अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६२ ३२३
जिस वास्तु की वीथिका अन्दर और बाहर की ओर से सुरों के बिना हो तो
ऐसे वास्तु को 'विरोधवास्तु' (मुक्त कोण) कहते हैं। इसका फल यह होता है कि
अपने ही गोत्र में कलह उत्पन्न होता है और बिखराव उत्पन्न करता है।
अन्यपृष्ठे यदा चान्यं प्रासादं पुरमन्दिरम्।
खादकं नाम तद्वास्तु परस्परविरोधकृत् ॥ २० ॥
जिस वास्तु में प्रासाद मन्दिर आदि एक के पीछे एक बने हों तो ऐसे वास्तु को
'खादक' नाम दिया जाता है जो आपस में विरोध उत्पन्न कराता है।
कुक्षिद्वारं गृहे वापि कुर्याद्वा सुरसद्मनि।
विभ्रमं नाम तद् वास्तु विभ्रमेत गृहाधिपम् ॥ २१ ॥
यदि देवता के मन्दिर का या गृह का कोई भीतरी द्वार (कुक्षि द्वार) बना हो तो
ऐसे वास्तु को 'विभ्रम' नामक वास्तु कहते हैं। उसके गृहस्वामी को सदा ही भ्रम
बना रहता है।
कुक्षिभागे यदा चान्यं गृहं च सुरसद्म वा।
कुक्षिदं नाम तद्वास्तु विभ्रमेनैतद् दृश्यत ॥ २२ ॥
यदि इसी तरह देवता के मन्दिर के या गृह के भीतरी भाग (कुक्षिभाग) में
कोई अन्य देव मन्दिर या अन्य गृह बना हो तो उसे 'कुक्षिदवास्तु' नाम दिया गया
है। इसे देखते ही विभ्रम उत्पन्न होने लगता है।
अग्रे द्वारोन्नतं गेहं निम्नगं मध्यसंस्थितम्।
उच्छ्रितं नाम तद् वास्तु वृद्धिपूजादिकं हनेत् ॥ २३ ॥
जिस गेह के आगे का द्वार उन्नत हो और मध्य का द्वार नीचा हो उस वास्तु को
'उच्छ्रितवास्तु' नाम दिया गया है। ऐसे वास्तु वृद्धि, पूजादिक में हानि पहुचाते हैं।
समगृहं समरूपं द्वारमध्ये पट्टाग्रजम्।
बिन्दूकं नाम तद् वास्तु हनेच्च सन्तत्यादिकम् ॥ २४ ॥
समान रूप वाले दो समान गृहों के मध्य का द्वार यदि चौकी युक्त हो तो ऐसे
वास्तु का नाम 'बिन्दूकवास्तु' नाम दिया गया है। यह दोष सन्तानादि की मृत्यु का
कारण बनता है।
अन्यान्य दोषमाह —
गृहव्यासकर्णायतं त्रिपञ्चहस्तमुच्छ्रितम्।
द्रव्यादिकं बहुकाष्ठं शाश्वतं न भवेद् गृहम् ॥ २५ ॥