अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५१ 267
इस अवसर पर देखें कि जो वर्तिका पहले ऊँची जलती दीखे, उसी के अनुसार
उस भूमि का वर्ण निश्चय करें, और तब सूत्रधार के हाथ में उत्तम कुदाली दें।
स्थित्वा पूर्वाभिमुखतः शुचिः स्नातो जितेन्द्रियः।
शुक्लोम्बरधरो नित्यं शुक्लमाल्यानुलेपनः ॥ 7 ॥
प्रहारं दापयेत्तत्र लक्ष्येद्रेणुमुच्छ्रितम्।
पूर्वापरयाम्योत्तरं वर्णैः प्राच्यादिशस्तकम् ॥ 8 ॥
सूत्रधार जो कि पवित्र हो, स्नानादि से शुद्ध हो, जितेन्द्रिय, श्वेत वस्त्रधारण किए
हो और नित्य श्वेतपुष्पों की माला पहनकर श्वेत चन्दन का अनुलेप तिलक आदि
करता है, पूर्वाभिमुख स्थित होकर उस कुदाल से प्रहार करें और जो मिट्टी उस
प्रहार से निकले, उसे ध्यानपूर्वक देखें कि वह किधर अधिक गिरती है— पूर्व की
ओर या पश्चिम या दक्षिण अथवा उत्तर की ओर? इसी के अनुसार पूर्वादि दिशा
क्रम से भूमि का वर्ण निश्चित करें जो शास्त्रसम्मत माना जाता है।
ततो वास्तुं च सम्पूज्य तत्तत्क्षेत्रेषु कल्पितम्।
पुष्पाक्षतैः समालिख्य निलयाधः प्रमाणतः ॥ 9 ॥
इसके उपरान्त ही वास्तु का पूजन करें और उस क्षेत्र के नक्शे के अनुसार
डाकवेल या आकार कल्पित करें तथा पुष्प, अक्षतादि से समस्त निलयों (कमरों)
को प्रमाणानुसार अङ्कित कर दें।
सूत्रधारो महाप्राज्ञ शुक्लोम्बरधरः शुचिः।
करे गृहीत्वा कुद्दालं दृढश्चैकाग्रमानसः ॥ 10 ॥
तूरवादित्रनिर्घोषैर्मङ्गलैः शब्दसङ्कुलम्।
प्रहारं दापयेत्तत्र तत्कुक्षौ वह्निगोचरे ॥ 11 ॥
पुनः कहते हैं कि श्वेत वस्त्रधारी, पवित्रभाव वाले सूत्रधार महाप्राज्ञ को चाहिए
कि वह दृढ़ और एकाग्रमन से कुदाल को ग्रहण करें और गाजे-बाजे के साथ उच्च
मङ्गल गीतों के गान, कोलाहल के बीच कुदाल के प्रहारों से उस भूमि के कुक्ष को
खोदकर बाहर निकाल कर दिखाएँ।
दिशानुसारेण रेणुपतनफलं —
उद्धृते चैव कुद्दाले ततो रेणुं निरीक्षयेत्।
उत्तरे तु भवेत्क्षेमं पश्चिमे पुत्रपौत्रकम् ॥ 12 ॥
और, कुदाल से निकाली गई मिट्टी का पुनः ठीक-ठीक ढंग से निरीक्षण करें
कि उक्त मिट्टी यदि उत्तर की ओर गिरे तो क्षेम-कुशल होता है और पश्चिम में गिरे