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आनन्दमठ (वन्दे मातरम् एवं संन्यासी विद्रोह इतिहास)

Anandamath with Vande Mataram - Bankim Chandra

बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा

DevanagariHindipublished78 पृष्ठ

महेद्र ने देखा दस्यु गाते-गाते रोने लगा। तब महेद्र ने विस्मय से पूछा- "तुमलोग कौन हो?"
भवानंद ने उत्तर दिया - "हमलोग संतान है।"
महेद्र - "संतान क्या? किसकी संतान है?"
भवानंद - "माता की संतान!"
महेद्र - "ठीक ! तो क्या संतान लोग चोरी-डकैती करके मां की पूजा करते है? यह कैसी मातृभक्ति?"
भवानंद - "हम लोग चोरी-डकैती नही करते........"
महेद्र - "अभी तो गाड़ी लूटी है......?"
भवानंद - "यह क्या चोरी-डकैती है! किसके रुपये लुटे है?"
महेद्र - "क्यो ? राजा के !"
भवानंद - "राजा के ! वह क्यो इन रुपयो को लेगा- इन रुपयो पर उसका क्या अधिकार है?"
महेद्र - "राजा का राज-भाग।"
भवानंद- "जो राजा राज्य प्रबंध न करे, जनता-जनार्दन की सेवा न करे, वह राजा कैसे हुआ?"
महेद्र- "देखता हूं, तुम लोग किसी दिन फौजी की तोपो के मुंह पर उड़ जाओगे।"
भवानंद - "अनेक साले सिपाहियो को देख चुका हूं, अभी आज भी तो देखा है!"
महेद्र - "अच्छी तरह नही देखा, एक दिन देखोगे!"
भवानंद - "सब देख चुका हूं। एक बार से दो बार तो मनुष्य मर नही सकता।"
महेद्र - "जान-बूझकर मरने की क्या जरूरत है?"
भवानंद - "महेद्र सिंह! मेरा ख्याल था कि तुम मनुष्यो के समान मनुष्य होगे। लेकिन देखा- जैसे सब है,
वैसे तुम भी हो- घी-दूध खाकर भी दम नही। देखो, सांप मिट्टी मे अपने पेट को घसीटता हुआ चलता है-
उससे बढ़कर तो शायद हीन कोई न होगा; लेकिन उसके शरीर पर भी पैर रख देने पर वह फन काढ लेता है।
तुम लोगो का धैर्य
क्या किसी तरह भी नष्ट नही होता? देखो, कितने देशी शहर है- मगध, मिथिला, काशी, कराची, दिल्ली,
काश्मीर- उन जगहो की ऐसी दुर्दशा है? किस देश के मनुष्य भोजन के अभाव मे घास खा रहे हैं? किस देश
की जनता कांटे खाती है, लता-पत्ता खाती हैं? किस देश के मनुष्य स्यार, कुत्ते और मुर्दे खाते है? आदमी
अपने संदूक मे धन रखकर भी निश्चित नही है- सिंहासन पर शालिग्राम बैठाकर निश्चित नही है- घर मे बहू-
नौकर-मजदूरनी रखकर निश्चित नही है! हर देश का राजा अपनी प्रजा की दशा का, भरण-पोषण का ख्याल
रखता है; हमारे देश का मुसलमान राजा क्या हमारी रक्षा कर रहा है? धर्म गया, जाति गई, मन गया- अब तो
प्राणो पर बाजी आ गई है। इन नशेबाज दाड़ीवालो को बिना भगाए क्या हिंदू हिंदू रह जाएंगे?"
महेद्र- "कैसे भगाओगे?"
भवानंद - "मारकर!"
महेद्र- "तुम अकेले भगाओगे- एक थप्पड़ मारकर क्या?"
भवानंद ने फिर गाया-
"सप्तकोटि कण्ठ कलकल निनादकराले,
द्विसप्तकोटिभुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केनो मां एतो बले।"

महेंद्र -“किंतु देखता हूं, तुम तो अकेले हो?’’
भवानंद-“क्यो, अभी तो दो सौ आदमियो को देख चुके हो।”
महेंद्र-“क्या वे सब संतान है?’’
भवानंद-“हां सब संतान है।”
महेंद्र-“और कितने लोग है?’’
भवानंद-“इसी तरह हजारो है। धीरे-धीरे और बढ़ेगे।”
महेंद्र-“बहुत होगा, दस-बीस हो जाओगे- लेकिन क्या इतने से ही मुसलमान भाग जाएंगे? क्या वे सहज
ही राज्यच्युत होगे?’’
भवानंद-‘‘पलासी में अंग्रेजो की फौज कितनी थी?’’
महेंद्र -‘‘अंग्रेज और बंगाली बराबर है?’’
भवानंद -‘‘न कैसे बराबर होगे? शरीर मे अधिक बल होने से क्या गोला ज्यादा तेज चलता है?’’
महेंद्र-‘‘तब अंग्रेजो और मुसलमानो मे इतना अंतर क्यो है?’’
भवानंद -‘‘मान लो एक अंग्रेज प्राण जाने पर भी भागता नही, लेकिन एक मुसलमान पसीना होते ही
भागता है, शरबत की खोज करता है। इसके बाद मान लो, अंग्रेज जो करना चाहते है, करके छोड़ते है, उनमें
लगन होती है, लेकिन मुसलमान आरामतलब होते हैं, रुपयो के लिए प्राण देते हैं- उस पर तनखाह भी तो नही
पाते। सबसे अंतिम बात यह है कि अंग्रेज साहसी होते है। एक गोला एक ही जगह जाकर गिरेगा, दस जगह
नही, अतः एक गोले को देखकर दस आदमियो के भागने की क्या जरूरत है? एक गोले के छूटते ही
मुसलमान फौज-की-फौज भागती है। लेकिन सैकड़ो गोले देखकर भी एक अंग्रेज तो नही भागता।.....’’
महेंद्र-‘‘तुम लोग मे ये सब गुण हैं’’ भवानंद -‘‘नही, लेकिन गुण पेड़ो मे फलते तो नही, अभ्यास से
ही आते हैं’’
महेंद्र -‘‘तुम लोग क्या अभ्यास करते हो??’’
भवानंद -‘‘देखते नही हो, हम लोग सन्यासी हैं! हमारा सन्यास इसी अभ्यास के लिए है। कार्योंद्धार होने
पर, अभ्यास पूरा होने पर, हम लोग फिर गृहस्थ हो जाएंगे। हम लोगो के भी स्त्री-कन्या सब है।”
महेंद्र -‘‘तुम लोग उन सबको त्यागकर माया-मोह से परे हो सके हो?’’
भवानंद -‘‘संतान झूठ नही बोला करते- तुम्हारे सामने मे मिथ्या बड़ाई करना नही चाहता- माया से परे
कौन हो सकता है? जो कहे कि हमने माया काट दी है, शायद उसे माया-ममता कभी रही ही नही, या वह
मिथ्यावादी है। हम माया से परे नही हुए है, लेकिन हम लोग अपने इस व्रत की रक्षा करते है। तुम संतान
बनोगे?’’
महेंद्र -‘‘बिना अपनी स्त्री-कन्या का पता पाए और मिले, मैं कुछ नही कर सकता।”
भवानंद -‘‘चलो, तुम अपनी स्त्री-कन्या को देखोगे? चलो!’’
दोनो शांत राह चुपचाप तय करने लगे। भवानंद ने फिर वंदेमातरम् गाना शुरू किया। महेंद्र का गला भी
सुरीला था, संगीत मे कुछ अभ्यास और रुचि भी थी, अतः वे भी साथ ही गाने लगे। उन्होने देखा कि यह
अपूर्व देशगीत गाते-गाते आंखो मे जल आने लगता है। तब महेंद्र ने कहा -‘‘यदि स्त्री-कन्या का त्याग न
करना पड़े तो इस व्रत मे मुझे भी दीक्षित कर लो!’’
भवानंद -‘‘यह व्रत जो लेता है, उसे स्त्री-कन्या का त्याग करना ही पड़ता है। तुम यदि यह व्रत लेना
चाहोगे, तो स्त्री-कन्या से मुलाकात करने न पाओगे! उनकी रक्षा के लिए उपयुक्त प्रबंध कर दिया जाएगा,

लेकिन व्रत की सफलता तक उनका मुखदर्शन नही मिलेगा।''
महेन्द्र-‘‘तब मैं यह व्रत ग्रहण न करूंगा।’’
सबेरा हो गया है। वह जनहीन कानन अब तक अंधकारमय और शब्दहीन था। अब आलोकमय प्रातः काल मे
आनंदमय कानन के ‘आनंद-मठ’ सत्यानंद स्वामी मृगचर्म पर बैठे हुए संध्या कर रहे हैं। पास मे भी
जीवानंद बैठे हैं। ऐसे ही समय महेन्द्र को साथ में लिए हुए स्वामी भवानंद वहां उपस्थित हुए। ब्रह्मचारी
चुपचाप संध्या मे तल्लीन रहे, किसी को कुछ बोलने का साहस न हुआ। इसके बाद संध्या समाप्त हो जाने पर
भवानंद और जीवानंद दोनो ने उठकर उनके चरणो मे प्रणाम किया, पदधूलि ग्रहण करने के बाद दोनों बैठ
गए। सत्यानंद इसी समय भवानंद को इशारे से बाहर बुला ले गए। हम नही जानते कि उन लोगो मे क्या बाते
हुई। कुछ देर बाद उन दोनों के मंदिर मे लौट आने पर मंद-मंद मुसकाते हुए ब्रह्मचारी ने महेन्द्र से कहा-
‘‘बेटा! मैं तुम्हारे दुःख से बहुत दुःखी हूं। केवल उन्हीं दीनबंधु प्रभु की ही कृपा से कल रात तुम्हारी स्त्री और
कन्या को किसी तरह बचा सका।’’ यह उन्ही ब्रह्मचारी ने कल्याणी की रक्षा का सारा वृत्तांत सुना दिया। इसके
बाद उन्होंने कहा-‘'चलो वे लोग जहां हैं वही तुम्हे ले चले !’’
यह कहकर ब्रह्मचारी आगे-आगे और महेन्द्र पीछे देवालय के अंदर घुसे। प्रवेश कर महेन्द्र ने देखा- बड़ा ही
लंबा चौड़ा और ऊंचा कमरा है। इस अरुणोदय काल मे जबकि बाहर का जंगल सूर्य के प्रकाश मे हीरों के
समान चमक रहा हैं, उस समय भी इस कमरे मे प्रायः अंधकार है। घर के अंदर क्या है- पहले तो महेन्द्र यह
देख न सके, किंतु कुछ देर बाद देखते-देखते उन्हे दिखाई दिया कि एक विराट चतुर्भुज मूर्ति है, शंख-चक्र-
गदा-पद्मधारी, कौस्तुभमणि हृदय पर धारण किए, सामने घूमता सुदर्शनचक्र लिए स्थापित है। मधुकैटभ जैसी
दो विशाल छिन्नमस्तक मूर्तियां खून से लथपथ सी चित्रित सामने पड़ी हैं। बाएं लक्ष्मी आलुलायित-
कुंतला शतदल-मालामाणिडता, भयत्रस्त की तरह खड़ी हैं। दाहिने सरस्वती पुस्तक, वीणा और मूर्तिमयी राग-
रागिनी आदि से घिरी हुई स्तवन कर रही हैं। विष्णु की गोद मे एक मोहिनी मूर्ति-लक्ष्मी और सरस्वती से
अधिक सुंदरी, उनसे भी अधिक ऐश्वर्यमयी- अंकित हैं। गंधर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षसगण उनकी पूजा कर रहे हैं।
ब्रह्मचारी ने अतीव गंभीर, अतीव मधुर स्वर मे महेन्द्र से पूछा-‘‘सब कुछ देख रहे हो?’’
महेन्द्र ने उत्तर दिया-‘‘देख रहा हूं’’
ब्रह्मचारी-‘‘विष्णु की गोद मे कौन हैं, देखते हो?’’
महेन्द्र-‘‘देखा, कौन हैं वह?’’
ब्रह्मचारी -‘‘मां!’’
महेन्द्र -‘‘यह मां कौन है?’’
ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया -‘‘हम जिनकी संतान हैं। ’’
महेन्द्र -‘‘कौन हैं वह?’’
ब्रह्मचारी -‘‘समय पर पहचान जाओगे। बोलो, वंदे मातरम्! अब चलो, आगे चलो !’’
ब्रह्मचारी अब महेन्द्र को एक दूसरे कमरे मे ले गए। वहां जाकर महेंद्र ने देखा- एक अद्भुत शोभा-संपन्न,
सर्वाभरणभूषित जगद्धात्री की मूर्ति विराजमान है। महेन्द्र ने पूछा-‘‘यह कौन हैं?’’
ब्रह्मचारी-‘‘मां, जो वहां थी।’’
महेन्द्र-‘‘यह कौन हैं?’’
ब्रह्मचारी -‘‘इन्होने यह हाथी, सिंह आदि वन्य पशुओ को पैरो से रौंदकर उनके आवास-स्थान पर अपना

