अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 285, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें238 अपराजितपृच्छा
तस्यास्तु(स्नु)वौलेनहितं खातकूपफलं भवेत् ।
पाषाणपिण्डहतं वा शिलामानं तु सङ्ख्यया ॥ २६ ॥
उपर्युक्त विधि से कूप के खात परिणाम प्राप्त होता है। जो पाषाण पिण्डमान से
भाग देने पर शिला मान की संख्या आती है।
भूवदन समासार्धं च लम्बकेनात्र गुणितम् ? ।
कुद्दलं लम्बहतं च जायते क्षेत्रफलम् ॥ २७ ॥
भूवदन के समान ही आधा और ले और उसे लम्बक से गुणित करे (?) , तो
कुद्दलं लम्बहत क्षेत्रफल आता है।
तविवेधगुणितं च खातफलं प्रसिद्धयेत्।
समविषमाधवेधैः पदैर्विषमवेधकैः ॥ २८ ॥
इस प्रकार से वेध के गुणित करके खातफल आता है। सम-विषम आध वेधों
में पदों में विषम वेध कहा है।
गोलव्यासवर्गगुणं ताड्यं व्यासार्धपिण्डकम् ।
द्विशताष्टाशीतिहृतं लब्धं गोलफलं भवेत् ॥ २९ ॥
गोल और व्यास के वर्ग को गुणित कर व्यासार्ध पिण्डक को भाग दें। उससे
दो सौ अस्सी (280) निकाल लें तो गोलफल की लब्धि होती है ॥ २९ ॥
व्यासवर्गे तु गुणितं फलमेकं ? प्रकीर्तितम् ।
षड्भागं द्विरसं त्यक्त्वाऽष्टाश्रे क्षेत्रफलं भवेत् ॥ ३० ॥
इत्यष्टाश्रक्षेत्रम् ।
व्यास के वर्ग को गुणित करके एक फल कहा जाता है। इसके बारह (द्विरसं)
के छह भाग को छोड़ने पर अष्टाश्र क्षेत्र का क्षेत्रफल आता है।
षडंशमेकशेषं च त्यक्त्वा सूत्रापरः शिखा ? ।
दीर्घ पृथुत्वे गुणितं षडश्रे क्षेत्रजं फलम् ॥ ३१ ॥
इति षडश्रक्षेत्रम् ।
षडंश में एक शेष को अर्थात 1 ¹/⁶ छोड़कर सूत्र पर शिखा ? लम्बाई को
मोटाई से गुणित करने से षडश्र क्षेत्रफल बनता है।
वर्गमूलफलं त्यक्त्वा षड्भागं शक्रांशं त्यजेत् ।
शेषं फलं विजानीयात् क्षेत्रे वै षोडशाश्रके ॥ ३२ ॥
इति षोडशाश्रक्षेत्रम् ।