि शङ्कुक्षेत्राधिपानि च ॥ १२ ॥
(१.) शङ्कु, (२.) शशाङ्क, (३.) शम्भू (४.) सिद्धेश और (५.)
चन्द्रशेखर— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग शङ्कु क्षेत्र में उत्पन्न हुए।
वामदेवं महादेवं कान्तं कमललोचनम् ।
अक्षयं कल्पजं लिङ्गं सागराक्षे ? त्पराजित ॥ १३ ॥
इसी प्रकार (१.) वामदेव, (२.) महादेव, (३.) कान्त कमललोचन (४.)
अक्षय और (५.) कल्पज— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग, हे अपराजित ! सागराक्ष क्षेत्र में
उत्पन्न हुए।
सद्योवामस्तथाधांरस्तत्पुरुष ईश एव च।
अक्षये वक्त्रजा देवा रम्यके सृष्टिसम्भवे ॥ १४ ॥
इसके अतिरिक्त (१.) सद्योवाम, (२.) अघोर, (३.) तत्पुरुष, (४.) ईश और
(५.) अक्षयवक्त्र— ये पाँचों अक्षय लिङ्ग रम्यक क्षेत्र में उत्पन्न हुए।
लीयन्ते सर्वदेवाश्च कल्पान्ते लिङ्गमध्यगाः ।
कल्पान्ततोऽक्षयं लिङ्गं सागरे ? क्षेत्राधिपम् ॥ १५ ॥

सूत्र-२१ 97
कल्प के अन्त में लिङ्ग के मध्य में सभी देवता प्रलय में लीन हो जाते हैं।
कल्प के अन्त होने के साथ ही सागर में अक्षय लिङ्ग उत्पन्न हो जाते हैं।
द्वीपे द्वीपे पुनस्त्वेवं रुद्रलोकलिङ्गोद्भवम्।
तेभ्यो जाता पुनः सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ 16 ॥
प्रत्येक द्वीप में पुनः इसी प्रकार रुद्रलोक के लिङ्गों का उद्भव हो जाता है
जिनसे पुनः जगत में स्थावर-जङ्गम सृष्टि की उत्पत्ति होती है।
सजलाम्भोधिसंसारे एकार्णवीभूतसंस्थितौ ।
विशीर्णानुमार्गख्यात तत्प्रवाहेन समुद्भवाः ? ॥ 17 ॥
प्रलयकाल में एकार्णवी भूत अर्थात् एक ही सागर में लीन हो चुकी समस्त सृष्टि
इस सजलाम्भोधि संसार अर्थात् जल में डूबे हुए संसार के विशीर्ण होने के साथ-साथ
ही उसके प्रवाह मार्ग से विख्यात होने वाले नए संसार की उत्पत्ति हो जाती है।
वर्षाश्रयासमुद्राश्च सृष्टिकालसमुद्भवाः ।
प्रदक्षिणं स्थितास्त्वेवं मेरोश्च परिखार्णवाः ॥ 18

98 अपराजितपृच्छा
उन्हीं से यह स्थावर-जङ्गम सृष्टि इस जगत में उत्पन्न हुई है, ऐसी ख्याती है।
उन्हीं काश्यप से इस संसार की सृष्टि करने वाली शक्ति रूपा प्रकृति भी हुई, ऐसा
विख्यात है।
दैत्यासुरी च गन्धर्वी यक्षी विद्याधरी तथा।
वैदेवी नागराजेन्द्री नरेन्द्री नाम चाष्टमी ॥ 22 ॥
उसी शक्ति से (1.) दैत्या, (2.) आसुरी, (3.) गन्धर्वी, (4.) यक्षी, (5.)
विद्याधरी, (6.) वैदेवी, (7.) नागराजेन्द्री और (8.) नरेन्द्री मातृकाएँ उत्पन्न हुईं।
दितेश्च देवाः सम्भूता असुर्य्याश्चासुरोद्भवः।
गन्धर्वाजाश्च गन्धर्वी यक्ष्या यक्षसमुद्भवः ॥ 23 ॥
इनमें से दिति से देवता उत्पन्न हुए, आसुरी से असुर हुए, गन्धर्वों से गन्धर्व
और यक्षी से यक्ष उत्पन्न हुए।
विद्याधर्यास्तदभिधाः वैदेध्याश्चैव देवताः।
विहगा नागराजेन्द्रा जाता नागेन्द्रकास्तथा ॥ 24 ॥
इसी प्रकार विद्याधरी से उत्पन्न विद्याधर नामधारी हुए। वैदेवी से देवता हुए,
नागराजेन्द्री से समस्त पक्षीगण हुए और नाग, उरग सर्पादि भी हुए।
नरेन्द्राश्च नरा विप्रक्षत्रविट्शूद्रसञ्ज्ञकाः।
षट्त्रिंशच्च₃₆ कुलान्येवं प्रकृतीनामनेकधा ॥ 25 ॥
इसी तरह नरेन्द्री से सभी नर— विप्र, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और मनुष्यों के
छत्तीस प्रकार के कुल व प्रकृति के अनुसार उनके अनेक प्रकार के प्राणी हुए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
अक्षयलिङ्गसृष्ट्युद्भवाधिकारो नामैकविंशं सूत्रम् ॥ 21 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में अक्षय
लिङ्ग सृष्टि, उद्भव अधिकार नामक इक्कीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 21 ॥
पञ्चलिङ्गोद्भवकाश्यपसृष्ट्युद्भवो नाम द्वाविंश सूत्रम् ॥ 22 ॥
अपराजित उवाच -
कथं लिङ्गभवा सृष्टिः समस्ता सचराचरा।
कथं ब्रह्मोद्भवा चैव कथयस्व प्रसादतः ॥ 1 ॥
ब्रह्माद्यप्रभवाः के चाक्षयलिङ्गोद्भवाश्च के।
के च ज्योतिर्भवाश्चैव कथयस्व प्रसादतः ॥ 2 ॥