पद्मासन स्थापित किया। ये सर्वालंकार-परिभूषिता हास्यमयी सुंदरी है- यही बालसूर्य के स्वर्णिम आलोक आदि
ऐश्वर्यों की अधिष्ठात्री हैं- इन्हे प्रणाम करो !’’
महेंद्र ने भक्तिभाव से जगद्धात्री-रूपिणी मातृभूमि-भारतमाता को प्रणाम किया। तब ब्रह्मचारी ने उन्हे एक
अंधेरी सुरंग दिखाकर कहा-‘‘इस राह से आओ!’’ ब्रह्मचारी स्वयं आगे-आगे चले। महेंद्र भयभीत चित्त से
पीछे-पीछे चल रहे थे। भूगर्भ की अंधेरी कोठरी मे न जाने कहां से हलका उजाला आ रहा था। उस क्षीण
आलोक मे उन्हे एक काली मूर्ति दिखाई दी।
ब्रह्मचारी ने कहा-‘‘देखो अब मां का कैसा स्वरूप है !’’
महेंद्र ने कहा-‘‘काली?’’
ब्रह्मचारी-‘‘हां मां काली- अंधकार से घिरी हुई कालिमामयी समय हरनेवाली है इसीलिए नग्न है। आज देश
चारो तरफ श्मशान हो रहा है, इसलिए मां कंकालमालिनी हैं- अपने ‘शिव’ को अपने ही पैरो तले रौंद रही हैं।
हाय मां ! ब्रह्मचारी की आंखे से आंसू की धारा-बहने लगी।’’
ब्रह्मचारी -‘‘हमलोग संतान हैं। अपनी मां के हाथो मे अभी केवल अस्त्र रख दिए हैं। बोलो- वन्देमातरम् !‘‘
‘वन्देमातरम्- कहकर महेंद्र ने मां काली को प्रणाम किया।‘
अब ब्रह्मचारी ने कहा-‘‘इस राह से आओ !‘‘ यह कहकर वे दूसरी सुरंग मे चले। सहसा उन लोगो के
सामने प्रातः सूर्य की किरणे चमक उठी, चारो तरफ मधुर से पक्षी कूंज उठे। सामने देखा, एक संगमर्मर से
निर्मित विशाल मंदिर के बीच सुवर्ण-निर्मित दशभुज-प्रतिमा नव-अरूण की किरणा से ज्योतिर्मयी होकर हंस
रही हैं। ब्रह्मचारी ने प्रणाम कर कहा-‘‘ये हैं मां, जो भविष्यत मे उनका रूप होगा। इनके दशभुज दशो
दिशाओ मे प्रसारित हैं, उनमे नाना आयुधरूप मे नाना शक्तियां शोभित हैं। पैरो के नीचे शत्रु दबे हुए हैं, पैरो
के निकट वीर-केशरी भी शत्रु-पीड़न से मग्न है।’‘ दिक्भुजा-‘‘कहते-कहते सत्यानंद गद्गद् हो रोने लगे-
‘‘दिक्भुजा- नानाप्रहरणधारिणी, शत्रुविमर्दिनी, वीरेन्द्रपृष्ठविहारिणी, दाहिने लक्ष्मी भाग्यरूपिणी, बाएं वाणी
विद्याविज्ञानदायिनी- साथ मे शक्ति के आधार कार्तिकेय, कार्यसिद्धिरूपी गणेश- आओ, हम दोनो मां को प्रणाम
करे !‘‘ इस पर दोनो ही हाथ जोड़कर माता का रूप निहारते हुए प्रार्थना करने लगे-
‘‘सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते ॥‘‘
दोनो के भक्ति-भाव से प्रणाम कर चुकने के बाद, भरे हुए गले से महेंद्र ने पूछा-‘‘ मां की ऐसी मूर्ति कब
देखने को मिलेगी?‘‘
ब्रह्मचारी ने कहा -‘‘जिस दिन मां की सारी सन्ताने एक साथ मां को बुलाएंगी, उसी दिन मां प्रसन्न होगी।‘‘
एकाएक महेंद्र ने पूछा -‘‘मेरी स्त्री-कन्या कहां हैं ?‘‘
ब्रह्मचारी-‘‘चलो, देखोगे? चलो !‘‘
महेंद्र -‘‘उन लोगो से भी एक बार मैं मिलूंगा, इसके बाद उन्हे बिदा कर दूंगा।‘‘.........
ब्रह्मचारी-‘‘क्यो बिदा करोगे?‘‘
महेंद्र -‘‘मै भी यह महामंत्र ग्रहण करूंगा!‘‘
ब्रह्मचारी -‘‘उन्हे कहां विदा करोगे?‘‘
महेंद्र ने विचारकर कहा-‘‘मेरे घर पर कोई नही है, मेरा दूसरा कोई स्थान भी नही है। इस महामारी के समय

और कहां स्थान मिलेगा।'
ब्रह्मचारी-''जिस राह से यहां आये हो, उसी राह से मंदिर से बाहर जाओ! मंदिर के दरवाजे पर तुम्हे स्त्री-
कन्या दिखाई देगी। कल्याणी अभी तक निराहार है। जहां वे दोनों बैठी है वही भोजन की सामग्री पाओगे। उसे
भोजन कराके तुम्हारी जो इच्छा हो करना। अब हम लोगो में से किसी से कुछ देर मुलाकात न होगी। यदि
तुम्हारा मन इधर होगा तो समय पर मै तुमसे मिलूंगा।''
इसके बाद ही किसी तरह से एकाएक ब्रह्मचारी अंतर्हित हो गए। महेंद्र ने पूर्व-परिचित राह से लौटकर
देखा- नाट्य मंदिर मे कल्याणी कन्या को लिए हुए बैठी है।
इधर सत्यानंद एक दूसरी सुरंग मे जाकर एक अकेली भूगर्भस्थित कोठरी मे उतर पड़े। वहां जीवानन्द और
भुवानंद बैठे हुए रुपये गिन-गिनकर रख रहे थे। उस कमरे मे ढेरो सोना, चांदी, तांबा, हीरे, मोती, मूंगे रखे हुए
थे। गत रात खजाने की लूट का माल ये लोग गिन-गिनकर रख रहे थे।
सत्यानंद ने कमरे मे प्रवेश कर कहा-''जीवानंद! महेंद्र हमारे साथ आएगा। उसके आने से संतानो का
विशेष कल्याण होगा। कारण आने से उसके पूर्वजो का संचित धन मां की सेवा मे अर्पित होगा। लेकिन जब
तक वह तन-मन-वचन से मातृभक्त न हो, तब तक उसे ग्रहण न करना। तुम लोगो के हाथ का काम समाप्त होने
पर तुम लोग भिन्न-भिन्न समय मे उसका अनुसरण करना, उचित समय पर उसे श्रीविष्णुमंडप मे उपस्थित
करना, और समय हो या कुसमय हो, उन लोगो की रक्षा अवश्य करना। कारण, जैसे दुष्टो का दमन और दलन
संतानो का धर्म है, वैसे ही शिष्टो की रक्षा करना भी संतानो का धर्म है!''
अनेक दुःखों के बाद महेंद्र और कल्याणी मे मुलाकात हुई। कल्याणी रोकर पछाड़ खा गिरी। महेंद्र और भी
रोए। रोने-गाने के बाद आंखो के पोछने की धूम मच गई। जितने बार आंखे पोंछी जाती थी, उतनीही बार
आंसू आ जाते थे। आंसू बंद करने के लिए कल्याणी ने भोजन की बात उठाई। ब्रह्मचारीजी के अनुचर जो
खाना रख गए थे, कल्याणी ने उसे खाने के लिए महेंद्र से कहा। दुर्भिक्ष के दिनो मे इधर अन्न भोजन की कोई
संभावना नही थी, फिर भी आसपास जो कुछ है, संतानो के लिए वह सुलभ है। वह जंगल साधारण मनुष्यो के
लिए अगम्य है जहां जिस वृक्ष मे जो फल होते है, उन्हे भूखे लोग तोड़कर खाते है, किंतु इस अगम्य वन के
वृक्षो का फल कोई नही पाता इसलिए ब्रह्मचारी के अनुचर ढेरो फल और दूध लाकर रख जाने में समर्थ हुए।
संन्यासीजी की सम्पत्ति मे अनेक गौएं भी है। कल्याणी के अनुरोध पर महेंद्र ने पहले कुछ भोजन किया, इसके
बाद बचा हुआ भोजन अकेले मे बैठकर कल्याणी ने खाया। उन लोगों ने थोड़ा दूध कन्या को पिलाया, बाकी
बचा हुआ रख लिया- फिर पिलाने की आशा ही तो माता-पिता का संतान के प्रति धर्म है। इसके बाद थकावट
और भोजन के कारण दोनों ने निंद्राभिभूत होकर आराम किया।
नीद से उठने के बाद दोनो विचार करने लगे-''अब कहां चलना चाहिए?'' कल्याणी ने कहा-''घर पर
विपद की संभावना समझकर हमने गृहत्याग किया था, लेकिन अब देखती हूं कि घर से भी अधिक कष्ट बाहर
है। न हो तो चलो, घर ही लौट चले!'' महेंद्र की भी यही इच्छा थी। महेंद्र की इच्छा है कि कल्याणी को घर
पर बैठाकर, कोई एक विश्वासी अभिभावक नियुक्त कर, इस परमरमणीय, अपार्थिव पवित्र मातृसेवा-व्रत को
ग्रहण करेगे। अतः इस बात पर वे सहज ही सहमत हो गए। अब दोनो ही प्राणियो ने थकावट दूर होने पर कन्या
को गोद मे लेकर फिर पदचिन्ह की तरफ यात्रा की।
किंतु पदचिन्ह जाने के लिए किस राह से जाना होगा- उस दुर्भेद्य वन मे वे कुछ भी समझ न सके। उन्होने
समझा था कि जंगल पार होते ही हमे राह मिल जाएगी और पदचिन्ह पहुंच सकेगे। लेकिन वहां तो बन का ही
थाह नही लगता है। बहुत देर तक वे लोग वन के अंदर इधर-उधर चक्कर लगाते रहे और बार-बार घूम-फिरकर

