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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 421 में से

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पृष्ठ 152

पूताभिरद्भिर्नित्यं वै कार्यं कुर्वीत मोक्षवित् ॥ २८ ॥
उपस्पृशेदुद्धृताभिरद्भिश्च पुरुषः सदा ।
मोक्ष-धर्मके ज्ञाता संन्यासीको उचित है कि सदा पवित्र जलसे काम ले। प्रतिदिन तुरंत
निकाले हुए जलसे स्नान करे (बहुत पहलेके भरे हुए जलसे नहीं) ॥ २८१/२ ॥
अहिंसा ब्रह्मचर्यं च सत्यमार्जवमेव च ॥ २९ ॥
अक्रोधश्चानसूया च दमो नित्यमपैशुनम् ।
अष्टस्वेतेषु युक्तः स्याद् व्रतेषु नियतेन्द्रियः ॥ ३० ॥
अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम
और चुगली न खाना—इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे। इन्द्रियोंको
वशमें रखे ॥ २९-३० ॥
अपापमशठं वृत्तमजिह्मं नित्यमाचरेत् ।
जोषयेत सदा भोज्यं ग्रासमागतमस्पृहः ॥ ३१ ॥
उसे सदा पाप, शठता और कुटिलतासे रहित होकर बर्ताव करना चाहिये। नित्यप्रति
जो अन्न अपने-आप प्राप्त हो जाय, उसको ग्रहण करना चाहिये, किंतु उसके लिये भी मनमें
इच्छा नहीं रखनी चाहिये ॥ ३१ ॥
यात्रामारंत्र च भुञ्जीत केवलं प्राणयात्रिकम् ।
धर्मलब्धमथाश्नीयान्न काममनुवर्तयेत् ॥ ३२ ॥
प्राणयात्राका निर्वाह करनेके लिये जितना अन्न आवश्यक है, उतना ही ग्रहण करे।
धर्मतः प्राप्त हुए अन्नका ही आहार करे। मनमाना भोजन न करे ॥ ३२ ॥
ग्रासादाच्छादनादन्यन्न गृह्णीयात् कथंचन ।
यावदाहारयेत् तावत् प्रतिगृह्णीत नाधिकम् ॥ ३३ ॥
खानेके लिये अन्न और शरीर ढकनेके लिये वस्त्रके सिवा और किसी वस्तुका संग्रह न
करे। भिक्षा भी, जितनी भोजनके लिये आवश्यक हो, उतनी ही ग्रहण करे, उससे अधिक
नहीं ॥ ३३ ॥
परेभ्यो न प्रतिग्राह्यं न च देयं कदाचन ।
दैन्यभावाच्च भूतानां संविभज्य सदा बुधः ॥ ३४ ॥
बुद्धिमान् संन्यासीको चाहिये कि दूसरोंके लिये भिक्षा न माँगे तथा सब प्राणियोंके लिये
दयाभावसे संविभागपूर्वक कभी कुछ देनेकी इच्छा भी न करे ॥ ३४ ॥
नाददीत परस्वानि न गृह्णीयादयाचितः ।
न किंचिद् विषयं भुक्त्वा स्पृहयेत् तस्य वै पुनः ॥ ३५ ॥
दूसरोंके अधिकारका अपहरण न करे। बिना प्रार्थनाके किसीकी कोई वस्तु स्वीकार न
करे। किसी अच्छी वस्तुका उपभोग करके फिर उसके लिये लालायित न रहे ॥ ३५ ॥
मृद्मापस्तथान्नानि पत्रपुष्पफलानि च ।