सूत्र-२२ ९९
अपराजित बोले – हे प्रभु! यह सचराचर सृष्टि किस प्रकार लिङ्ग से उत्पन्न
हुई और किस प्रकार ये सब ब्रह्मा से उत्पन्न हुए, कृपा करके कहिए। ब्रह्मा से
आरम्भ होने वाले कौन हैं, अक्षय लिङ्ग से उत्पन्न होने वाले कौन हैं और ज्योति से
उत्पन्न होने वाले कौन हैं, इस सब को कृपाकर कहिए।
विश्वकर्मोवाच –
एकादशकोटिरुद्रा भैरवाश्चाष्टकोटयः।
योगिन्यो द्विरद कोटयो लिङ्गेभ्यश्च समुत्थिताः ॥ ३ ॥
खेचरी भूचरी विद्या स्तम्भिनी मोहिनी तथा।
विद्वेषिणी त्रोटिनी च एता लिङ्गसमुद्भवाः ॥ ४॥
विश्वकर्मा कहने लगे – हे पुत्र! अक्षयलिङ्ग से 11 करोड़ रुद्र, 8 करोड़ भैरव
और 64 करोड़ योगिनियाँ उत्पन्न हुईं। इसी प्रकार खेचरी (आकाशगामी), भूचरी
(भूगामी), स्तम्भिनी (स्तम्भन करने वाली), मोहिनी (मोहित करने वाली),
विद्वेषिणी (वैरोत्पन्न करने वाली), त्रोटिनी (टोनाहिन) — सभी विद्याएँ अक्षयलिङ्ग
से उत्पन्न हुई हैं।
अणिमा लघिमा ख्याता महिमा सहजा तथा।
अष्टासिद्ध्युद्भवा विद्याक्षयलिङ्गसमुद्भवा ॥ ५॥
इसी प्रकार अणिमा, लघिमा, महिमा, सहजा आदि अष्ट सिद्धियों¹ से उत्पन्न
होने वाली प्रसिद्ध विद्याएँ भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुईं।
मन्त्रमुद्राः समस्ताश्च योगिनोयोगनिर्मलाः।
अर्चा पूजा प्रतिष्ठाश्च सर्वा लिङ्गसमुद्भवाः ॥ ६॥
समस्त मन्त्र मुद्राएँ और योग से निर्मल योगिनियाँ, मूर्तियाँ और उनकी पूजा
एवं प्रतिष्ठा विधि भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुई।
वेदागमपुराणानि अन्थादिदर्शनानि च।
अक्षयलिङ्गोत्पन्नानि तथान्यच्च वदामि ते ॥ ७॥
इसी प्रकार वेद, आगम, पुराण, दर्शनों के ग्रन्थादि भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न
हुए हैं। अन्य जो उत्पत्तियाँ हुई हैं उनको भी मैं कहता हूँ।
निघण्टुर्व्याकरणानि ह्यष्टौ स्थानानि वै तथा।
वेदोद्भवश्च लिङ्गेभ्यस्तथान्ये च दिवौकसः ॥ 8 ॥

  1. अष्टसिद्धि– 1. अणिमा, 2. महिमा, 3. लघिमा, 4. गरिमा, 5. प्राप्ति, 6. प्राकाम्य, 7. ईशित्व एवं 8. वशित्व। (मार्कण्डेयादि पुराण)

100 अपराजितपृच्छा
सप्तस्वरास्त्रयो ग्रामा मूर्च्छनास्त्वेकविंशतिः।
एकोनपञ्चशत्तानाः सर्वे लिङ्गसमुद्भवाः॥ 9॥
अष्टाध्यायी व्याकरण और निघण्टु-शब्दकोश तथा आठों प्रकार के वेदोद्भव के
स्थान (जटा माला शिला लेखा ध्वजो दण्डो रथो घन, अष्टोविकृतयः प्रोक्ता क्रम
पूर्वा मनीषिभिः॥ विकृतवल्ली 1, 5) भी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुए तथा समस्त
देवता भी इसी से उत्पन्न हुए। सङ्गीत के सातों स्वर, तीनों ग्राम और इक्कीस
मूर्च्छनाएँ¹ आदि तथा उनचास तानें² सभी अक्षयलिङ्ग से उत्पन्न हुईं।
सर्वाणि यानि तीर्थानि ह्युद्भवन्तीह भूतले।
तान्युत्पन्नानि लिङ्गेभ्यो वर्तन्ते सचराचरम्॥ 10॥
इस भूमितल पर जहाँ-जहाँ भी सब तीर्थ होते हैं, उनकी उत्पत्ति भी अक्षलिङ्ग
से हुई, ऐसा सचराचर में व्यवहार किया जाता है।
मन्त्रसिद्धिक्रियायोग तीर्थधर्मसत्यानृतम्।
पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च॥ 11॥
लिङ्गोद्भवानि चैतानि जगदुत्पत्तिकारणम्।
सर्वात्मलीला भूतानां लिङ्गानां लिङ्गतो भवः॥ 12॥