वे लोग मठ मे ही पहुंच जाते थे। उन्हे जंगल से पार होनेवाली राह मिलती ही न थी। यह देखते हुए सामने एक
वैष्णव वेशधारी खड़े हंस रहे थे। यह देखकर महेद्र ने रुष्ट होकर उनसे कहा-‘‘गोस्वामी! खड़े-खड़े हंसते
क्यो हो?’’
गोस्वामी बोले-‘‘तुमलोग इस वन मे आए कैसे?’’
महेद्र बोले-‘‘जैसे भी हो आ ही गए है!‘‘
गोस्वामी-‘‘प्रवेश कर सके तो बाहर क्यो नही निकल पाते हो?‘‘ यह करकर वैष्णव फिर हंसने लगे।
महेद्र ने वैसे ही रुष्ट स्वर में कहा-‘‘हंसते तो हो, लेकिन क्या तुम इसके बाहर निकल सकते हो?‘‘
वैष्णव ने कहा-‘‘मेरे साथ आओ, मै राह बता देता हूं। अवश्य ही तुम लोग ब्रह्मचारीजी के संग आए होगे,
अन्यथा न तो कोई यहां आ सकता है, न निकल ही सकता है। अपरिचितो के लिए यह भूल-भुलैया है।‘‘
यह सुनकर महेद्र ने कहा-‘‘आप भी सन्तान है?‘‘
वैष्णव ने कहा-‘‘हां, मैं भी सन्तान हूं। मेरे साथ आओ। तुम्हे राह दिखाने के लिए ही मैं यहां खड़ा हूं।‘‘
महेद्र ने पूछा -‘‘आपका नाम क्या है?‘‘
वैष्णव ने उत्तर दिया-‘‘मेरा नाम धीरानंद स्वामी है।‘‘
यह कहकर धीरानंद आगे-आगे चले और कल्याणी के साथ महेद्र पीछे-पीछे। धीरानंद ने एक बड़ी सी
दुर्गम राह से उन्हे जंगल के बाहर कर दिया और आगे की राह बता दी। इसके बाद वे फिर जंगल मे पलटकर
गायब हो गए।
आनंद-वन से बाहर निकल आने पर कुछ दूर तक राह चलने मे तो जंगल उनके एक बाजू रहा। जंगल की
बगल से ही शायद वह राह गई है। एक जगह जंगल मे से ही एक छोटी नदी कलकल कर बहती है। जल बहुत
ही साफ है, लेकिन देखने पर जंगल की छाया से जल भी काला दिखाई देता है। नदी के दोनो बाजू सघन
बड़े-बड़े वृक्ष मनोरम छाया किए हुए है, विभिन्न पक्षी उन पेड़ो पर बैठे कलरव कर रहे है। उनका कलरव-
कूजन, नदी की कलकल-ध्वनि से मिलकर अपूर्व श्रुतिमधुर जान पड़ता है। वैसे ही वृक्ष के रंग से नदी-जल
का रंग भी वैसा ही झलक रहा है। कल्याणी का मन भी शायद उस रंग मे मिल गया। कल्याणी नदी तट के एक
वृक्ष से लगकर बैठ गई। उन्होने अपने पति को भी बैठने को कहा। कल्याणी अपने पति के हाथो को अपने
हाथो मे लिए बैठी रही। फिर बोली-‘‘तुम्हे आज बहुत उदास देखती हूं। विपद जो आयी थी, उससे तो उद्धार
मिल गया है, अब इतना दुःख क्यो?‘‘
महेद्र ने एक ठंढी सांस लेकर कहा-‘‘मै अब अपने आपे मे नही हूं। मैं क्या करूं- कुछ समझ मे नही
आता।‘‘.....
कल्याणी-‘‘क्यो?‘‘
महेद्र-‘‘तुम्हारे खो जाने पर मेरा क्या हाल हुआ, सुनो!‘‘......
यह कहकर महेद्र ने अपनी सारी कहानी सविस्तार वर्णन कर दी।
कल्याणी ने कहा-‘‘मुझे भी बड़ी विपदो का सामना करना पड़ा, बहुत तकलीफ उठाई। तुम उन्हे सुनकर
क्या करोगे! इतने दुःखो पर भी मुझे कैसे नीद आई थी, कह नही सकती- कल आखिर रात भी मैं सोई थी।
नीद मे मैंने स्वप्न देखा। देखा- नही कह सकती, किस पुण्यबल से मैं एक अपूर्व स्थान मे पहुंच गई हूं। वहां
मिट्टी नही है, केवल प्रकाश- अति शीतल- बादल हट जाने पर जैसा प्रकाश रहता है, वैसा ही प्रकाश! वहां
मनुष्य नही थे, केवल प्रकाशमय मूर्तियां थी, वहां शब्द नही होता था, केवल दूर अपूर्व संगीत जैसी ध्वनि
सुनाई पड़ती थी। सदाबहार मल्लिका-मालती-गंधराज की अपूर्व सुगंध फैली थी। वहां सबसे ऊंचे दर्शनीय

स्थान पर कोई बैठा था, मानो आग मे तपा हुआ नील-कमल धधकता हुआ बैठा हो। उसके माथे पर सूर्य के
प्रकाश जैसा मुकुट था; उसके चार हाथ थे। उसके दोनो बाजू कौन था, मै पहचान न सकी, लेकिन कोई स्त्री-
मूर्ति थी। लेकिन उनमे इतनी ज्योति, इतना रूप, इतना सौरभ था कि मै उधर देखते ही विह्वल हो गई- उधर
ताक न सकी, देख न सकी कि वे कौन है? उन्ही चतुर्भुज के सामने एक स्त्री और खड़ी थी- वह भी
ज्योतिर्मयी थी, लेकिन चारो तरफ मेघ जैसा छाया था, आभा पूरी तरह दिखाई नही देती थी। अस्पष्ट रूप मे
जान पड़ता था कि वह नारीमूर्ति अति दुर्बल, मर्मपीड़ित, अनन्य-सुंदरी, लेकिन रो रही है। वहां के मंद-सुगंध
पवन ने मानो मुझे घुमाते-फिराते वहां चतुर्भुज मूर्ति के सामने ला खड़ा किया। उस मेघमंडिता दुर्बल स्त्री ने
मुझे देखकर कहा- यही है, इसी के कारण महेंद्र मेरी गोद मे आता नही है।‘........
इसके बाद ही एक अपूर्व वंशी जैसी मधुर ध्वनि सुनाई पड़ी। वह शब्द उन चतुर्भुज का था, उन्होने मुझे
कहा-‘‘तुम अपने पति को छोड़कर मेरे पास चली आओ! यह तुम लोगो की मां है महेंद्र इसकी सेवा करेगा।
तुम यदि पति के पास रहोगी तो वह इनकी सेवा न कर सकेगा। तुम चली जाओ।‘ मैंने रोकर कहा-‘‘पति को
छोड़कर मैं कैसे चली आऊं?‘‘ इसके बाद ही फिर उसी अपूर्व स्वर में उन्होने कहा-‘‘मै ही स्वामी, मै ही
पुत्र, मैं ही माता, मैं ही पिता और मैं ही कन्या हूं, मेरे पास आओ!‘‘ ‘‘मैंने क्या उत्तर दिया, मुझे याद नही,
लेकिन इसके बाद ही नीद खुल गई।‘‘ यह कहकर कल्याणी चुप हो रही।
महेंद्र विस्मित, स्तम्भित होकर चुप हो रहे। ऊपर पेड़ पर कोई पक्षी बोल उठा, पपीहा अपनी बोली से आकाश
गुंजाने लगा, कोकिल सप्त-स्वरो मे गाने लगी, भृंगराज की झनकार से जंगल गूंज उठा। पैरो के नीचे तरिणी
मृदु कल्लोल कर रही थी। बहुतेरे वन्य पुष्पो के सौरभ से मन हरा हो रहा था। कही-कही नदी-जल को सूर्य-
रश्मि चमका रही थी। कही ताड़ के पत्ते हवा के झोके से मरमरा रहे थे। दूर नीली पर्वत-श्रेणी दिखाई पड़ रही
थी। दोनो ही जन मुग्ध-नीरव हो यह सब देखते रहे। बहुत देर बाद कल्याणी ने फिर पूछा-‘‘क्या सोच रहे
हो?‘‘
महेंद्र-‘‘यही सोचता हूं कि क्या करना चाहिए? यह स्वप्न केवल विभीषिका मात्र है, अपने ही हृदय मे पैदा
होकर अपने ही मे लीन हो जाता है। चलो, घर चले!‘‘
कल्याणी-‘‘जहां ईश्वर तुम्हे जाने को कहते हैं, तुम वही जाओ!‘‘
यह कहकर कल्याणी ने कन्या अपने पति की गोद मे दे दी। महेंद्र ने उसे अपने गोद मे लेकर पूछा-‘‘और
तुम......तुम कहां जाओगी?‘‘
कल्याणी अपने दोनो हाथो से दोनो आंखो को ढंके हुए, साथ ही मस्तक पकड़े हुए बोली-‘‘मुझे भी
भगवान ने जहां जाने को कहा है वही जाऊंगी।‘‘
महेंद्र चौंक उठे। बोले-‘‘वहां कहां? कैसे जाओगी?‘‘
कल्याणी ने अपने पास की वही जहर की डिबिया दिखाई।
महेंद्र ने डरते हुए भौंचक्क होकर कहा-‘‘यह क्या? जहर खाओगी?‘‘
कल्याणी-‘‘मन मे तो सोचा था, खाऊंगी, लेकिन......‘‘
कल्याणी चुप होकर विचार मे पड़ गई, महेंद्र उसका मुं ह ताकते रहे- प्रति निमेष वर्ष-सा प्रतीत होने
लगा। उन्होने देखा कि कल्याणी ने बात पूरी न कही, अतः बोले-‘‘लेकिन के बाद आगे क्या कह रही थी?‘‘
कल्याणी-‘‘मन मे था कि खाऊंगी, लेकिन तुम्हे छोड़कर, सुकुमारी कन्या को छोड़कर बैकुंठ जाने की भी
मेरी इच्छा नही होती। मैं न मरूंगी!‘‘
यह कहकर कल्याणी ने विष की डिबिया जमीन पर रख दी। इसके बाद दोनो ही पी-पुरुष भूत-भविष्य की

अनेक बाते करने लगे। बातें करते हुए दोनो ही अन्यमनस्क हो उठे। इसी समय खेलते-खेलते सुकुमारी कन्या
ने विष की डिबिया उठा ली। उसे किसी ने न देखा।
सुकुमारी ने मन में सोचा कि बढ़िया खेलने की चीज है। उसने इस डिबिया को एक बार बाएं हाथ मे लेकर
दाहिने हाथ से खीचा। इसके बाद दाहिने हाथ से पकड़कर बाएं हाथ से खीचा। इसके बाद दोनो हाथो से उसे
खींचना शुरू किया। फल यह हुआ कि डिबिया खुल गई, उसमे से जहर की टिकिया बाहर गिर पड़ी।
बाप के कपड़े के ऊपर वह टिकिया गिरी- सुकुमारी ने उसे देखा, मन मे सोचा, कि यह एक दूसरी खेलने
की चीज है डिबिया के दोनो ढक्कन उसने छोड़ दिए और उस टिकिया को उठा लिया।
डिबिया को सुकुमारी ने मुंह मे क्यो नही डाला, नही कहा जा सकता। लेकिन टिकिया मे उसने जरा भी
विलम्ब न किया? ‘'प्रसिमात्रेण भोक्तव्य'’-- सुकुमारी ने उस जहर की टिकिया को मुंह मे डाल लिया।
‘‘क्या खाया? अरे क्या खाया? गजब हो गया!‘‘.....
झद्द्रयह कहती हुई कल्याणी ने कन्या के मुंह मे उंगली डाल दी। उसी समय दोनो ने देखा कि विष की
डिबिया खाली पड़ी हुई है। सुकुमारी ने सोचा कि यह भी खेल की चीज है, अतः उसने उसे दांतो से दबा
लिया और माता का मुंह देखकर मुस्कराने लगी। लेकिन जान पड़ता है, इसी समय जहर का कड़वा स्वाद उसे
मालूम पड़ा और उसने मुंह बिगाड़कर खोल दिया- वह टिकिया दांतो मे चिपकी हुई थी। माता ने तुरंत निकाल
कर उसे जमीन पर फेक दिया। लड़की रोने लगी।
टिकिया उसी तरह पड़ी रही। कल्याणी तुरंत नदी-तट पर जाकर अपना आंचल भिगो लाई और लड़की के
मुंह मे जल देकर उसने धुलवा दिया। बड़ी ही कातर वाणी से कल्याणी ने महेन्द्र से पूछा-‘‘क्या कुछ पेट मे
गया होगा?‘‘
बुरी बात ही मां-बाप के मुंह से पहले निकलती है- जहां अधिक प्रेम होता है, वहां भय भी बहुत अधिक होता
है। महेन्द्र ने यह कभी देखा न था कि टिकिया पहले कितनी बड़ी थी। अब उन्होने टिकिया अपने हाथ मे
उठाकर मजे मे उसे देखकर कहा-‘‘मालूम तो होता है कि कुछ खा गई है।‘‘
कल्याणी को कुछ ऐसा ही विश्वास हुआ। टिकिया हाथ मे लेकर बहुत देर तक वह भी उसकी जांच करती
रही। इधर कन्या ने दो-एक घूंट रस जो चूस लिया था, उससे उसकी दशा बिगड़ने लगी- वह छटपटाने लगी,
रोने लगी, अंत मे कुछ बेहोश सी हो पड़ी। तब कल्याणी ने पति से कहा-‘‘अब क्या देखते हो? जिस राह पर
भगवान ने बुलाया है, उसी राह पर सुकुमारी चली, मुझे भी वही राह लेनी पड़ेगी।‘‘
यह कहकर कल्याणी ने उस टिकिया को उठाकर मुंह मे डाल लिया और एक क्षण मे निगल गई।
महेन्द्र रोने लगे-‘'क्या किया, कल्याणी! अरे तुमने यह क्या किया है?‘‘.........
कल्याणी ने कोई उत्तर न देकर पति के पैरो की धूलि माथे लगाई, फिर बोली-‘‘प्रभु! बात बढ़ाने से बात
बढ़ेगी......मै चली।‘‘
‘‘कल्याणी! यह क्या किया?‘‘- कहकर महेन्द्र चिल्लाकर रोने लगे।
बड़े ही धीमे स्वर मे कल्याणी बोली-‘‘मैने अच्छा ही किया है, इस नाचीज औरत के पीछे तुम अपनी
मातृभूमि की सेवा से वंचित रहते। देखो मैं देववाक्य का उल्लंघन कर रही थी, इसलिए मेरी कन्या गई। थोड़ी
और अवहेलना करने से तुम पर विपत्ति आती।‘‘
महेन्द्र ने रोते हुए कहा-‘‘अरे, तुम्हे कही बैठाकर मैं चला जाता, कल्याणी!- कार्य सिद्ध हो जाने पर फिर
हम लोग मिलकर सुखी होते। कल्याणी! मेरी सर्वस्व! तुमने यह क्या!! जिस भुजा के बल पर मैं तलवार
पकड़ता, हाय! तुमने वही भुजा काट दी। तुम्हे खोकर मैं क्या रह पाऊंगा।‘‘.......

