अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवज्र, विद्युत्पात होने लगते हैं। वर्ष के अन्त में भूकम्प होते हैं। कभी-कभी वर्ष के
आधे में भी रह-रहकर भूकम्प पुनः होते हैं। दिन-रात धूल की वृष्टि होती है।
यमदंष्ट्रासमं रौद्रं भूतलं च प्रदृश्यते।
आन्ध्यं घोरं भवेन्मेघैः सर्पवृष्टिः प्रजायते ॥ 18 ॥
·स्वर्गतः पतति त्वेवं पुरुषो विकृताननः।
सर्वेशे सौरसम्भ्रूया मनुजा वीरविक्रमाः ? ॥ 19 ॥
चारों ही ओर यम के दाढ़ों वाले रौद्र रूप भूतल पर दिखाई देने लगते हैं। घोर
आँधियाँ चलती हैं और मेघों से सर्पों की वर्षा होती है। स्वर्ग से ऐसे-ऐसे विकृत
मुँहों वाले लोग गिरते हैं जो सभी वीर विक्रम मनुष्य सौर सम्भूया अर्थात् उग्र
प्रकृति लिए होते हैं।
यक्ष किन्नरगन्धर्वाः पिशाचोरगराक्षसाः।
सर्वे ते प्रलयं यान्ति कल्पान्ते च समुत्थिते ॥ 20 ॥
पर्वताः सागरा द्वीपाः सरितः सागरादिकम्।
भक्षन्ति सर्वभूतानि कालाग्निश्च यमो यथा ॥ 21 ॥
कल्पान्त के होने पर यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, पिशाच, उरग, राक्षस आदि सभी
प्रलय में समाप्त हो जाते हैं। पर्वत, सागर, द्वीप, नदियाँ, सागरादि सब लोगों को ऐसे
ही खा जाते हैं जैसे कालाग्नि में यम सब का भक्षण कर लेता है।
चतुर्दशमन्वन्ते च दिने प्राप्ते यथा ध्रुवम्।
रजन्यन्ते च सम्प्राप्ते ह्युदिते सूर्यमण्डले ॥ 22 ॥
बिम्बमध्यसमास्त्वेवं पुरुषाननसंनिभाः।
विकृताननरूपाश्च दंष्ट्रायुक्ताः करालिनः ॥ 23 ॥
चौदह मनुओं के अन्त में पुनः दिन यथा ध्रुवं- सदा की भाँति होने लगते हैं
जैसे रजनी-रात्रि के अन्त होने पर सूर्य मण्डल का उदय होता है और सूर्य मण्डल
के समस्त बिम्बों में कराल दांत किटकिटाते हुए विकृत, खूँखार मुँह वाले मनुष्यों
के मुखों के समान दिखाई पड़ते हैं।
द्वौ सूर्यौ पूर्वदिग्भागे द्वो च दक्षिणदिक्स्थितौ।
सूर्यद्वयं पश्चिमे चोत्तरे सूर्यद्वयोदयः ॥ 24 ॥
द्वौ सूर्यौ नागलोकस्थौ द्वौ सूर्याबुपरि स्थितौ।
इत्थं ते द्वादशादित्याः कल्पान्ते सर्वतो दिशम् ॥ 25 ॥
दहन्ति पृथिवीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम्।