  1. इक्कीस प्रकार की मूर्च्छनाओं में से सात-सात प्रति ग्रामाश्रित है। इनके नाम हैं- 1. सौवारी, 2.
    हारिणीश्वा, 3. कलोपनता, 4. शुद्धमध्यमा, 5. मार्गी, 6. पौरवी और 7. ऋषका। ये सात मध्यम ग्राम की
    हैं। इसके बाद 1. उत्तरमन्द्रा, 2. रजनी, 3. उत्तरायता, 4. शुद्धषड्ज, 5. मत्स्यीकृता, 6. अश्वक्रान्ता और
  2. उद्गता- ये षड्ज ग्रामिका की कही गई है। इसी प्रकार 1. आलापा, 2. कुन्तिमा, 3. शुद्धा, 4.
    उत्तरा, 5. षड्जा, 6. पञ्चायता और 7. उद्गता। ये सात गान्धार ग्रामाश्रित कही गई है।
    (विष्णुधर्मोत्तरपुराण तृतीय खण्ड, अध्याय 18)
  3. वायुपुराण (86, 41-50) में आया है कि मध्यम ग्राम की तान संख्या 20, षड्ज ग्राम की 14 तथा
    गांधार ग्राम की 15 भी मानी गई है। इस प्रकार उनचास तानें होती हैं। विष्णुधर्मोत्तरपुराणकार की भी
    मान्यता यही है। इनके नाम किञ्चित पाठान्तर से इस प्रकार आए हैं- 1. अग्निष्टोमिक, 2. अति
    अग्निष्टोमिक, 3. वाजपेयिक, 4. पौण्डरीक, 5. आश्वमेधिक, 6. राजसूयिक, 7. बहुसुवर्णिक, 8.
    गोसविक, 9. महाव्रतिक, 10. ब्रह्मतन, 11. प्राजापत्य, 12. नागाश्रय, 13. यज्ञाश्रय, 14. गोदानिक, 15.
    हयक्रान्त, 16. अजक्रान्त, 17. विष्णुकान्त, 18. अरण्य, 19. मत्तकोकिल और 20. उज्जिविक — ये
    मध्यम ग्रामाश्रित हैं।
    चौदह तानें षड्ज ग्रामिका हैं- 1. प्रस्वापन, 2. पैशाच, 3. जीवन, 4. सावित्र, 5. अर्धसावित्र, 6.
    सर्वतोभद्र, 7. सुवर्ण, 8. विष्णु, 9. जिष्णु;, 10. विष्णुनर, 11. शारद, 12. विजय, 13. हंस और 14.
    ज्येष्ठ। इसी प्रकार गान्धार ग्रामाश्रिता पन्द्रह तानें कही गई हैं- 1. तुम्बुरुप्रिय, 2. महालक्ष्मण, 3.
    गन्धर्वानुमत, 4. अलम्बुसप्रिय, 5. नारदप्रिय, 6. भीमसेनप्रिय, 7. विनत, 8. मातङ्ग, 9. भार्गवप्रिय, 10.
    अभिराम, 11. संश्राव्य, 12. किन्नरप्रिय, 13. पुण्य, 14. मनोहर और 15. कल्याणकर। (विष्णुधर्मोत्तर.
  4. 18 गद्य भाग)

ालयस्तथा ॥ 13 ॥
Wait, look at line 7:
"एवमक्षयलिङ्गेभ्यः सर्वभूतालयस्तथा ॥ 13 ॥"
Is the number "13" in Devanagari or Arabic?
Look at: "॥ 13 ॥"
It is Arabic numerals: "13"!
Wait, let's check all the shloka numbers:
Line 7: ॥ 13 ॥
Line 11: ॥ 14 ॥
Line 13: ॥ 15 ॥
Line 15: ॥ 16 ॥
Line 17: ॥ 17 ॥
Line 25: ॥ 18 ॥
Line 27: ॥ 19 ॥
All shloka numbers are in Arabic numerals: 13, 14, 15, 16, 17, 18, 19!
Wait, look at the page number at the top right: "101" (Arabic).
Top left: "सूत्र-२२" (Devanagari numerals).

Line :
इस संसार की सृष्टि में उत्पन्न सभी द्वीप, क्षेत्र, जो सभी जीवों, प्राणियों के

Line :
लिए रहने के स्थान बने हुए हैं, वे सब भी अक्षयलिङ्ग से ही उत्पन्न हुए हैं।

Line :
शेषोद्भवस्तथा पुत्र जीवा वै काश्यपादयः ।
Wait, look at

सूत्र-२३ 103
है। ऐसे विष्णु के जन्म रहस्य के बारे में तुम सुनो जो महाआनन्द देने वाला है।
पठन पर यह दशावतार का उत्पत्ति प्रसङ्ग पापों का नाश करने वाला है, उस
वैष्णव-स्वरूप के प्रादुर्भाव को मैं कहता हूँ जिसको भक्ति और प्रयत्न पूर्वक पढ़ने
वाला व्यक्ति परमगति को प्राप्त कर लेता है।
दशावतारनामानि —
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः ।
रामो रामश्च कृष्णश्च बुद्धः कल्की च ते दश ॥ 6 ॥
विष्णु के दस अवतार हैं— (1.) मत्स्य, (2.) कूर्म, (3.) वराह, (4.)
नरसिंह, (5.) वामन, (6.) परशुराम, (7.) दाशरथीराम, (8.) श्रीकृष्णचन्द्र,
(9.) बुध एवं (10.) कल्कि।
तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे।
चन्द्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते ॥ 7 ॥
एवं जाते तदा काले ध्यानयुक्तः पितामहः।
सम्भूतो दानवः शङ्खो हृतवान् वेदमर्णवे ॥ 8 ॥
(पूर्वकाल की बात है जब सर्वत्र जल ही था) उस एकार्णव स्थिति में समस्त
स्थावर-जङ्गम सृष्टि नष्ट हो गई थी। चन्द्र-सूर्य, पवन भी नष्ट हो गए और ज्योतिष
या समस्त् तारागण भी प्रलय में तिरोहित थे। जब सब कुछ इस स्थिति में नष्टभूत
थे, पितामह ब्रह्माजी ध्यानस्थ थे। तब शङ्ख नामक दानव उत्पन्न हुआ जो वेदों को
चुराकर उस महासागर में डूबो देने को आतुर था।
गतश्च विष्णुपाश्र्वे च क्षीराब्धौ च पितामहः।
महासुरोऽनन्तरूपो वेदान् हृत्वा गतोऽर्णवे ॥ 9 ॥
वह शङ्ख दानव क्षीरसागर में अनन्त नाग की शय्या पर शयन किए भगवान्
विष्णु और उनके नाभिकमल से उत्पन्न, ध्यानस्थ पितामह के पास गया और वह
महा असुर अनन्त का रूप धरकर चारों ही वेदों को चुराकर महासागर में ले गया।
अवतीर्णकालावधिमाह —
कृतेऽष्टलक्षसहस्रशताब्देषु गतेषु च।
शताब्दान्ते यथा ख्याते माघे कृष्णप्रतिपदि ॥ 10 ॥
' पुष्यान्ते च मुहूर्ते च मनुर्नाम शुभप्रदः।
महामीनो भविष्यामि सहस्रयोजनायतः ॥ 11 ॥