कल्याणी-“कहां मुझे ले जाते?- कहां स्थान है? मां-बाप, सगे-संबंधी सब इस दुर्दिन मे चले गए है।
किसके घर मे जगह है, कहां जाने का विचार है? कहां ले जाओगे? मैं कालग्रह हूं- मैने मरकर अच्छा ही
किया है ! मुझे आशीर्वाद दो, मैं उस आलोकमय लोक मे जाकर तुम्हारी प्रतीक्षा मे रहूं और फिर तुम्हे पाउं।”
यह कहकर कल्याणी ने फिर स्वामी का पदरेणु ग्रहण किया। महेंद्र कोई उत्तर न देकर रोते ही रहे। कल्याणी
फिर अति मृदु, अति मधुर, अतीव स्नेहमय कंठ से बोली-“देखो, देवताओं की इच्छा, किसकी मजाल है कि
उसका उल्लंघन कर सके ! मुझे जाने की आज्ञा उन्होने दी है, तो क्या मैं किसी तरह भी रुक सकती हूं? मैं स्वयं
न मरती तो कोई मार डालता ! मैं ने आत्महत्या कर अच्छा ही किया है। तुमने देशोद्धार का जो व्रत लिया है, उसे
तन-मन-धन से पूरा करो- इसी मे तुम्हे पुण्य होगा- इसी पुण्य से मुझे भी स्वर्गलाभ होगा। हम दोनो ही
साथ-साथ अक्षय स्वर्गसुख का उपभोग करेंगे।”
इधर बालिका एक बार दूध की उल्टी कर सम्भलने लगी। उसके पेट मे जिस परिमाण मे विष गया था, वह
घातक नही था। लेकिन महेंद्र का ध्यान उस समय उधर न था। उन्होने कन्या को कल्याणी की गोद मे दे दोनो
का प्रगाढ़ अलिंगन कर फूट-फूटकर रोना शुरू किया। उसी समय वन मे से मधुर किंतु मेघ-गंभीर शब्द सुनाई
पड़ने लगा-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !
गोपाल गोविंद मुकुंद शौरे !”
उस समय कल्याणी पर विष का प्रभाव हो रहा था, चेतना कुछ लुप्त हो चली थी। उन्होने अवचेतन मन से
सुना, मानो वैकुण्ठ से यह अपूर्व ध्वनि उभरकर गूंज रही है-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !
गोपाल गोविंद मुकुंद शौरे !”
तब कल्याणी ने अप्सरानिंदित कंठ से बड़े ही मोहक स्वर मे गाया-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”
वह महेंद्र से बोली- “कहो हरे मुरारे मधुकैटभारे !”
वन मे गूंजने वाले मधुर स्वर और कल्याणी के मधुर स्वर पर विमुग्ध होकर कातर हृदय से एक मात्र ईश्वर
को ही सहाय समझाकर महेंद्र ने भी पुकारा-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”........
तब मानो चारो तरफ से ध्वनि होने लगी--
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
और मानो वृक्ष के पत्तो से भी आवाज निकलने लगी-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
नदी के कलकल ध्वनि मे भी वही शब्द हुआ-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
अब महेंद्र अपना शोक संताप भूल गए, उन्मत्त होकर वे कल्याणी के साथ एक स्वर से गाने लगे-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
जंगल मे से भी उसके स्वर से मिली हुई वाणी निकली-
“हरे मुरारे मधुकैटभारे !”.......
कल्याणी का कंठ क्रमशः क्षीण होने लगा, फिर भी वह पुकार रही थी-

‘‘हरे मुरारे मधुकैटभारे!‘‘........
इसके बाद ही उसका कंठ क्रमशः निस्तब्ध होने लगा, कल्याणी के मुंह से अब शब्द नही निकलता- आंखें
ढंक गई, अंग शीतल हो गए। महेंद्र समझ गए कि कल्याणी ने ‘‘हरे मुरारे‘‘ कहते हुए बैकुंठ प्रयाण किया।
इसके बाद ही पागलों की तरह उच्च स्वर से वन को कम्पित करते हुए पशु-पक्षियों को चौंकाते हुए महेंद्र
पुकारने लगे-
‘‘हरे मुरारे मधुकैटभारे!‘‘........
इसी समय किसी ने आकर उनका अलिंगन किया और उसी स्वर मे वह भी कहने लगा-
‘‘हरे मुरारे मधुकैटभारे!‘‘........
तब उस अनंत ईश्वर की महिमा से, उस अनंत वन में अनंत पथगामी शरीर के सामने दोनो जन अनंत नाम-
स्मरण करने लगे। पशु-पक्षी नीरव थे, पृथ्वी अपूर्व शोभामयी थी- इस परम पावन गीत के उपयुक्त मंदिर था
वह। सत्यानंद महेंद्र को बांहो मे संभाल कर बैठ गए।
इधर राजधानी की शाही राहो पर बड़ी हलचल उपस्थित हो गई। शोर मचने लगा कि नवाब के यहां से जो
खजाना कलकत्ते आ रहा था, संन्यासियों ने मानकर सब छीन लिया। राजाज्ञा से सिपाही और बल्लमटेर
संन्यासियो को पकड़ने के लिए छूटे। उस समय दुर्भिक्ष-पीड़ित प्रदेश मे वास्तविक संन्यासी रह ही न गए थे।
कारण, वे लोग भिक्षाजीवी ठहरे, जनता स्वयं खाने को नही पाती तो उन्हे वह कैसे दे सकती है? अतएव जो
असली संन्यासी भिक्षुक थे, वे लोग पेट की ज्वाला से व्याकुल होकर काशी-प्रयाग चले गए थे। आज ये
हलचल देखकर कितनो ने ही अपना संन्यासी वेष त्याग दिया। राज्य के भूखे सैनिक, संन्यासियो को न पाकर
घर-घरमे तलाशी लेकर खाने और पेट भरने लगे। केवल सत्यानन्द ने किसी तरह भी अपने गैरिक वस्त्रो का
परित्याग न किया।
उसी कल्लोलवाहिनी नदी-तट पर, शाही राह के बगल मे पही पेड़ के नीचे कल्याणी पड़ी हुई है। महेंद्र और
सत्यानंद परस्पर अलिंगनबद्ध होकर आंसू बहाते हुए भगवन्नाम-उच्चारण मे लगे हुए हैं। उसी समय एक
जमादार सिपाहियो का दल लिए हुए वहां पहुंच गया। संन्यासी के गले पर एक बारगी हाथ ले जाकर जमादार
बोला-‘‘यह साला संन्यासी है!‘‘
इसी तरह एक दूसरे ने महेंद्र को पकड़ा। कारण, जो संन्यासी का साथी है वह अवश्य संन्यासी होगा। तीसरा
एक सैनिक घास पर पड़े हुए कल्याणी के शरीर की तरफ लपका- उसने देखा की औरत मरी हुई है, संन्यासी न
होने पर भी हो सकती है। उसने उसे छोड़ दिया। बालिका को भी यही सोच कर उसने छोड़ दिया। इसके बाद
उन सबने और कुछ न कहा, तुरंत बांध लिया और ले चले दोनो जन को। कल्याणी की मृत देह और कन्या
बिना रक्षक के पेड़ के नीचे पड़ी रही। पहले तो शोक से अभिभूत और ईश्वर के प्रेम मे उन्मत्त हुए महेंद्र प्रायः
विचेतन अवस्था मे थे- क्या हो रहा था, क्या हुआ- इसे वह कुछ समझ न सके। बंधन मे भी उन्होने कोई
आपत्ति न की। लेकिन दो-चार कदम अग्रसर होते ही वे समझ गए कि ये सब मुझे बांध लिए जा रहे हैं-
कल्याणी का शरीर पड़ा हुआ है, उसका अंतिम संस्कार नही हुआ- कन्या भी पड़ी हुई है। इस अवस्था मे उन्हे
हिंस्र पशु खा जा सकते हैं। मन मे यह भाव आते ही महेंद्र के शरीर मे बल आ गया और उन्होने कलाइयो को
मरोड़कर बंधन को तोड़ डाला। फिर पास मे चलते जमादार को इस जोर की लात लगायी कि वह लुड़कता
हुआ दस हाथ दूर चला गया। तब उन्होने पास के एक सिपाही को उठाकर फेका। लेकिन इसी समय पीछे के
तीन सिपाहियो ने उन्हे पकड़कर फिर विवश कर दिया। इस पर दुःख से कातर होकर महेंद्र ने संन्यासी से

