अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५२ 275
इस तरह नींव के खात मुहूर्त की समारोह पूर्वक भराई हो जाने पर जब नींव
की ईंटों से चुनाई की जाए तो ध्यान रखें कि भित्ति की चुनाई की पूर्ति स्तरवार हो
अर्थात् पूरी नींव की एक स्तर चुनाई हो जाए। उसके बाद ही उसके ऊपर के दूसरे
स्तर की चुनाई करनी चाहिए। इस चुनाई कार्य में काम आने वाले पाषाणों का
आकार कपिशीर्ष के समान (बन्दर के कपाल के बराबर) टुकड़ों में होना चाहिए
और इनकी चुनाई करते समय जिस मिट्टी में इनकी चुनाई की जाए, उसका स्तर भी
लगभग आठ अङ्गुल का हो और उस मिट्टी में ये पाषाण पूरी तरह से गच्छ करके
चुने जाएँ ताकि कहीं से भी खाली स्थान नहीं रहे और वे पाषाण हिले-डुले नहीं।
जलेन प्लावितास्ताश्च मुहूरस्या हनेत्ततः।
पालाशस्वस्थसम्भूतैर्हनेत्ताः सुदृढं ततः ॥ २२ ॥
फिर, चुनी गई दीवार पर किनारी बनाकर उस पर जल भर दें ताकि दीवार
पूरी तरह से तर रहे और बाद में उसे ठोस रूप देने के लिए मोहरी, घूँसे से कूटते
जाए और इसके उपरान्त उस दीवार को पलाश (खाखरे) की स्वस्थ, हरी-भरी
शाखाओं कामड़ियों से तड़ा-तड़ पीट-पीटकर सुदृढ़ बनाएँ।
पादोनं पूरयेत्प्रान्तं तत्घनं च प्रदायिकम् ?।
ह्रस्वं ह्रस्वं तु कर्तव्यं प्रासादस्य तलं तथा ॥ २३ ॥
प्रासाद के नींव के प्रान्त भाग को एक चतुर्थांश पूरा हो जाने पर उसे घन के
द्वारा धीरे-धीरे कूटते जाना चाहिए जिससे प्रासाद का तल भाग पक्का, दृढ हो जाए।
इत्यमनन्तर प्रासादस्य कूर्मलक्षणं —
एक हस्ते तु प्रासादे कूर्मः स्याच्चतुरङ्गुलः।
अर्धाङ्गुला भवेद्वृद्धिः प्रतिहस्तं दशावधि ॥ २४ ॥
(अब प्रासाद की नींव रचना के समय रखे जाने वाले कूर्म के बारे में पूरी
जानकारी दी जा रही है) इस नियम को सदा ही ध्यान में रखें कि यदि प्रासाद की
ऊँचाई 1 हाथ की अर्थात् एक गज (चौबीस अङ्गुल) हो, तो उसके प्रमाणानुसार
कूर्म का आकार 4 अङ्गुल का होना चाहिए। इसके उपरान्त ज्यों-ज्यों प्रासाद की
ऊँचाई की वृद्धि होती जाए, तो दश हाथ (दस गज) की वृद्धि तक प्रति हाथ (प्रति
गज) के प्रमाण में कूर्म का प्रमाण भी आधा अङ्गुल बढ़ाते जाएँ। इस तरह एक
हाथ से दस हाथ तक बढ़ते कूर्म का प्रमाण 4 अङ्गुल के बाद और साढ़े चार
अङ्गुल बढ़ जाएगा अर्थात् दस हाथ के प्रासाद का कूर्म साढ़े आठ अङ्गुल का हो
जाएगा।