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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 535 में से

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पृष्ठ 286

सूत्र-४७ 239
वर्गमूल फल को छोड़कर छह भाग शक्रांश (14वाँ या 13वाँ) भाग या 1/13
छोड़ दे, शेष को षोडशाश्र का क्षेत्रफल समझे।
चापाकारे यदा क्षेत्रे पृथुत्वं मध्यपादतः।
त्रिभागं द्विगुणं कृत्वा पृथुत्वं चैव साधयेत्॥ ३३॥
जब धनुषाकार क्षेत्र हो और मोटाई मध्य पाद जितनी हो तो उसके तीन भागों
को दुगुना करके मोटाई को ज्ञात करना चाहिए।
पादान्तं गुणिताग्रं च मध्ये गुणं पृथु मध्यम ?।
वामे च द्विगुणं दीर्घ चापाकारे क्षेत्रफलम्॥ ३४॥
इति चापाकारक्षेत्रम्।
पादान्त तक गुणित करके मध्य में मध्यम गुणित कर? बायीं ओर दुगुनी
चौड़ाई वाला चापाकार क्षेत्रफल बनता है।
षड्बृहद्भुजार्धवासं भिन्नैः शीर्ष शिखान्तकैः।
पृथुदीर्घगुणिते त्रिकोणे क्षेत्रफलं भवेत्॥ ३५॥
इति त्रिकोणक्षेत्रम्।
बृहद् भुजार्धवास को अर्थात 24/2 को छह से गुणित करके शिखान्त तक
मोटाई व लम्बाई को गुणित करके त्रिकोण क्षेत्रफल बनाएँ।
दीर्घ समभुजान्ते च पृथुत्वं मध्यस्थाके।
पृथुपादं परित्यज्य षडंशं च पुनर्ददेत्॥ ३६॥
इत्यर्धचन्द्रक्षेत्रम्।
समभुजान्त तक लम्बाई और मध्य स्थान तक की चौड़ाई का चतुर्थांश छोड़कर
षष्ठांश को पुनः जोड़ दें।¹
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तृश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
गणितक्षेत्रनिर्णयाधिकारो नाम सप्तचत्वारिंशं सूत्रम्॥ 47॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
गणितक्षेत्रनिर्णय अधिकार नामक सेंतालीसवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 47॥

  1. गणित का यह वर्णन पर्याप्त रूप से त्रुटित है। इसे विशेष रूप से भास्करकृत लीलावती नामक ग्रंथ में
    देखना चाहिए। इसके लिए श्रीपति कृत गणिततिलक और सिद्धान्तशेखर ग्रंथ भी देखे जा सकते हैं।