कहा-‘‘आप जरा भी मेरी सहायता करते, तो मैं इन पांचो दुष्टो को यमद्वार भेज देता।‘‘
सत्यानंद ने कहा-‘‘मेरे इस बूढ़े शरीर मे बल ही कहां है? मैं तो जिन्हे बुला रहा हूं, उनके सिवा मेरा कोई
सहारा नही है। जो होना है- वह होकर रहेगा, तुम विरोध न करो। हम इन पांचो को पराजित कर न सकेगे।
देखे, ये हमें कहां ले जाते हैं......... भगवान् हर जगह रक्षा करेगे!‘‘
इसके बाद इन लोगो ने मुक्ति की फिर कोई चेष्टा न की, चुपचाप सिपाहियो के पीछे-पीछे चलने लगे। कुछ
दूर जाने पर सत्यानंद ने सिपाहियो से पूछा-‘‘बाबा! मैं तो हरिनाम कह रहा था, क्या भगवान का नाम लेने मे
भी कोई बाधा है?‘‘ जमादार समझ गया कि सत्यानंद भले आदमी हैं। उसने कहा-‘‘तुम भगवान का नाम लो,
तुम्हे रोकूंगा नही। तुम वृद्ध ब्रह्मचारी हो, शायद तुम्हारे छुटकारे का हुक्म हो जाएगा। मगर यह बदमाश फांसी
पर चढ़ेगा!‘‘
इसके बाद ब्रह्मचारी मृदु स्वर से गाने लगे-
‘‘धीर समीरे तटिनी तीरे बसति बने बनबारी।
मा कुरु धनुर्धर गमन विलम्बनमतिविधुरा सुकुमारी ॥........‘‘
इत्यादि।
नगर मे पहुंचने पर वे लोग कोतवाल के समीप उपस्थित किए गए। कोतवाल ने नवाब के पास इत्तिला
भेजकर संप्रति उन्हे फाटक के पास की हवालात मे रखा। वह कारागार अति भयानक था, जो उसमे जाता था,
प्रायः बाहर नही निकलता था, क्योकि कोई विचार करने वाला ही न था। वह अंग्रेजो के जेलखाना नही था
और न उस समय अंग्रेजो के हाथ मे न्याय था। आज कानूनो का युग हैं- उस समय अनियम के दिन थे।
कानून के युग से जरा तुलना तो करो !
रात हो गई। कारागार मे कैद सत्यानंद ने महेद्र से कहा-‘‘आज बड़े आनंद का दिन है। कारण, हम लोग
कारागार मे कैद है। कहो-‘‘हरे मुरारे!‘‘
महेंद्र ने बड़े कातर स्वर मे कहा-‘‘हरे मुरारे!‘‘
सत्यानंद-‘‘कातर क्यो होते हो, बेटे! तुम्हारे इस महाव्रत को ग्रहण करने पर तुम्हे स्त्री-कन्या का त्याग तो
करना ही पड़ता, फिर तो कोई संबंध रह न जाता।........‘‘
महेंद्र-‘‘त्याग एक बात है, यमदण्ड दूसरी बात! जिस शक्ति के सहारे मैं यह व्रत ग्रहण करता, वह शक्ति मेरी
स्त्री-कन्या के साथ ही चली गई।‘‘
सत्यानंद-‘‘शक्ति आएगी- मैं शक्ति हूं! महामंत्र से दीक्षित होओ, महाव्रत ग्रहण करो।‘‘ महेंद्र ने विरक्त होकर
कहा-‘‘मेरी स्त्री और कन्या को स्यार और कुत्ते खाते होगे- मुझसे किसी व्रत की बात न कहिए!‘‘
सत्यानंद-‘‘इस बारे मे चिंता मत करो! संतानो ने तुम्हारी स्त्री की अन्त्येष्टि क्रिया करके तुम्हारी लड़की को
उपयुक्त स्थल मे रख छोड़ा है।‘‘
महेंद्र विस्मित हुए, उन्हे इस बात पर जरा भी विश्वास न हुआ। उन्होने पूछा-‘‘आपने कैसे जाना? आप तो
बराबर मेरे साथ हैं।‘‘
सत्यानंद-‘‘हम महामंत्र से दीक्षित हैं- देवता हमारे प्रति दया करते हैं। आज रात को तुम यह संवाद सुनोगे
और आज ही तुम कैदखाने से छूट भी जाओगे।‘‘
महेंद्र कुछ न बोला। सत्यानंद ने समझ लिया कि महेंद्र को मेरी बातो का विश्वास नही होता। तब सत्यानंद
बोले-‘‘तुम्हे विश्वास नही होता? परीक्षा करके देखो!‘‘ यह कहकर सत्यानंद कारागार के द्वार तक आए। क्या

किया, यह महेंद्र को कुछ मालूम न हुआ, पर यह जान गए कि उन्होने किसी से बातचीत की है। उनके लौट
आने पर महेंद्र ने पूछा-“क्या परीक्षा करूं?”
सत्यानंद-“तुम अभी कारागार से मुक्ति-लाभ करोगे?”
उसके यह बात कहते-कहते कारागार का दरवाजा खुल गया। एक व्यक्ति ने घर के भीतर आकर कहा-“महेंद्र
किसका नाम है?”
महेंद्र ने उत्तर दिया-“मेरा नाम है।”
आगंतुक ने कहा-“तुम्हारी रिहाई का हुक्म हुआ है, तुम जा सकते हो।”
महेंद्र पहले तो आश्चर्य मे आए। फिर सोचा, झूठी बात है। अतः परीक्षार्थ वे बाहर आए। किसी ने उनकी
राह न रोकी। महेंद्र शाही सड़क तक चले गए।
इस अवसर पर आगन्तुक ने सत्यानंद से कहा-“महाराज! आप क्यो नही जाते? मैं आपके लिए ही आया
हूं।”
सत्यानंद-“तुम कौन हो? गोस्वामी धीरानंद?”
धीरानंद -“जी हां!”
सत्यानंद-“प्रहरी कैसे बने?”
धीरानंद-“भवानन्द ने मुझे भेजा है। मैं नगर मे आने के बाद और यह सुनकर कि आप इस कारागार मे है,
अपने साथ धतूरा मिली थोड़ी विजया ले आया था। यहां पहरे पर जो खां साहब थे, वह उसके नशे में जमीन
पर पड़े सो रहे है। यह जमा-जोड़ा, पगड़ी, भाला जो कुछ मैंने पाया है, यह सब उन्हीं का है।”
सत्यानंद-“तुम यह सब पहले हुए नगर के बार चले आओ। मैं इस तरह न आऊंगा।”
धीरानंद-“लेकिन......ऐसा क्यो?”
सत्यानंद-“आज सन्तान की परीक्षा है।”
महेंद्र वापस आ गए। सत्यानंद ने पूछा-“वापस क्यो आ गए?”
महेंद्र-“आप निश्चय ही सिद्ध पुरुष हैं। लेकिन मैं आपका साथ छोड़कर न आऊंगा।”
सत्यानंद-“ठीक है! हम दोनो ही आज रात दूसरी तरह से बाहर होगे।”
धीरानंद बाहर चले गए। सत्यानंद और महेंद्र कारागार मे ही रहे।
ब्रह्मचारी का गाना बहुतो ने सुना। और लोगो के साथ जीवानंद के कानो मे भी वह गाना पहुंचा।
महेंद्र की रक्षा मे रहने का उन्हे आदेश मिला था- यह पाठको को शायद याद होगा। राह मे एक स्त्री से
मुलाकात हो गई। सात दिनो से उसने खाया न था, राह-किनारे पड़ी थी। उसे जीवन-दान देने मे जीवानंद को
एक घंटे की देर लग गई। स्त्री को बचाकर, विलम्ब होने के कारण उसे गालियां देते हुए जीवानंद आ रहे थे।
देखा, प्रभु को मुसलमान पकड़े लिए जाते हैं- स्वामीजी गाना गाते हुए चले आ रहे हैं।
झरु́ ‘धीर समीरे तटिनी तीरे बसति बने बनबारी।’.........
जीवानंद महाप्रभु स्वामी के सारे संकेतो को समझते थे।
नदी के किनारे कोई दूसरी स्त्री बिना खाए-पीए तो नही पड़ी हुई है? सोच-विचार जीवानंद नदी के किनारे
चले। जीवानंद ने देखा था कि ब्रह्मचारी मुसलमानो द्वारा स्वयं गिरफ्तार होकर चले जा रहे हैं। अतः ब्रह्मचारी
का उद्धार करना ही जीवानंद का पहला कर्त्तव्य था, लेकिन जीवानंद ने सोचा-“इस संकेत का तो अर्थ नही है।
उनकी जीवनरक्षा से भी बढ़कर है, उनकी आज्ञा का पालन- यही उनकी पहली शिक्षा है। अतः उनकी आज्ञा ही
पालन करूंगा।”

द्वितीय खण्ड: आनन्दमठ प्रवेश व वन्दे मातरम् गान

नदी के किनारे किनारे जीवनंद चले। जाते-जाते उसी पेड़ के नीचे नदी-तट पर देखा कि एक स्त्री की
मृतदेह पड़ी हुई है और एक जीवित कन्या उसके पास है। पाठकों को स्मरण होगा कि महेंद्र की स्त्री-कन्या
को जीवानंद ने एक बार भी नही देखा था। उन्होने मन में सोचा- हो सकता है, यही महेंद्र की स्त्री-कन्या हो !
क्योकि प्रभु के साथ ही उन्होने महेंद्र को देखा था। जो हो, माता मृत और कन्या जीवित है। पहले इनकी रक्षा
का प्रयास ही करना चाहिए- अन्यथा बाघ-भालू खा जाएंगे। भवानंद स्वामी भी कही पास ही होगे, वह स्त्री का
अंतिम संस्कार करेगे- यह सोचकर जीवानंद कन्या को गोद मे लेकर चल दिए।
लड़की को गोद मे लेकर जीवानंद गोस्वामी उसी जंगल मे घुसे। जंगल पार कर वे एक छोटे गांव भैरवीपुर
मे पहुंचे। अब लोग उसे भरूईंपुर कहते है। भरूईंपुर मे थोड़े-से सामान्य लोगो की बस्ती है। पास मे और
कोई बड़ा गांव भी नही है। गांव पार करते ही फिर जंगल मिलता है। चारो तरफ जंगल और बीच मे वह छोटा
गांव है। लेकिन गांव है। बड़ा सुंदर। कोमल तृण से भरी हुई गोचर भूमि है, कोमल श्यामल पल्लवयुक्त आम,
कटहल, जामुन, ताड़ आदि के बगीचे हैं। बीच मे नील-स्वच्छ जल से परिपूर्ण तालाब हैं। जल मे बक, हंस,
डाहुक आदि पक्षी, तट पर पपीहा, कोयल, चक्रवाक हैं, कुछ दूर पर मोर पंख फैलाकर नाच रहे हैं। घर-घर के
आंगन मे गाय, बछड़े, बैल हैं। लेकिन आजकल गांव मे धान नही है। किसी के दरवाजे पर पिंजड़े मे तोता
है, तो किसी के यहां मैना। भूमि लिपी-पोती स्वच्छ है। मनुष्य प्रायः सभी दुर्भिक्ष के कारण दुर्बल, क्लांत
और मलीन दिखाई देते है, फिर भी ग्रामवासियो मे श्री है। जंगल मे अनेक तरह के जंगली खाद्य पैदा होते हैं।
अतः गांव के लोग वहां से फल-फूल लाते है और वही खाकर इस दुर्भिक्ष मे भी अपने प्राण बचाए हुए हैं।
एक बड़े आम के बगीचे के बीच एक छोटा-सा घर है। चारो तरफ मिट्टी की चहारदीवारी है और चारो
कोनो पर एक-एक कमरा है। गृहस्थ के पास गौ-बकरी है, एक मोर है, एक मैना है, एक तोता है। एक बंदर
भी था, लेकिन उसे खाना न मिलने के कारण छोड़ दिया गया हैं। धान कू टने की एक ढेंकी है। बाहर बैल बंधे
हैं, बगल मे नीबू का पेड़ हैं। मालती जूही की लताएं हैं- अर्थात् गृहस्थ सुरुचि-सम्पन्न है। लेकिन घर मे
प्राणी अधिक नही है। जीवानंद कन्या को लिए हुए घर मे चले गए।
घर में पहुंचते ही जीवानंद ने आंगन के ओसरे में रखे को उठा लिया और भनन्-भनन् उसे चलाने लगे। छोटी
लड़की ने चरखे की आवाज कभी सुनी न थी। विशेषतः माता के छूटने के बाद से वह रो रही थी। चरखे की
आवाज सुनकर वह भयभीत हो और सप्तम स्वर मे गला ऊंचा कर रोने लगी। रोने की आवाज सुनकर एक कमरे
से सत्रह-अठारह वर्ष की युवती बाहर आई। युवती बाएं बाएं हाथ पर बायां गाल रखे, गर्दन झुकाए ही खड़ी
होकर देखने लगी। बोली-"यह क्या दादा! चरखा क्यो कात रहे हो? यह लड़की कहां से पायी दादा? तुम्हे
लड़की हुई है क्या? दूसरी शादी की है क्या?"
जीवानंद उठे और लड़की को उसकी गोद मे देकर चपत मारते चले। बोले-"बंदरी कही की! मुझे रंडुआ-
भंडुआ समझ लिया है क्या? घर में दुध है?"
इस पर युवती ने कहा-"भला दूध क्यो न होगा? आऊं पियोगे"
जीवानंद ने कहा-"हां पिऊंगा!"
व्यवस्त होकर युवती घर में दूध गरम करने लगी। तब तक जीवानंद बैठकर चरखा कातने लगे। लड़की ने
युवती की गोद मे जाकर रोना बंद कर दिया था। उसने क्या समझा, नही कहा जा सकता। शायद इस युवती को
खिले पुष्प देखकर सोचा हे, कि यही मेरी मां है। वह केवल एक बार रोई, वह भी शायद आग की आंच
खाकर। लड़की का रोना सुनकर जीवानंद ने आवाज लगाई-"अरे निमी! अरी कलमुही बंदरी! तेरा दूध गरम
नही हुआ क्या?" उसने भी कहा-"हो गया।" यह कहकर वह एक पथरी मे दूध ढालकर जीवानंद के पास

