अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइत्यमनन्तर वर्णानुसारेणयोग्याययोग्यभूमिलक्षणं —
श्वेता च ब्राह्मणी भूमी रक्ता वै क्षत्रिया स्मृता।
पीतवर्णा भवेद्वैश्या शूद्री तु कृष्णवर्णिनी ॥ 1 ॥¹
अब रङ्ग, वर्ण के अनुसार भूमि के लक्षण कहते हैं। जो भूमि श्वेत वर्ण की हो,
वह ब्राह्मणी भूमि होती है, रक्तवर्णा क्षत्रिया, पीतवर्णा वैश्या तथा कृष्णवर्णा भूमि
शूद्री होती है।
गन्धानुसारेणभूमिलक्षणं —
घृतगन्धा भवेद्विप्री राज्ञी रक्तानुगन्धिनी।
क्षारगन्धा भवेद्वैश्या शूद्री विष्ठानुगन्धिनी ॥ 2 ॥
जिस भूमि से घी जैसी गन्ध आए, वह भूमि विप्रा होती है, रक्तगन्धा भूमि
राज्ञी या क्षत्रिया, क्षारगन्धा भूमि वैश्या तथा विष्ठानुगन्धिनी भूमि शूद्री होती है।
स्वादानुसारेणभूमिः —
ब्राह्मणी मधुरास्वादां कषाया क्षत्रिया तथा।
क्षारास्वादा भवेद्वैश्या शूद्री स्यात्कटुका तथा ॥ 3 ॥
एवं परीक्षयेद् भूमिं वर्णैर्गन्धैश्च स्वादतः।
गोमयेन समालिप्य नन्द्यावर्तं तु स्वस्तिकम् ॥ 4 ॥
ऐसी भूमि जो चखने पर मधुर स्वाद वाली हो, वह ब्राह्मणी भूमि होती है, कषाय
स्वाद वाली भूमि क्षत्रिय, क्षार स्वाद वाली वैश्या तथा कटु स्वाद वाली भूमि शूद्री
होती है। इस प्रकार भूमि का वर्ण, गन्ध और स्वादानुसार परीक्षण किया जाना चाहिए।
इसके बाद उस भूमि को गोबर से लीप कर उस पर नन्द्यावर्त स्वस्तिक बनाएँ।
स्थापयेदामघटं वर्धमानेन संयुतम्।
घृतेन ज्वालयेद्वर्तीश्चतस्रश्च चतुर्दिशम् ॥ 5 ॥
फिर उस स्वस्तिक पर कच्चा घड़ा और उस पर बीजोरा या ढक्कन रखा हुआ
हो, ऐसा रखें तथा उस घट पर चारों ओर चार दिशाओं में जलने वाली बातियाँ रखे
और उन्हें घी से जलाएँ, दीपक बनाएँ।
आद्योद्भवे यथा वर्तिस्तदूर्णा सा मही मता।
सूत्रधारस्य हस्ते तु कुद्दालं तु तथोत्तमम् ॥ 6 ॥
- यहाँ से इसी सूत्र के 12वें श्लोक के बाद का विषय पुनः आरम्भ होता है। 'न' मातृका में इस क्रम से
उक्त श्लोक नहीं मिलते हैं।