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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 535 में से

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पृष्ठ 370

324 अपराजितपृच्छा
जिस गृह का व्यास कर्णायत हो और वह पन्द्रह हाथ (गज) ऊँचा हो उसको
'द्रव्यादिकवास्तु' कहते है। ऐसा बहुत से काष्ठ से बनता है, इसलिए यह गृह
शाश्वत अर्थात् चिरस्थायी नहीं होता है।
कर्णशाला यदा लग्ना आग्नेय्यां दिशि संश्रिताः ।
अग्निदं नाम तद्वास्तु कुरुतेऽग्निभय ध्रुवम् ॥ 26 ॥
यदि किसी गृह की कर्णशाला (कोने में निकला हुआ कक्ष) आग्नेय दिशा से
लगी हुई हो तो ऐसे वास्तु को 'अग्निद' नाम दिया गया है। ऐसे वास्तु से निश्चय ही
अग्निभय बना रहता है।
नैर्ऋत्ये च यदा लग्नाः शालाश्च वास्तुबाह्यतः ।
नैर्ऋत्यं नाम तद्वास्तु व्याध्याधिक्यं तु मृत्युकृत् ॥ 27 ॥
यदि किसी गृह की नैर्ऋत्य दिशा से लगी हुई कोई शाला बाहर की ओर बनी
हुई हो तो उसे 'नैर्ऋत्य वास्तु' नाम से कहा है। उसमें इतनी व्याधियाँ आती है कि
जिनसे मृत्यु का सङ्कट ही उत्पन्न हो जाता है।
वायव्ये तु यदा लग्नाः शालाश्च गृहबाह्यतः ।
वायव्यं नाम तद् वास्तु गृहे वायुभयं भवेत् ॥ 28 ॥
इसी प्रकार से गृह की वायव्य दिशा से लगी हुई कोई शाला बाहर की ओर
बनी हो तो ऐसे वास्तु का 'वायव्य' नाम दिया गया है, ऐसे घर में वायु (अन्धड़,
प्रभञ्जनादि) से भय सदा बना रहता है।
ईशाने तु यदा लग्नाः शालाश्च गृहबाह्यतः ।
देवकं नाम तद्वास्तु देवदोषः सदा भवेत् ॥ 29 ॥
यदि किसी गृह के ईशान कोण से लगी हुई कोई शाला बाहर की ओर बनी हुई
हो तो ऐसे वास्तु को देवक वास्तु कहते हैं। इसमें सदा ही देव दोष बने रहते हैं।
अधोभम्यां तु ये दोषास्तथैव चोर्ध्वमादिशेत् ।
ऊर्ध्वभूमिदिशाश्रं चैतद्गुणं दोषमादहेत् ॥ 30 ॥
मकानों, घरों में अधो भूमि (नीचे के तल) में जो-जो दोष बताए गए हैं, वे
ही दोष ऊपर के तलों में भी उसी प्रकार होते है, ऐसा समझे। अस्तु, ऊँचे तल या
मंजिलों की दीवारों (अश्र) की दिशाओं के भी यह गुण-दोष दुःखदायी होते हैं।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
वास्तुपरिभ्रमणादिगुणदोषनिर्णयाधिकारो नाम द्वाषष्टितमं सूत्रम् ॥ 62 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
वास्तुपरिभ्रमणादि गुण-दोष निर्णय अधिकार नामक बासठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 62 ॥