लाकर रख बैठ गई। जीवानंद ने बनावटी क्रोध दिखाकर कहा-“मन करता है, यही गरम दूध की पथरी तेरे ऊपर
उंडेल दूं। तूने क्या समझा कि मैं पियूंगा?”
निमी ने पूछा-“तब कौन पिएगा?”
जीवानंद-“यह लड़की पिएगी। देखती नही, अभी दूध पीनेवाली निरी बच्ची है!”
यह सुनकर निमी पलथी मारकर कन्या को गोद मे लेकर चम्मच से दूध पिलाने बैठी। एकाएक उसकी
आंखो से कई बूंद आंसू लुढ़क पड़े। बात यह थी कि उसे पहले एक बालक हुआ था, जो मर गया था। उसे
इस तरह दूध पिलाने मे अपने बच्चे की याद आ गई।
निमी ने तुरंत अपने आंसू पोछकर हंसते-हंसते जीवानंद से पूछा-“है दादा! बताओ, यह किसकी लड़की
है?”
जीवानंद ने कहा-“अरी बंदरी! तुझे क्या पड़ी है?”
निमी ने कहा-“लड़की मुझे दोगे?”
जीवानंद-“तू लेकर क्या करेगी?”
निमी-“मै लड़की को दूध पिलाऊंगी, गोद मे लेकर खिलाऊंगी, बड़ी करूंगी।”
कहते-कहते निमी की आंखो से आंसू ढुलक पड़े। आंसू पोछकर वह फिर दांत निकालकर हंसने लगी।
जीवानंद ने कहा-“तू लेकर क्या करोगी? तुझे आप ही कितने बाल-बच्चे होगे।”
निमी-“जब होगे तब होगे। अभी इस लड़की को मुझे दे दो! न हो, बाद मे फिर ले जाना।”
जीवानंद-“तो ले ले, लेकर मर! मैं बीच-बीच मे आकर देख जाया करूंगा। यह कायस्थ की लड़की है। मैं
अब चला....।”
निमी-“वाह दादा! भला खाओगे नही? समय हो गया, तुम्हे मेरी कसम, खाकर तब जाना।”
जीवानंद-“तेरी कसम टालकर तुझे खाऊं, या भात खाऊं!” फिर बोले-“रहने दे, तुझे न खाऊंगा, भात ही
खाऊंगा, ला भात!”
निमी कन्या को गोद मे लिए हुए खाना परोसने मे व्यस्त हो गई। पहले उसने जगह पानी से धो-पोछ दी इसके
बाद पीढ़ा-पानी रखकर एक थाली मे भात, अरहर की दाल, परवल की तरकारी, रोहू मछली का रसा और दूध
लाकर रख दिया। खाने के लिए बैठकर जीवानंद ने कहा-“निमाई बहन! कौन कहता है कि देश मे अकाल है?
तेरे गांव मे शायद अकाल घुसा ही नही!”
निमी बोली-“भला अकाल क्यो न होगा- भयंकर अकाल है! हमलोग दो ही प्राणी तो है, बहुत कुछ है,
दे-दिलाकर भी भगवान एक मुट्ठी चना ही देते है। हमलोगो के गांव मे पानी बरसा था- याद नही है- तुम्ही तो
कह गए थे कि वन मे पानी बरस रहा है, यहां भी बरसेगा! इसलिए हमारे गांव मे धान हो गया। गांववाले और
लोग तो शहर मे चावल बेच आए, हमलोगो ने नही बेचा।”
जीवानंद ने पूछा-“जीजाजी कहां है?”
निमी ने गर्दन टेढ़ी कर कहा-“दो-तीन सेर चावल बांधकर क्या जाने किसको देने गए है। किसी ने चावल
मांगा था।”
इधर जीवानंद के भाग्य में ऐसा भोजन कभी मिला न था। व्यर्थ बातचीत मे समय न गंवाकर जीवानंद
दनादन गपागप-सपासप आवाज करते हुए क्षण भर मे सारा भोजन उदरस्थ कर गए। श्रीमती निमाई मणि ने
केवल अपने और पति के लिए पकाया था, अपना हिस्सा उसने भाई को खिला दिया था, थाली सूनी देखकर

शर्म से अपने पति का हिस्सा लाकर थाली मे डाल दिया। जीवानंद ने सब ख्याल छोड़कर उस स्वादिष्ट भोजन
को भी उदर नामक महागर्त मे भर लिया। अब निमाई ने पूछा-“दादा! और कुछ खाओगे?”
जीवानंद ने डकार लेते हुए कहा-“और क्या है?”
निमाई बोली-“एक पक्व कटहल है।” निमाई ने कटहल भी ला रखा। विशेष कोई आपत्ति न कर जीवानंद
गोस्वामी ने उसे भी ध्वंसपुर भेज दिया। अब हंसकर निमाई ने पूछा-“दादा! और कुछ नही?”
दादा ने कहा-“अब रहने दे फिर किसी दिन आकर खाऊंगा।”
अंत मे निमाई ने दादा को हाथ-मुंह धोने को पानी दिया। जल ढालते हुए निमाई ने पूछा-“दादा! मेरी एक
बात रख लोगे?”
जीवानंद-“क्या?”
निमाई-“तुम्हे मेरी कसम!”
जीवानंद-“अरे बोल न कलमुंही”
निमाई-“बात रक्खोगे?”
जीवानंद-“अरे पहले बता भी तो सही।”
निमाई-“तुम्हे मेरी कसम, हाथ जोड़ती हूं।”
जीवानंद-“अरे बाबा मंजूर है! बता तो सही, क्या कहती है?”
अब निमाई गर्दन टेढ़ी कर एक हाथ से दूसरे हाथ की ऊंगली तोड़ती हुई, शर्माती हुई, कभी नीचे जमीन
देखती हुई बोली-“ एक बार भाभी को बुला दूं, मुलाकात कर लो।”
जीवानंद ने हाथ धुलाने वाले लोटे को निमी पर मारने के लिए उठाया, फिर बोले-“लौटा दे, मेरी लड़की!
तेरा अन्न भी किसी दिन वापस कर जाऊंगा। तू बंदरी है, कलमुंही है। तुझे जो बात न कहनी चाहिए, वही बात
मेरे सामने कहती है।”
निमी बोली-“अच्छा मैं ऐसी ही सही पर भैया! एक बार कह दो, मैं भाभी को बुला लाऊं।”
जीवानंद-“तो लो मैं जाता हूं।”
यह कहकर जीवानंद उठकर द्वार की तरफ बढ़े। किंतु शीघ्रता-पूर्वक निमाई ने दौड़कर किवाड़ बंद कर दिए
और स्वयं किवाड़ से लगकर खड़ी हो गई। बोली-“मुझे मारकर ही बाहर जा सकते हो, भैया! आज भाभी से
बिना मुलाकात किए जाने न पाओगे।”
जीवानंद बोले-“जानती है, आदमियो का शिकार करना ही मेरा काम है। मैंने अनेक आदमियो का शिकार
किया है।”
अब निमी भी क्रोध मे आई। बोली-“खूब किया! अपनी पी का त्याग कर दिया और आदमियो की जान
ली। क्या समझते हो, इससे मैं मान जाऊंगी? बहुत करोगे मारोगे, लेकिन मैं डरनेवाली नही हूं! तुम जिस बाप
के लड़के हो, मैं भी उसी बाप की लड़की हूं। आदमियो का खून करने मे यदि बड़ाई की बात हो, तो मुझे भी
मारकर बड़ाई प्राप्त करो।”
जीवानंद हंसकर बोले-“अच्छा बुला ला- किस पापिनी को बुलाएगी-जा बुला! लेकिन देख आज के बाद
कहेगी तो उस साले के भाई व साले को सिर मुंडाकर गदहे पर चढ़ाकर गांव के बाहर निकलवा दूंगा।”
निमी ने मन ही मन सोचा-“हुई न मेरी जीत यह सोचती हुई वह घर के बाहर निकल गई। इसके बाद पास
ही एक झोपड़ों में वह जा घुसी। कुटी मे सैंकड़ो पैबन्द लगे हुए कपड़े पहने, रुक्ष-केशी एक युवती बैठी

चरखा कात रही थी। निमाई ने जाकर कहा-"भाभी! जल्दी करो!" भाभी ने कहा-"जल्दी क्या?" नन्दोई ने
तुझे मारा है, तो उनके सर में तेल मलना है क्या?'
निमी-"बात ठीक है। घर मे तेल है?'
उस युवती ने तेल की शीशी सामने खिसका दी। निमाई ने झट अंजली मे ऊंड़ेलकर उस युवती के रूखे
बालो मे लग दिया। इसके बाद झट जूड़ा बांध दिया। फिर चपत जमाकर बोली-"तेरी ढाके-वाली साड़ी कहां
रखी है, बोल?' उस स्त्री ने कुछ आश्चर्य से कहा-"क्यो जी! कुछ पागल हो गई हो क्या?'
निमाई ने एक मीठा घूंसा जमाकर कहा-"निकाल साड़ी जल्दी!"
तमाशा देखने के लिए युवती ने भी साड़ी बाहर निकाल दी। तमाशा देखने के लिए क्योकि इतनी तकलीफ
पड़ने के बाद भी उसका सदा प्रफुल्ल रहनेवाला हृदय अभी भी वैसा ही था। नवयोवन-फूले कमल-जैसा उसकी
नई उम्र का यौवन-तेल नही, सजावट नही, आहार नही, फिर भी उसी मैली पैबन्दवाली धोती के अंदर से भी
वह प्रदीप्त, अनुपमेय सौन्दर्य फूट पड़ता था। वर्ण मे छायालोक की चंचलता, नयनो मे कटाक्ष, अधरो पर हंसी,
हृदय मे धैर्य- मेघ मे जैसे बिजली, जैसे हृदय मे प्रतिमा, जैसे जगत के शब्दो मे संगीत और भक्त के मन मे
आनंद होता है, वैसे ही उस रूप मे भी कुछ अनिर्वचनीय गौरव भाग, अनिर्वचनीय प्रेम, अनिर्वचनीय भक्ति।
उसने हंसते-हंसते (लेकिन उस हंसी को किसी ने देखा नही) साड़ी निकाल दी। बोली-"निमी! भला बात
तो, क्या होगी!"
निमी बोली-"दादा आये है। तुझे बुलाया है।"
उसने कहा-"अगर मुझे बुलाया है तो साड़ी क्या होगी? चल इसी तरह चलूंगी।" युवती कहती जाती थी-
"कभी कपड़े न बदलूंगी।" चल, इसी तरह मिलना होगा। आखिर किसी तरह भी उसने कपड़े बदले नही। अंत
मे दोनों कुटी के बाहर आई। निमाई को भी राजी होना पड़ा। निमाई भाभी को लेकर अपने घर के दरवाजे तक
आ गई। इसके बाद भाभी को अंदर का उसने दरवाजा बंद कर लिया और स्वयं बाहर खड़ी रही।
उस स्त्री की उम्र यही कोई पच्चीस वर्ष के लगभग है, लेकिन देखने मे निमाई से अधिक उम्र की नही जान
पड़ती। मैले पैबंद की धोती पहनकर भी, जब वह घर में घुसी तो जान पड़ा कि जैसे घर मे उजाला हो गया।
जान पड़ा, जैसे बहुतेरी कलियों का गुच्छा पत्तो से ढंका रहने पर भी, पत्ते हटते ही खिल उठा हो मानो गुलाब-
जल की शीशी एकाएक मुंह खुल जाने से महक गयी हो-सुलगती हुई आग मे जैसे किसी ने धूप-धूना छोड़
दिया हो और कमरे का वातावरण ही बदल जाए। पहले तो घर मे घुसकर स्त्री ने पति को देखा नही, फिर
एकाएक निगाह पड़ी कि आंगन मे लगे छोटे आम के नीचे खड़े होकर जीवानंद रो रहे है। सुंदरी ने धीर-धीरे
उनके पास पहुंचकर उनका हाथ पकड़ लिया। यह कहना भूल गया कि उनकी आंखो मे जल नही आया।
भगवान ही जानते है कि उसकी आंखो से आंसू की वह धारा निकलती कि शायद जीवानंद उसमे डूब जाते।
लेकिन युवती ने अपनी आंखों मे आंसू नही आने दिए। जीवानंद का हाथ पकड़कर उसने कहा-"छिः! छिः!
रोते क्यो हो? मै समझी कि तुम मेरे लिए रोते हो। मेरे लिए न रोना! तुमने मुझे जिस तरह रखा है, मैं उसी में
सुखी हूं।"
जीवानंद ने माथ उठाकर आंसू पोछते हुए स्त्री से पूछा-"शांति! तुम्हारे शरीर पर यह सैकड़ो पैबन्द की धोती
क्यो है? तुम्हे तो खाने-पहनने की कोई तकलीफ नही है!"
शांति ने कहा-"तुम्हारा धन तुम्हारे ही लिए है? रूपये लेकर क्या करना चाहिए, मैं नही जानती। जब तुम
आओगे- जब तुम मुझे ग्रहण करोगे....."