104 अपराजितपृच्छा
( भगवान् विष्णु की प्रतिज्ञा है कि उक्त स्थिति में) कृत अर्थात् सत्ययुग के
आठ लाख एक हजार ( 80, 1000) वर्ष बीतने पर शताब्दी के अन्त में विख्यात
माघ माह के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को पुष्य नक्षत्र के अन्तिम चरण में, शुभ मुहूर्त
में मनुगणों को शुभफल देने वाले महामीन, एक हजार योजन के आकार वाले
मत्स्यावतार के रूप में अवतरित होता हूँ।
घनवन्नीलवर्णश्च रताक्षश्च महोत्कटः।
भृकुटिस्फुरदशनः कृत्वा कोपं जनार्दनः ॥ 12 ॥
क्रीडन्तमब्धिमध्यस्थं निहितां च कूपकर्तरि।
स्यात्कलित लग्नाम्बु पद्म पुष्पोद्भवमालिका ? ॥ 13 ॥
उक्त महा मत्स्यावतार का गहरे नील वर्ण के बादलों के समान नीला वर्ण और
महोत्कट- महाभयानक लाल-लाल आँखें, भृकुटि क्रोध से चढ़ी हुईं और दांत
कटकटाते हुए भगवान् जनार्दन प्रकट हुए जो उस महासागर के जल के बीच में
पुष्पों के बीच कलिका की भाँति क्रीड़ा करते दिखाई दिए।
मत्स्यपुच्छाच्च निहतस्तदा चोच्छलिता छटा।
छोद्ग्र धाराकुलोत्तरं भग्नं सुरा कुलावर्तपद्म ? ॥ 14 ॥
स्थललता फेनवर्णा ग्रन्थावर्णतकम् दोद्धव ? ।
यथा अग्र कुलावर्त भङ्गात् पुरतो वनमालिका ! ॥ 15 ॥
हतो महासुरः शङ्खो हृतैर्वेदैस्ततस्तदा।
आसनं कृतमुत्सङ्गे ब्रहाणश्चैव नन्दतः ॥ 16 ॥
उन मत्स्य के पूँछ के झपटों से महासागर की जलराशि के उछाल की छटा
अद्भुत थी, वे विराट ऊर्मियाँ बारम्बार तटों को स्पर्श करने के लिए उमड़ती थीं।
सागर के स्थल पर चारों ओर फेन स्वरूपी बड़े-बड़े आवर्तक लहरों के उठे मानो
अग्नि के झंझावाती कुलावर्तों, भँवरों से वनमालिका पूरी तरह भङ्ग हो गई हो। इस
संघर्ष में शङ्खासुर मारा गया। तब उसके द्वारा चुराए गए वेद भी वे मत्स्यरूप
भगवान् अपनी गोद में भली प्रकार रखकर लाए जिससे ब्रह्मा को भी बहुत आनन्द
हुआ।
पटहाद्या अवाद्यन्त वेदे प्राप्तेऽनु पञ्चमम्।
महोत्सवे ब्रह्मलोके विष्णुलोके तथैव च ॥ 17 ॥
धर्मः प्रस्थापितो लोके सत्यं ज्ञानं च भूतले।
लक्ष्म्यायुष्का नराश्चैवमक्लेशा दृढयौवनाः ॥ 18 ॥

सूत्र-२३ 105
वेदों के प्राप्त हो जाने के हर्ष में पटहा आदि पाँचों प्रकार के वाद्यों का वादन
कर ब्रह्मलोक व विष्णुलोक में महोत्सव मनाया गया। इस प्रकार शङ्खासुर के वध
के उपरान्त पुनः लोक में धर्म की स्थापना हुई और भूतल पर सत्य व ज्ञान का
विस्तार हुआ। इसके फल स्वरूप नर-नारी क्लेश रहित होकर दृढ़ यौवनयुक्त हुए
और लाखों वर्षों की आयु प्राप्त करने में सक्षम हुए।
एकच्छत्रं नृपो राज्यं प्राप्तवान् वेदसङ्गतौ।
चक्रवर्तित्व विज्ञेयो शिवभटं सुदर्शनम् ? ॥ 19 ॥
देवाग्निगुरुपूजा च सतीसत्यं तथोत्तमम्।
अग्राहां च प्रजादण्डं अद्वास्यता कृषि वेश्मता ? ॥ 20 ॥
इस समस्त पृथ्वी पर वेद सङ्गत अर्थात् वेदों में दिए गए आदेशों का पालन
करने वाला एकछत्र चक्रवर्ती राजा का राज्य प्राप्त हुआ। उस चक्रवर्तित्व को पाने
वाला लोकप्रिय सुदर्शन राजा शिवभट नाम से जाना गया। इस राजा के राज्य में
देवपूजा, हवनादिक अग्निपूजा और गुरुपूजा तथा सर्वोत्तम सतियों का सत्य अर्थात्
पातिव्रत्य पूरी तरह से व्याप्त था फलस्वरूप प्रजा धर्मानुसार चलने के कारण दण्ड
प्राप्ति के लिए अग्राह्य हो गई अर्थात् तब दण्ड का प्रचलन नहीं था। सभी नागरिक
स्वतन्त्रता से जीवन यापन करते थे। कोई भी व्यक्ति खेती के लिए अथवा गृहादि
के लिए दास बनाकर नहीं रखा जाता था।
न शोकदुःखदुर्भिक्षं न चौराश्चाभवंस्तदा।
धर्मेण पालयन्धात्रीमाज्ञां चक्रे च मेदिनी ॥ 21 ॥
ईप्सितोदकं च मेघात् सर्वसस्या च मेदिनी।
लक्षात्परेऽनल्पधना अतिरूपा नराः स्त्रियः ॥ 22 ॥
उस काल में कोई शोक, दुःख, दुर्भिक्ष नहीं था तथा चोरों का भी कोई भय
नहीं था। तब पृथ्वी का धर्म से पालन होता था और उस राजा की आज्ञा समस्त
संसार में मानी जाती थी। इसी प्रकार के खुशहाल में मेघ भी आवश्यकतानुसार
वर्षा करते थे और सारी धरती पर सभी प्रकार के धान्य उत्पन्न होते थे। फलतः यहाँ
के नर-नारी अत्यन्त रूपवान और स्वस्थ होते थे और लखपति होते थे, अनल्पधनी
होते थे अर्थात् बहुत समृद्ध होते थे।
कामिन्य ऋतुगम्याश्च ह्यायुष्काः कान्तिभिर्युताः।
लोकाः शास्त्रविशेषज्ञ अग्निहोत्रं गृहेगृहे ॥ 23 ॥
त्रिदशतिथिपूजा च नित्यमेव प्रतिगृहम्।

