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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 421 में से

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पृष्ठ 151

यात्रार्थी कालमाकाङ्क्षंश्चरेद् भैक्ष्यं समाहितः ।
लाभं साधारणं नेच्छेन्न भुञ्जीताभिपूजितः ॥ २१ ॥
संन्यासी जीवन-निर्वाहके ही लिये भिक्षा माँगे। उचित समयतक उसके मिलनेकी बाट
देखे। चित्तको एकाग्र किये रहे। साधारण वस्तुओंकी प्राप्तिकी भी इच्छा न करे। जहाँ
अधिक सम्मान होता हो, वहाँ भोजन न करे ॥ २१ ॥
अभिपूजितलाभाद्धि विजुगुप्सेत भिक्षुकः ।
भुक्तान्यन्नानि तिक्तानि कषायकटुकानि च ॥ २२ ॥
मान-प्रतिष्ठाके लाभसे संन्यासीको घृणा करनी चाहिये। वह खाये हुए तिक्त, कसैले
तथा कड़वे अन्नका स्वाद न ले ॥ २२ ॥
नास्वादयीत भुञ्जानो रसांश्च मधुरांस्तथा ।
यात्रामात्रं च भुञ्जीत केवलं प्राणधारणम् ॥ २३ ॥
भोजन करते समय मधुर रसका भी आस्वादन न करे। केवल जीवन-निर्वाहके
उद्देश्यसे प्राण-धारणमात्रके लिये उपयोगी अन्नका आहार करे ॥ २३ ॥
असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत मोक्षवित् ।
न चान्यमन्नं लिप्सेत भिक्षमाणः कथंचन ॥ २४ ॥
मोक्षके तत्त्वको जाननेवाला संन्यासी दूसरे प्राणियोंकी जीविकामें बाधा पहुँचाये बिना
ही यदि भिक्षा मिल जाती हो तभी उसे स्वीकार करे। भिक्षा माँगते समय दाताके द्वारा दिये
जानेवाले अन्नके सिवा दूसरा अन्न लेनेकी कदापि इच्छा न करे ॥ २४ ॥
न संनिकाशयेद् धर्मं विविक्ते चारजाश्चरेत् ।
शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा ॥ २५ ॥
प्रतिश्रयार्थं सेवेत पार्वतीं वा पुनर्गुहाम् ।
ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत् ॥ २६ ॥
उसे अपने धर्मका प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। रजोगुणसे रहित होकर निर्जन स्थानमें
विचरते रहना चाहिये। रातको सोनेके लिये सूने घर, जंगल, वृक्षकी जड़, नदीके किनारे
अथवा पर्वतकी गुफाका आश्रय लेना चाहिये। ग्रीष्मकालमें गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं
रहना चाहिये, किंतु वर्षाकालमें किसी एक ही स्थानपर रहना उचित है ॥ २५-२६ ॥
अध्वा सूर्येण निर्दिष्टः कीटवच्च चरेन्महीम् ।
दयार्थं चैव भूतानां समीक्ष्य पृथिवीं चरेत् ॥ २७ ॥
संचयांश्च न कुर्वीत स्नेहवासं च वर्जयेत् ।
जबतक सूर्यका प्रकाश रहे तभीतक संन्यासीके लिये रास्ता चलना उचित है। वह
कीड़ेकी तरह धीरे-धीरे समूची पृथ्वीपर विचरता रहे और यात्राके समय जीवोंपर दया करके
पृथ्वीको अच्छी तरह देख-भालकर आगे पाँव रखे। किसी प्रकारका संग्रह न करे और कहीं
भी आसक्तिपूर्वक निवास न करे ॥ २७ १/२ ॥