जीवानंद-‘‘ग्रहण करूंगा-शांति! मैंने क्या तुम्हे त्याग दिया है?’’
शांति-‘‘त्याग नही, जब तुम्हारा व्रत पूरा होगा, जब तुम फिर मुझे प्यार करोगे........’’
बात समाप्त होने के पहले ही जीवानंद ने शांति के छाती से लगा लिया और उसके कंधो पर माथा रख बहुत देर
तक चुप रहे। इसके बाद एक ठंडी सांस लेकर बोले-‘‘क्यो मुलाकात की?’’
शांति -‘‘क्या तुम्हारा व्रत भंग हो गया?’’
जीवानंद-‘‘हो व्रत भंग, उसका प्रायश्चित भी है। उसके लिए शोक नही है। लेकिन तुम्हे देखकर तो फिर लौटते
नही बन पड़ता। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और सारा संसार, व्रत-होम, योग-यज्ञ यह सब एक तरफ है और दूसरी
तरफ तुम हो। मैं किसी तरह भी समझ नही पाता हूं कि कौन-सा पलड़ा भारी है? देश तो अशांत है, मैं देश
लेकर क्या करूंगा। तुम्हारे साथ एक बीघा भूमि लेकर भी बड़े आनंद से मेरा जीवन बीत सकता है। तुम्हे लेकर
मैं स्वर्ग गढ़ सकता हूं। क्या करना है मुझे देश लेकर? देश की उस संतान का अभाग्य है जो तुम्हारी जैसी
गृहलक्ष्मी प्राप्त कर भी सुखी हो न सके। मुझसे बढ़कर देश में कौन दुःखी होगा? तुम्हारे शरीर पर ऐसा कपड़ा
देखकर मुझे लोग देश मे सबसे दरिद्र ही समझेगे। मेरे सारे धर्मों की सहायता तो तुम हो उसके सामने फिर
सनातन-धर्म क्या है? मैं किस धर्म के लिए देश-देश, वन-वन बंदूक कंधे पर लेकर प्राणी-हत्या कर इस पाप
का भार संग्रह करूं? पृथ्वी संतानो की होगी या नही, कौन जानता है? लेकिन तुम मेरी हो- तुम पृथ्वी से भी
बड़ी हो- तुम्ही मेरा स्वर्ग हो। चलो घर चले, अब वापस न जाऊंगा!’’
शांति कुछ देर तक बोल न सकी। इसके बाद बोली-‘‘छीः! तुम वीर हो-मुझे इस पृथ्वी पर सबसे बड़ा सुख
यही हैं कि मैं वीर-पत्नी हूं! तुम अधम स्त्री के लिए वीर-धर्म का परित्याग करोगे? तुम अपने वीर-धर्म का
कभी परित्याग न करना! देखो मुझे एक बात बताते जाओ, इस व्रत के भंग का प्रायश्चित क्या है?’’
जीवानंद ने कहा-‘‘प्रायश्चित है-दान, उपवास-12 कानी कौड़ियां।’’
शांति मुस्कराई और बोली-‘‘जो प्रायश्चित हैं मैं जानती हूं। लेकिन एक अपराध पर जो प्रायश्चित है- वही क्या
शत अपराधो पर भी है?’’
जीवानंद ने विस्मित और विवश होकर कहा-‘‘लेकिन यह सब क्यो पूछती हो?’’
शांति-‘‘एक भिक्षा है। कहो- मेरे साथ बिना मुलाकात किए प्रायश्चित न करोगे!’’
जीवानंद हंसकर कहा-‘‘इस बारे में निश्चित रहो- बिना तुम्हे देखे, मैं न मरूंगा। मरने की ऐसी कोई जल्दी भी
नही है। अब मैं अधिक यहां न ठहरूँगा, लेकिन आंख भरकर तुम्हे देख न सका। फिर भी एक दिन अवश्य
देखूंगा। एक दिन हम लोगो के मन की कामना जरूर पूरी होगी! मैं अब चला तुम मेरे एक अनुरोध की रक्षा
करना- इस वेश-भूषा का त्याग कर दो। मेरे पैतृक मकान मे जाकर रहो।’’
शांति ने पूछा-‘‘इस समय कहां जाओगे?’’
जीवानंद-‘‘इस समय मठ में ब्रह्मचारीजी की खोज में जाऊंगा। वे जिस भाव से नगर गए है, उससे कुछ चिंता
होती है। मठ मे मुलाकात न हुई तो नगर जाऊंगा।’’
भवानंद मठ मे बैठे हुए हरिगान मे तल्लीन थे, ऐसे ही समय दुःखी चेहरे से ज्ञानानन्द नामक एक तेजस्वी संतान
उनके पास आ पहुंचे। भवानंद ने कहा-‘‘गोस्वामी! चेहरा इतना उतरा हुआ क्यो है?’’
ज्ञानानंद ने कहा-‘‘कुछ गड़बड़ी जान पड़ती है। कल के कांड से सरकारी आदमी जिसे हल्दी-गेरुआ वस्त्रधारी
देखते हैं, उसे गिरफ्तार कर लेते है। करीब-करीब सभी संतानो ने आज अपना गैरिक वस्त्र उतार दिया है।
केवल सत्यानंद प्रभु गेरुवा पहने हुए ही शहर की तरफ गए है। कौन जाने कही मुसलमानो के हाथ पड़ जाए!’’
भवानंद बोले-‘‘उन्हे बंदी कर रखे, बंगाल में अभी ऐसा कोई मुसलमान नही है। मैं जानता हूं, धीरानंद उसके

पीछे-पीछे गए हैं। फिर भी मैं एक बार नगर घूमने जाता हूं, मठ की रक्षा तुम्हे सौप जाता हूं।’’
यह कहकर भवानंद स्वामी ने एक अलग कोठरी मे जाकर कितने ही तरह के कपड़े निकाले। भवानंद जब उस
कोठरी से निकले तो उन्हे पहचानना कठिन था। गेरुआ वस्त्रो के बदले इनके पैरो मे चूड़ीदार पायजामा, शरीर
पर अचकन, माथे पर कंगूरेदार पगड़ी और पैरों मे नागौरी जूता था। अब उनके ललाट पर का चंदन-त्रिपुण्ड
साफ हो गया था, उनका चेहरा अपूर्व शोभा पा रहा था। उन्हे देखने से किसी पठान जातीय मुसलमान का ही
भान होता था। इस तरह से सशस्त्र होकर भवानंद मठ के बाहर हुए। मठ के कोई एक कोस उत्तर दो छोटी
पहाड़िया बगल-बगल में थी। पहाड़ी जंगल से भरी हुई थी। वही एक निर्जन स्थान मे संस्थानों की अश्वशाला
थी। भवानंद ने वहां से एक घोड़ा निकाला और जीन आदि कसवाकर उस पर सवार हो, सीधे राजधानी की
तरफ चल पड़े।
जाते-जाते एकाएक उनकी गति मे बधा पड़ी। उसी राह की बगल में नदी के किनारे वृक्ष के नीचे उन्होने
आकाश से गिरी बिजली की तरह दीप्तिमान एक स्त्री को पड़ी हुई देखा। उन्होने देखा, उसमें जीवन के कोई
लक्षण दिखाई नही पड़ते- विष की खाली डिबिया पास मे पड़ी हुई है। भवानंद विस्मित, क्षुब्ध और भीत हुए।
जीवानंद की तरह भवानंद ने भी महेन्द्र की स्त्री-कन्या हो सकती है, भवानंद के सामने संदेह के लिए वे कारण
भी न थे- उन्होने ब्रह्मचारी और महेन्द्र को बंदी रूप में ले जाते भी देखा न था। कन्या भी वहां न थी। केवल
डिबिया देखकर उन्होने समझा कि इस स्त्री ने विष खाकर आत्म-हत्या की है। भवानंद उस शव के पास बैठ
गए, बैठकर उसके माथे पर हाथ रखकर बहुत देर तक परीक्षा करते रहे। नाड़ी-परीक्षा, हृदय-परीक्षा आदि अनेक
प्रकार से और दूसरे अपरिज्ञात तरीको से परीक्षा कर मन-ही-मन कहा-‘‘अभी मरी नही है-अभी भी समय है-
बचाई जा सकती है। लेकिन बचाकर करना भी क्या है? इस तरह कुछ क्षण तक विचार करते रहे और इसके
बाद वे उठकर एकाएक वन के अंदर चले गए। वहां से वे एक लता की थोड़ी पत्ती तोड़ लाए। उसी पत्ती को
हथेली पर मसलकर उन्होने रस निकाला और अंगुलियो से दांत खोल रस को मुंह मे टपकाया कान मे डाला
और थोड़ा मस्तक पर मल दिया। इसके बाद थोड़ा रस उन्होने नाक मे भी डाल दिया। इसी तरह उन्होने बार-
बार किया और बीच-बीच में नाक के पास हाथ ले जाकर देखते जाते थे कि कुछ श्वास चली या नही। पहले-
पहल तो भवानंद को निराशा होने लगी, लेकिन इसके बाद उनका मुंह प्रसन्नता से खिल उठा- अंगुली मे
निश्वास की हलकी अनुभूति हुई। उत्साहित हो उन्होने बारम्बार वही प्रक्रिया की, अब श्वास मजे मे आने-जाने
लगी। नाड़ी देखी चल रही थी। इसके बाद ही क्रमशः प्रभात-कालीन अरुणोदय की तरह, प्रभात के समय
कमल खिलने की तरह, प्रथम प्रेमानुभव की तरह कल्याणी अपनी आंखे खोलने लगी। यह देखकर भवानंद ने
कल्याणी के अर्धजीवित शरीर को घोड़े पर रखा और स्वयं पैदल ही नगर की तरफ निकल गए।’’
संध्या होने के पहले ही सन्तान सम्प्रदाय के सभी लोगो ने यह जान लिया कि महेन्द्र के साथ सत्यानन्द स्वामी
गिरफ्तार होकर नगर की जेल मे बन्द है। इसके बाद ही एक एक दो-दो दस-दस सौ-सौ हजार-हजार की
संख्या मे आकर संतानगण उसी मठ की चहारदीवारी से संलग्न वन मे एकत्रित होने लगे। सभी सशस्त्र थे।
सबकी आंखो से क्रोध की अग्नि निकल रही थी, चेहरे पर दृढ़ता और होठो पर प्रतिज्ञा थी। उन लोगो के
काफी संख्या मे जुट जाने पर मठ के फाटक पर हाथ में नंगी तलवार लिए हुए स्वामी ज्ञानानन्द ने गगन भेदी
स्वर मे कहा- “अनेक दिनो से हम लोग विचार करते आते हैं कि इस नवाब का महल तोड़कर यवनपुरी का
नाश कर नदी के जल मे डुबा देगे- इन सूअरो के दांत तोड़कर इन्हे आग मे जलाकर माता वसुमती का उद्धार
करेंगे। भाइयों! आज वही दिन आ गया है। हम लोगो के गुरू के भी गुरू परमगुरू जो अनन्त ज्ञानमय सदा
शुद्धाचारी, लोकहितैषी और देश हितैषी है- जिन्होने सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा के लिए आमरणव्रत लिया