106 अपराजितपृच्छा
न विषं नैव दुःस्थानं गृहे तु धनधान्यकम् ॥ २४ ॥
उस राज्य की कामिनियाँ अर्थात् ऋतुमति नारियाँ ऋतुकाल में ही सहवास
करने वाली होने के कारण कान्तियुक्त, सौन्दर्य व तेजयुक्त तथा पूरी आयु तक
जीवित रहने वाली होती थी। वहाँ के निवासी लोक और शास्त्रों के विशेषज्ञ होते थे
और घर-घर अग्निहोत्र का प्रचलन था। प्रत्येक घर में देवता और अतिथि की नित्य
पूजा अवश्य ही होती थी। कहीं भी विष का प्रयोग (नशा) नहीं होता था। इसलिए
घरों में खटपट का दुःख भी नहीं था। सभी घर धन-धान्य से परिपूर्ण होते थे।
भुञ्जन्ते काञ्चने पात्रे उदते नास्ति गृह्लता ? ।
सन्तुष्टाः सर्वलोकास्तु धनधान्यैश्च काञ्चनैः ॥ २५ ॥
ईप्सितं तु गवां क्षीरं क्षीरे सर्पिस्तथाधिकम्।
इच्छारसश्चेक्षुदण्डे शीधुपानं घटैस्तथा ॥ २६ ॥
उस समय लोग स्वर्णपात्रों में भोजन करते थे और दान देने वालों से भी दान
लेने वाले कोई नहीं थे क्योंकि सभी सम्पन्न थे। कोई किसी के आगे हाथ नहीं
फैलाता था। सभी लोग धन-धान्य और स्वर्णादिक से पूर्णतया सन्तुष्ट थे। ऐसे ही
धर्म सम्पन्न राज्य में गायें मनचाहा दूध देती थीं और उस दूध में घी भी बहुत होता
था। ईखों में पर्याप्त रस होता था, जो इतना मीठा होता था मानो घड़ों में भरा हुआ
गन्ने का रस नहीं होकर अमृत हो।
त्रिलक्षाब्दं मीनरूपो विष्णुः पर्यैति सागरन्।
पुनर्जन्म करिष्यामि उद्धरिष्येऽमृतं यतः ॥ २७ ॥
इस प्रकार यह मत्स्यावतार रूपी विष्णु आगामी तीन लाख वर्षों तक सागर में
समस्त दिशाओं में तैरते रहे। उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की थी कि 'मैं पुनर्जन्म
लूँगा और उसमें अमृत घट का उद्धार करूँगा।'
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां प्रथमहरि-
मत्स्यावताराधिकारो नाम त्रयोविंशं सूत्रम् ॥ २३ ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में प्रथम
हरि-मत्स्यावतार अधिकार नामक तेईसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥

सूत्र-२४ 107
कूर्मावतारे मन्दरार्णवमन्थनं चतुर्विशं सूत्रम् ॥ 24 ॥
विश्वकर्मोवाच-
कल्पान्ते रत्नजातं यद् श्रीधेनुरमृतादिकम्।
अन्योपस्करजातानि क्षीराब्धौ स्थापितानि तु ॥ 1 ॥
याचमानाः समस्तास्तु सुरासुरनरोरगाः।
ददस्व भो विभो सर्वं स्थापितं विष्णुना च यत् ॥ 2 ॥
विश्वकर्मा ने (विष्णु के अवतारों के प्रसङ्ग में अपराजित से आगे) कहा-कल्प
का अन्त होने पर जिस भाँति से रत्नों की प्राप्ति हुई, जैसे कि श्री, सुरभि, अमृत, आदि
और अन्य भी काम की वस्तुएँ प्राप्त हुईं, जो क्षीरसागर में स्थित थी, इन सब रत्न
राशियों को समस्त सुर, असुर, नर और उरगों ने प्रमुख माँग बना ली थी। इसलिए ये
सभी मिलकर भगवान् विष्णु के पास गए और उनसे प्रार्थना करने लगे कि हे प्रभो!
सागर में स्थित समस्त वैभव की वस्तओं को, रत्नों को हमें दिलाने की व्यवस्था करें।
इन्द्र उवाच -
काष्ठे चाग्निस्तिले तैलं क्षीरमध्ये यथा घृतम्।
उद्धरिष्यामि तान् सर्वान् क्षीराब्धित विष्णुना च यत् ॥ 3 ॥
इन्द्र ने (देवों की ओर से विष्णु से) कहा- हे प्रभु! जिस प्रकार काष्ठ में
अग्नि छिपी हुई है और तिल में तेल छिपा हुआ है तथा दूध में घी छिपा है, उसी
तरह समुद्र के गर्भ में भी समस्त उपस्कर अर्थात् जीवनोपयोगी वस्तुएँ छिपी हुई है,
उन सबको मैं उद्धार करके निकालना चाहता हूँ।
चक्रुस्ते मन्थनारम्भं सुरासुरनरोरगाः।
मन्थानं मन्दरं कृत्वा नेत्रं कृत्वाऽथ वासुकिम् ॥ 4 ॥¹
इसी प्रयोजन से समस्त सुर-असुर, नर-उरगों ने मिलकर समुद्र का मन्थन
करना आरम्भ किया। इस कार्य के लिए इन सब लोगों ने मन्दराचल पर्वत का
मन्थान अर्थात् रवाई या मथनी बनाई और वासुकी नाग को उसे घूमाने के लिए नेत्र
(नेतरा, रस्सी) के रूप में काम में लिया।
उद्धरिष्यति कस्तत्र क्षीरार्णवे तु मन्दरम्।
गतास्ते विष्णुपाश्र्वे तु सुरासुरनरोरगाः ॥ 5 ॥

