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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 535 में से

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पृष्ठ 322

276 अपराजितपृच्छा
पादवृद्धिः पुनः कुर्याद्विंशतिहस्ततः करे।
ऊर्ध्वं वै त्रिंशद्धस्तान्तं वसुहस्तैकमङ्गुलम् ॥ २५ ॥
इसके बाद, प्रासाद की ऊँचाई 11 से 20 हाथ (गज) तक बढ़ती जाए तो कूर्म
का प्रमाण प्रति गज चतुर्थांश अङ्गुल की वृद्धि पाता जाए अर्थात् अगले दस हाथ,
गज की ऊँचाई प्रासाद की बढ़ने पर कूर्म के प्रमाण में ढाई अङ्गुल और जुड़ जाएँगे
और कूर्म का प्रमाण साढ़े आठ से बढ़कर 11 अङ्गुल हो जाएगा और 20 हाथ
(गज) से 30 हाथ (गज) तक प्रासाद के बढ़ने तक हर आठवें गज पर एक
अङ्गुल प्रमाण कूर्म में वृद्धि होगी।
ततः परं शतार्द्धान्तं सूर्यहस्तैकमङ्गुलम्।
अनेन क्रमयोगेन मन्वङ्गुलं₁₄ शतार्धके ॥ २६ ॥
इससे भी ऊपर, यदि प्रासाद 31 हाथ से 50 हाथ (गज) की ऊँचाई तक बढ़े
तो कूर्म का प्रमाण प्रति 12 हाथ (गज) पर मात्र एक अङ्गुल प्रमाण ही बढ़ेगा।
एक तरह से इस क्रम योग से 50 हाथ तक के प्रासाद के लिए कूर्म का प्रमाण 14
अङ्गुल का होगा।
कनिष्ठादित्रिविधकूर्मप्रमाणं —
कनिष्ठं पादहीनं च ज्येष्ठं पादाधिकं तथा।
साधारणमिदं मानं त्रिविधं कूर्ममानतः ॥ २७ ॥
इस तरह कूर्म के मान-प्रमाण को देखें तो 14 अङ्गुल में चतुर्थांश अङ्गुल की
कमी वाला कूर्म कनिष्ठ माना जाएगा, 14 अङ्गुल से एक चतुर्थांश अङ्गुल अधिक
वाला कूर्म ज्येष्ठ माना जाएगा और 14 अङ्गुलमान का कूर्म प्रमाण साधारण माना
जाएगा। इस तरह कूर्म का यह तीन तरह का मान प्रमाण बताया गया है।
धात्वानुसारेंणकूर्मफलं —
हैमो रौप्यश्च कर्त्तव्यः सर्वपापप्रणाशनः।
इत्थं कूर्म यः करोति सर्वयज्ञफलं भजेत् ॥ २८ ॥
अब विविध धातुओं से बनने वाले कूर्मों के फल बताते है। सोने और चाँदी से
बने हुए कूर्म सभी प्रकार के कोपों का शमन करते हैं। जो व्यक्ति ऐसे सोने-चाँदी
के कूर्म बनवाते हैं, उनको सभी प्रकार के यज्ञों का फल मिल जाता है।
स्नानं पञ्चामृतैः कार्यं कूर्मस्य च यथाविधि।
अर्चयित्वा प्रयत्नेन धूपयित्वा सुगन्धिना ॥ २९ ॥