है,प्रतिज्ञा की है- जिन्हे हम विष्णु के अवतार के रूप मे मानते है, जो हमारी मुक्ति के आधार है - वही आज
म्लेच्छ मुसलमानो के कारागार मे बन्दी है। क्या हम लोगो की तलवार पर धार नही है?
बांह फैलाकर ज्ञानान्द ने कहा-‘‘इन बाहुओ मे क्या बल नही है? छाती ठोकर बोले- ‘‘क्या इस हृदय मे
साहस नही? भाइयो ! बोलो-हरे मुरारे मधुकैटभारे ! जिन्होंने मधुकैटभ का विनाश किया है
जिन्होनंने हिरण्यकशिपु, कंस,दन्तवक्र,शिशुपाल आदि दुर्जय असुरो का निधन-साधन किया है, जिनके चक्र के
प्रचण्ड निर्घोष से मृत्युंजय शंकर भी भयभीत हुए थे जो अजेय है रण मे विजयदाता है हम उन्ही के उपासक
है, उनके ही बल से हमारी भुजाओं मे अनन्त बल है- वह इच्छामय है उनके इच्छा करते ही हम रण- विजयी
होगे। चलो, हम लोग उस यवनपुरी का निर्दलन कर उसे धूलि मे मिला दे। उरा शूकर निवास को अग्नि से
शुद्ध कर नदी-जल मे धो दे, उसका जर्रा जर्रा उड़ा दे। बोलो- हरे मुरारे मधुकैटभारे !‘‘
इसके साथ ही उस कानन मे भीषण, आकाश कंपानेवाले वज्रनिर्घोष जैसी आवाज गूंज उठी- हरे
मुरारे मधुकैटभारे !
इसके साथ ही उस कानन मे भीषण आकाश कंपानेवाले वज्रनिर्घोष जैसी आवाज गूंज उठी- हरे
मुरारे मधुकैटभारे !
सहस्त्रो कंठो के निर्घोष से आकाश कांपा, वसुन्धरा डगमगायी। सहस्त्रो बाहुओ के घर्षण से असीम निनाद
हुआ- हजारो ढालो की आवाज से कानो के पर्दे फटने लगे। कोलाहल करते हुए पशु पक्षी जंगल से निकलकर
भागे। इस तरह जंगल से श्रेणीबद्ध शिक्षित सेना की तरह सन्तानगण निकल पड़े। वह लोग मुंह से हरिनाम कहते
हुए, मिलित पद- विक्षेप से नगर की तरफ चले। उस अंधेरी रात मे पतो का मर्मर शब्द, अस्त्रो की झनकार,
कण्ठो का अस्फुट स्वर, बीच बीच मे तुमुल स्वर मे हरिनाम का जयघोष ! धीरे-धीरे, तेजस्वितापूर्वक सरोष
सन्तान-वाहिनी ने नगर मे आकर नगर को त्रस्त कर दिया। इस अकस्मात ब्रजाघात से नागरिक कहां किधर भागे,
पता न लगा। नगर- रक्षक हतबुद्धि हो निश्चेष्ट हो गये।
इधर सन्तानो ने पहुंचते ही पहले राजकारागार मे पहुंचकर उसे तोड़ डाला, रक्षको को चटनी बना दिया और
सत्यानन्द तथा महेन्द्र को मुक्त कर कन्थो पर चढ़ाकर संतानगण आनंद से नृत्य करने लगे। हरिकीर्तन का
अद्भुत दृश्य उपस्थित हो गया। महेन्द्र और सत्यानंद करे मुक्त कर संतानों ने जहां-जहां मुसलमानो का घर
पाया, आग लगा दी। यह देखकर सत्यानंद ने कहा-‘‘अनर्थक अनिष्ट की आवश्यकता नही। चलो, लौट
चलो !‘‘ नगर के अधिकारियो ने संतानो का यह उपद्रव सुनकर सिपाहियो का एक दल उनके दमन के लिए
भेज दिया। उनके पास केवल बंदूकें ही नही थी। एक तोप भी साथ मे थी। यह खबर पाते ही
सन्तानगण आनन्द कानन से पलट पड़े, लेकिन लाठी,तलवार और छुरो से क्या हो सकता है ? तोप के सामने ये
लोग पराजित होकर भाग गये।
शान्ति को बहुत थोड़ी ही उम्र मे,बचपन मे ही मातृवियोग हो गया था। जिन उपादानो से शान्ति का चरित्र-गठन
हुआ है, उनमे एक यह प्रधान है। उसके पिता एक ब्राह्मण अध्यापक थे। उनके घर मे और कोई स्त्री न थी।
शान्ति के पिता जब पाठशाला मे बालकों को पढ़ाते थे, तो स्वभावतः उनकी बगल मे शांति भी आकर
बैठती थी। कितने ही छात्र तो पाठशाला मे ही रहते थे; अन्य समय मे शांति भी उन्ही मे मिलकर खेला करती
थी। कभी उनकी पीठ पर चढ़ती थी, कभी गोद मे बैठ खेला करती थी। वे लोग भी शान्ति का आदर करते थे।
इस तरह बचपन से ही पुरुष-साहचर्य का प्रथम प्रतिफल तो यह हुआ कि शान्ति ने लड़कियो की तरह
कपड़े पहनना सीखा, या सीखा भी तो वह ढंग परित्याग कर दिया- लड़को की तरह कच्छाड़ा मारकर धोती
पहनने लगी। अगर कोई उसे लड़कियो की तरह कपड़े पहना देता था, तो वह तुरंत उसे खोल देती थी और

फिर कछाड़ा मारकर पहन लेती थी। पाठशाला के बालक कभी जूड़ा बांधते न थे, अतः वह न तो चोटी करती
थी और न जूड़ा ही। फिर उसे जूड़ा बांध ही कौन देता? घर मे कोई औरत तो थी नही। पाठशाला के छात्र बांस
की फरांटी मे उसके बाल फंसा देते थे और उसके घुंघराले बाल वैसे ही पीठ पर लहराया करते थे। विद्यार्थी
ललाट पर चन्दन और भस्म लगाते थे; अतः शान्ति भी चन्दन-भस्म लगाया करती थी। गले मे यज्ञोपवीत पहनने
के लिए भी शांति बहुत रोया करती थी। फिर भी, संध्यादि नैमित्तिक नियमो के समय वह अवश्य उनके पास
बैठकर उनका अनुकरण किया करती थी। अध्यापक की अनुपस्थिति के समय लड़को ने उसे अश्लील दो-एक
संकेत सिखा दिये थे और वे आपस मे जो कहानियां कहा करते थे, तोते की तरह शान्ति ने भी उन्हे रट डाला
था- भले ही उसका कोई अर्थ न जानती हो।
दूसरा फल यह हुआ कि बड़ी पर शान्ति, लड़के जो पुस्तके पढ़ा करते थे- उन्हे अनायास ही पड़ने लगी।
वह व्याकरण का एक अक्षर भी जानती न थी, लेकिन भट्टि काव्य, रघुवंश, कुमारसंभव, नैषधादि के श्लोक
व्याख्या के साथ उसने रट डाले थे। यह देखकर शान्ति के पिता ने उसे थोड़ा प्राथमिक व्याकरण भी पढ़ाना शुरू
किया। शान्ति भी शीघ्र से शीघ्र सीखने लगी। अध्यापक भी बड़े विस्मित हुए। व्याकरण के साथ उन्होने कुछ
साहित्य भी उसे पढ़ाया। इसके बाद ही सब गोलमाल हो गया, शान्ति के पिता का स्वर्गवास हो गया।
अब शान्ति निराश्रय हो गयी। पाठशाला भी उठ गयी, छात्र चले गये। लेकिन वे सब शान्ति को प्यार करते थे,
अतः उनमे से एक शान्ति को अपने घर ले गया। इसी छात्र ने बाद मे सन्तान-सम्प्रदाय मे नाम लिखाकर अपना
नाम जीवानन्द रखा। हम उन्हे जीवानन्द ही कहेगे।
उस समय जीवानन्द के माता-पिता जीवित थे। उनको जीवानन्द ने कन्या का विशेष परिचय दिया। पिता-
माता ने पूछा- "लेकिन अब परायी लड़की का भार अपने ऊपर लेगा कौन?" जीवानन्द ने कहा- "मै ले
आया हूं, इसका भार मैं ही लूंगा!" माता-पिता ने भी कहा - ठीक है। जीवानन्द कुंवारे थे, उन्होने शान्ति के
साथ शादी कर ली। विवाह के उपरान्त सभी लोग इस सम्बन्ध पर पछताने लगे। सब लोग समझे- "तो ठीक
नही हुआ।" शांति ने किसी तरह भी लड़कियो के समान धोती न पहनी, किसी तरह भी वह चोटी बांधने को
तैयार न हुई। वह घर मे भी अधिक रहती न थी, पड़ोस के लड़को के साथ बाहर खेला करती थी। जीवानन्द के
घर के पास ही जंगल है। शांति उस जंगल मे अकेली घुसकर कही मोरो, कही हरिणो और कही सुंदर फूलो
की खोज मे घूमा करती थी। सास- ससुर ने पहले तो मना किया, फिर डांट-फटकार की, इसके बाद मारा-
पीटा और अन्त मे कोठरी मे बन्द कर दिया। इस डांट- डपट से शांति बड़ी क्रु द्ध हुई। एक दिन दरवाजा खुला
देखकर वह बाहर निकली और बिना किसी से कहे-सुने कही चली गयी।
जंगल के अन्दर टेसू के फूलो को लेकर उनसे शांति ने अपने कपड़े रंग डाले और खासी साधुनी बन गयी।
उस समय बंगाल मे दल के दल संन्यासी घूमा करते थे। शांति भी भिक्षा मांगती-खाती जगन्नाथ क्षेत्र की राह मे
निकल गयी। थोड़े ही दिनो बाद उसे संन्यासियो का दल मिल गया; वह भी उन्ही मे मिल गयी।
उस समय के सन्यासी आजकल जैसे न होते थे- सुशिक्षित बलिष्ट युद्ध विशारद एवं अन्यान्य गुणो से
गुणवान होते थे। वे लोग वस्तुतः एक तरह के राजविद्रोही होते थे- राजाओ का राजस्व लूटकर खाते थे।
बलिष्ट बालक पाते ही उनका अपहरण करते थे, उन्हे शिक्षित कर अपने सम्प्रदाय मे मिला लिया करते थे।
इसलिए लोग उन्हे 'लकड़-पकड़वा' या 'लकड़ सुंघवा' भी कहते थे।
शांति बालक संन्यासी के रूप मे उनमे मिली थी। संन्यासी लोग पहले कोमल देह देखकर उसे दल मे
मिलाते न थे; लेकिन शांति की बुद्धि-प्रखरता,चतुरता और कार्यदक्षता देखकर आदरपूर्वक उन्होने उसे अपने
दल मे मिला लिया। शांति उनके दल मे मिलकर व्यायाम करती थी, अस्त्र चलाना सीखती थी, अतः परिश्रम-