  1. तुलनीय विष्णुपुराणे— चकर्ष नागराजानं दैत्यमध्येऽपरेण च॥ (विष्णु. 1, 9, 89) मन्थानं मन्दरं कृत्वा
    नेत्रं कृत्वा च वासुकिम्॥ (तत्रैव 1, 9, 77 व 84)

108 अपराजितपृच्छा
तदोपरान्त ये सभी सुर, असुर, नर और उरगगण यह जानने के लिए भगवान्
विष्णु के पास गए कि क्या वे वहाँ इस क्षीरसागर से मन्दर के प्रयोग द्वारा उन
समस्त उपस्करों को, रत्नों को जो क्षीरसागर में स्थित है, उद्धरित करने, निकालने में
समर्थ हो सकेंगे ?
कूर्मावतारमासतिथ्यादीनां -
चतुर्लक्षसहस्त्रादि शतान्ताब्दे कृते गते ।
फाल्गुने कृष्णपक्षे च द्वितीयायां तिथौ तथा ॥ 6 ॥
मुहूर्ते कार्मुके चैव हस्तान्ते घटिकाद्वयम् ।
कूर्मावतारो मेदिन्यां मुहूर्ते तत्र चाभवत् ॥ 7 ॥
इस सबके उद्धार के लिए सत्युगके चार लाख, एक हजार एक सौ वर्ष बीत
जाने पर, फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की द्वितीया तिथि के दिन, हस्त नक्षत्र के
अन्तिम चरण में, दो घटी के बीत जाने पर कार्मुक मुहूर्त में इस मेदिनी पर
(भगवान् विष्णु का) कूर्मावतार हुआ।
तले तु कूर्मरूपेण हेमकूटनिभं गिरिम्।
मन्दरं धारयिष्यामि ह्यमृतार्थेऽपराजित ॥ 8 ॥
इस पर विष्णु भगवान् ने कहा कि 'मैं कूर्म रूप में सागर के तल में रहकर
स्वर्ण के स्तम्भ के समान बने हुए इस मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर धारण
करूँगा जिससे मेरा अमृतोद्धार का प्रयोजन सिद्ध हो सके।'
पीतवर्णो महादिव्यो दृश्यतेऽथानुवर्तुलम् ।
हारिद्रकश्वेतपादैर्ज्योतिर्दृष्टोऽथ निर्मलैः ? ॥ 9 ॥
शैलेन्द्रस्योत्तरे पार्श्वे क्षीरोदो नाम सागरः ।
प्रारब्धं मन्थनं तत्र सुरासुरनरोरगैः ॥ 10 ॥
मन्दरं मन्थनं कृत्वा नेत्रं कृत्वा तु वासुकिम् ।
एकतश्च सुराः सर्वे बलिमेकत्र संस्थिताः ॥ 11 ॥
पीले रङ्ग, महादिव्य वर्तुल की भाँति दिखाई देने वाला हल्दी जैसा, श्वेतपाद
वाला निर्मल ज्योति वाले मन्दराचल नामक शैलेन्द्र के उत्तरी पार्श्व में यह क्षीरोद
नामक क्षीरसागर था जिसे वहाँ सुर, असुर, नर और उरगों ने मथना प्रारम्भ किया।
मन्दराचल को मथनी करके और वासुकी नाग को नेत्र बनाकर एक ओर तो सभी
देवता एकत्र हो गए और दूसरी ओर बलि आदि असुरगण एकत्र होकर स्थित हो
गए थे।

