अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंले ॥ १४ ॥
दान्तो मैत्रः क्षमायुक्तः केशान् श्मश्रु च धारयन् ।
जुह्वन् स्वाध्यायशीलश्च सत्यधर्मपरायणः ॥ १५ ॥
इन्द्रियोंका संयम करे, सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे, क्षमाशील बने और दाढ़ी-मूँछ
तथा सिरके बालोंको धारण किये रहे। समयपर अग्निहोत्र और वेदोंका स्वाध्याय करे तथा
सत्य-धर्मका पालन करे ॥ १५ ॥
शुचिदेहः सदा दक्षो वननित्यः समाहितः ।
एवं युक्तो जयेत् स्वर्गं वानप्रस्थो जितेन्द्रियः ॥ १६ ॥
शरीरको सदा पवित्र रखे। धर्म-पालनमें कुशलता प्राप्त करे। सदा वनमें रहकर चित्तको
एकाग्र किये रहे। इस प्रकार उत्तम धर्मोंको पालन करनेवाला जितेन्द्रिय वानप्रस्थी स्वर्गपर
विजय पाता है ॥ १६ ॥
गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ वा पुनः ।
य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रयेत् ॥ १७ ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ कोई भी क्यों न हो, जो मोक्ष पाना चाहता हो, उसे
उत्तम वृत्तिका आश्रय लेना चाहिये ॥ १७ ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् ।
सर्वभूतसुखो मैत्रः सर्वेन्द्रिययतो मुनिः ॥ १८ ॥
(वानप्रस्थकी अवधि पूरी करके) सम्पूर्ण भूतोंको अभय-दान देकर कर्म-त्यागरूप
संन्यास-धर्मका पालन करे। सब प्राणियोंके सुखमें सुख माने। सबके साथ मित्रता रखे।
समस्त इन्द्रियोंका संयम और मुनि-वृत्तिका पालन करे ॥ १८ ॥
अयाचितमसंकॢप्तमुपपन्नं यदृच्छया ।
कृत्वा प्राह्ने चरेद् भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने ॥ १९ ॥
वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित् ।
बिना याचना किये, बिना संकल्पके दैवात् जो अन्न प्राप्त हो जाय, उस भिक्षासे ही
जीवन-निर्वाह करे। प्रातःकालका नित्यकर्म करनेके बाद जब गृहस्थोंके यहाँ रसोई-घरसे
धुआँ निकलना बंद हो जाय, घरके सब लोग खा-पी चुकें और बर्तन धो-माजकर रख दिये
गये हों, उस समय मोक्षधर्मके ज्ञाता संन्यासीको भिक्षा लेनेकी इच्छा करनी चाहिये ॥ १९ १/२
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लाभेन च न हृष्येत नालाभे विमना भवेत् ।
न चातिभिक्षां भिक्षेत केवलं प्राणयात्रिकः ॥ २० ॥
भिक्षा मिल जानेपर हर्ष और न मिलनेपर विषाद न करे। (लोभवश) बहुत अधिक
भिक्षाका संग्रह न करे। जितनेसे प्राण-यात्राका निर्वाह हो उतनी ही भिक्षा लेनी
चाहिये ॥ २० ॥