सूत्र-२४ 109
क्षीरार्णवात् निर्गतरत्नद्रव्यादीनां –
क्षीरार्णवे मध्यमाने सफेनोर्मिमहोत्कटे।
समुद्भूतानि रत्नानि गुणतेजोमयानि च ॥ 12 ॥
मौक्तिकं वज्रवैडूर्ये पद्मरागश्च नीलकम्।
हिरण्याद्यष्टलोहानि मध्यमाने तदुद्भवः ॥ 13 ॥
इस प्रकार दोनों ही ओर से सुरों और असुरों के प्रयास से क्षीरार्णव के मध्य में
मन्दराचल के द्वारा मन्थन से फेनयुक्त ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगी। मन्थन के
फलस्वरूप गुण और तेजों से युक्त रत्न निकलने लगे। उन रत्नों में मोती, हीरे, वैदूर्य,
पद्मराग, नीलम, सोना आदि अष्टलोह धातुएँ समुद्र के बीच से निकलीं।
तदोद्भूता कामधेनुर्घृतदध्युद्भवस्ततः।
क्षीरं च गोमयं मूत्रं पञ्चगव्यं प्रकीर्तितम् ॥ 14 ॥
सर्वसृष्ट्युद्भवा धेनुः सर्वकामफलप्रदा।
सर्वकाममवाप्नोति कामधेनुनमस्कृतिः ॥ 15 ॥
उसी समुद्र मन्थन से कामधेनु निष्पन्न हुई जिससे घी, दही, दूध, गोमय, गोमूत्र
निकले जो पञ्चगव्य नाम से जाने जाते हैं। यह कामधेनु सभी कामनाओं को पूर्ण
करने वाली है इसलिए समस्त कामों को पूर्ण करने वाली कामधेनु नमस्कृत्य है।
ऐरावतो गजेन्द्राणां चन्द्रश्चाप्सरसस्तथा।
उच्चैःश्रवास्तुरङ्गाणां सूर्यादीनां च वाहनम् ॥ 16 ॥
इसके उपरान्त, समुद्र मन्थन से जो अन्य अन्य रत्न निकले वे हैं— गजेन्द्रों में
ऐरावत हाथी, चन्द्रमा, अप्सराएँ और उच्चैःश्रवा नामक अश्व जो सूर्यादि देवताओं के
वाहन बने।
अमृतानां सप्तकुम्भा अमृतत्वं च दायिनः।
समस्थाली च पात्राणं तलिकातां वा (वो) लुकोद्भवाः ? ॥ 17 ॥
पर्यङ्कमासनं चैव तथा सिंहासनानि च।
छत्रचामरालङ्कारा धूपामोद आरार्त्तिकम् ॥ 18 ॥
सिंहासनरुद्रासनवेत्रासनमसूरकम्।
गदिका पट्टपं गिट्टि प्रोक्तान्यासनकानि च ॥ 19 ॥
षोडशाभरणं दिव्यं पदादि मुकुटान्तकम्।
षट्त्रिंशच्चैव ₃₆ शस्त्राणां निर्गतानि क्षीरार्णवात् ॥ 20 ॥

110 अपराजितपृच्छा
इसी प्रकार अमरता देने वाले अमृत से भरे सात अमृतकुम्भ प्राप्त हुए। पकाने
के लिए स्थाली- वटलोई आदि पात्र और ताम्बे की करधनी- कमरपेटी,
कमरबन्ध, पर्यङ्क, आसन, सिंहासनादि, छत्र, चामर सहित अलङ्कार और आरती में
प्रयुक्त होने वाले धूप-गन्धादि, सिंहासन, रुद्रासन, बेंत का आसन, मसूरक अर्थात्
मसहरी या मच्छरदानी, गदला, पट्ट अर्थात् रेशम के महीन वस्त्र, गिट्टी आदि के
अनेक आसन, सोलह प्रकार के दिव्य आभूषण जो कि पैर से सिर तक धारण करने
योग्य थे और छत्तीस प्रकार के आयुध भी उस समुद्र से निर्गत हुए।
कवचानि च रत्नानि बलीवर्दोत्सवास्तथा।
पुष्पकादिविमानानि श्रीवत्सस्वस्तिकानि च ॥ 21 ॥
क्षीरार्णवे मध्यमाने निमज्जद्भिः सुरासुरैः ।
तत्रोत्पन्नो महावृक्षो नाम्नासुरतरुस्तथा ॥ 22 ॥
इसी प्रकार कवच¹, अन्य रत्न, बैलों से होने वाले समस्त उत्सव, पुष्पकादि
विमान, श्रीवत्स, स्वस्तिकादि प्राप्त हुए। इसी क्षीरसागर का सुर व असुरगणों द्वारा
मन्थन किए जाने पर इसके बीच निमज्जित हुआ सुरतरु नाम का महावृक्ष उत्पन्न
हुआ अर्थात् कल्पवृक्ष प्राप्त हुआ।
अथ कल्पवृक्षवर्णनमाह —
नानापुष्पसमाकीर्णो नानापत्रसमाकुलः ।
नानाफलसमायुक्तो पञ्चशाखासमन्वितः ॥ 23 ॥
पुण्यानि तस्य पत्राणि दृष्ट्वा तीर्थमहाफलम्।
तस्यानुक्रमरूपं च जातिभेदं च लक्षणम् ॥ 23-1 ॥
देशजातिकुलस्थानं वर्णभेदमतः परम्।
शाखानुक्रमयुक्ती च कथयामि समासतः ॥ 23-2 ॥
उक्त कल्पवृक्ष तरह-तरह के पुष्पों से लदा हुआ था और नाना प्रकार के पत्तों
से पूरी तरह लकदक था। तरह-तरह के फल इसकी पाँचों शाखाओं में लगे हुए
थे। इस कल्पवृक्ष के दर्शन करने मात्र से सभी तीर्थों की यात्रा का महापुण्य फल

  1. कौटिलीय अर्थशास्त्र में पाँच प्रकार के कवचों का वर्णन हुआ है— लोहजाल (सिर से पाँव तक ढँकने
    वाला), लोहजालिका (सिर के अतिरिक्त शेष समस्त देह को ढँकने वाला), लोहपट्ट (भुजाओं को
    छोड़कर समस्त शरीर को ढँकने वाला), लोहकवच (केवल वक्ष व पीठ को ढँकने वाला),
    सूत्रकण्टक (सूत का कवच) और पँचचर्मवर्म (मत्स्य, गेंडा, नीलगाय, गज एवं वृषभ के चर्म, खुर व
    शृङ्ग से निर्मित कवच)। (अर्थशास्त्र अधिकरण 2, 34, 18)

सूत्र-२४ 111
मिल जाता है। उनका क्रमवार रूप, जाति भेद और लक्षण, इनके देश, जाति,
कुल-स्थान, वर्णभेद और इसके बाद शाखा अनुक्रम से मैं संक्षेप से कहता हूँ।
नागरं द्राविडं चैव कालिङ्गं यामुनं तथा।
निश्वेश्वरं समाख्यातं पञ्चपत्रसमुद्भवम् ॥ २३-३ ॥
नागरा चोत्तरा शाखा द्राविडा दक्षिणोद्भवा।
कालिङ्गा पश्चिमा शाखा यामुना पूर्वदिग्भवा ॥ २४ ॥
विश्वेशा ऊर्ध्वशाखायां एञ्जातिमहोत्सवाः।
एकैकं पञ्चभेदाश्च₅ कथयाम्यपराजित ॥ २५ ॥
इसके पाँच पत्र भी उत्पन्न हुए जिनके 1. नागर, 2. द्राविड़, 3. कलिङ्ग, 4.
यामुन और 5. विश्वेश्वर आदि पाँच नाम विख्यात है। इनमें नागर उत्तरी शाखा के हैं
और द्राविड़ दक्षिणी शाखा से उत्पन्न हुए हैं। कलिङ्ग पश्चिम शाखा से और यामुन
पूर्वी शाखा से उत्पन्न हुए हैं। विश्वेशा ऊर्ध्वशाखा से उद्भूत हुए। ये पाँचों जाति
महोत्सवा रूप में मान्य हैं। इनके भी पाँच-पाँच भेद हैं जिन्हें हे अपराजित ! मैं अब
कहता हूँ।
प₅ जातिर्दश₁₀ भेदास्तथा षोडश₁₆ वै कलाः।
मासपत्रं चतुर्जातमर्बुदादिसमुद्भवम् ॥ २६ ॥
जलजं स्थलजं पत्रं मेघजं गिरिकोद्भवम्।
जीवपत्रं निभाकारं भेदभिन्नं व्यवस्थितम् ॥ २७ ॥
इनकी पाँच जातियाँ हैं जिनके दस भेद हैं और उनकी सोलह-सोलह कलाएँ
हैं ओर इनके हर मास चारों से उत्पन्न होने वाले अर्बुदादि (अरबों की) संख्या में
हैं। जल से उत्पन्न होने वाले, स्थल से उत्पन्न होने वाले, बादलों से उत्पन्न होने
वाले, पहाड़ों में उत्पन्न होने वाले जीवपत्रों के समान भिन्न-भिन्न रूपों में व्यवस्थित
हैं।
सर्वाभरणसंस्थानं हारकेयूरकादिकम्।
स्तम्भे द्वारे गृहे शुद्धं प्रासादेषु च सर्वतः ॥ २८ ॥
× × × × × × × × × × × × ॥ २९ ॥
इस कल्पवृक्ष के द्वारा उत्पन्न होने वाले सभी आभूषणों के संस्थान में हार-
केयूर आदि हैं। सर्वतः स्तम्भ, द्वार, गृह सभी शुद्ध प्रासादों के उपयुक्त हैं। ××××।
यत्र तद् दृश्यते पत्रं स्त्रियस्तत्र हितेक्षणाः।
तत्रोत्पन्नं तु कलशमष्टामङ्गल्यसम्भवम् ॥ ३० ॥

112 अपराजितपृच्छा
जहाँ-जहाँ ये पत्र दिखाई देते हैं, वहाँ-वहाँ मनोहारी दृष्टि युक्त स्त्रियाँ उत्पन्न
हो जाती हैं और उनसे अष्ट माङ्गल्य प्रदान करने वाले कलश उत्पन्न हो जाते हैं।
संछन्नं फलपुष्पैश्च पत्रैश्च वलयीकृतम्।
अभिषेके पट्टबन्धे प्रतिष्ठोद्वहनादिषु ॥ 31 ॥
प्रासादे राजभवने कलशं विनिवेदयेत्।
षोडशाभरणैर्युक्ता लक्ष्मीस्तत्र विनिर्गता ॥ 32 ॥
द्वादशादित्यसङ्काशास्त्रैलोक्यम(पि )णिदीपिका।
¹( यस्य प्राप्ये न दारिद्र्यं सा देवी प्रकीर्तिता ॥ 33 ॥ )
(वे कलश) फल और पुष्पों से आच्छादित और उनके चारों ओर वलयाकार
में पत्र से निर्मित सजावट लिए होते हैं, जो अभिषेक के अवसर पर, पट्टबन्ध के
अवसर पर और प्रतिष्ठा के लिए कलशों में विवाह व गङ्गोज यात्रा आदि में,
प्रासादों और राजप्रासादों में इन गङ्गाजल के कलशों को आदरपूर्वक स्थपित करें।
उन पर से षोडशाभरणों से युक्त महालक्ष्मी वहाँ आ जाती है। जो बारह्रों आदित्यों
के समान जाज्वल्यमान प्रकाश को प्रसारित करने वाली, तीनों लोकों को आलोकित
करने वाली मणिदीप की भाँति शोभायमान होती है और जिसके प्राप्त होने पर
दारिद्र्य नहीं रहता जो ऐसी देवी के रूप में प्रसिद्ध है।
अमृतं सर्वदेवेषु ह्यैरावतः सुराधिपे।
अश्वश्च भास्करे देवेऽपस्करः सर्वतः समः ॥ 34 ॥
(मन्थन के उपरान्त) सभी देवताओं को अमृत दिया गया और इन्द्र को ऐरावत
तथा सूर्य को (उच्चैःश्रवा अश्व) दिया गया। ये वस्तुएँ सभी को समान रूप से दी गई।
पुनर्मन्थनात् अलक्ष्मीनिर्गतं —
पुनश्च मन्थनं कृत्वा अलक्ष्मीस्तत्र निर्गता।
समुपेता पञ्चगुणैर्दत्ता ऽ या तु पितामहे ॥ 35 ॥
अतिक्षुधा च दीनत्वं याचनं भ्रमणं तथा।
अलक्ष्म्याः पञ्चमुद्राश्च करपात्रं च यष्टिकम् ॥ 36 ॥
(जब देवासुरों ने) पुनः क्षीरसागर का मन्थन किया तो अलक्ष्मी सागर से
निकली जिसको पितामह ने एक साथ पाँच गुण दिए। अतिक्षुधा, दीन-मलीन,
याचना के लिए भटकाव और भिक्षापात्र तथा यष्टि— ये पाँचों मुद्राएँ अलक्ष्मी को

  1. प्रकाशित पाठे न लभ्यते।